Handshake in Dhaka: हाथ मिलाने पर हंगामा है क्यों बरपा?

By विकास मिश्रा | Updated: January 6, 2026 05:59 IST2026-01-06T05:59:44+5:302026-01-06T05:59:44+5:30

Handshake in Dhaka: यदि जयशंकर हाथ नहीं मिलाते तोे भी वह हंगामा बरपाता ही! अब आप उस दृश्य की कल्पना कीजिए जब बांग्लादेश की संसद के स्वागत कक्ष मेें विभिन्न देशों के नेता बैठे हुए थे.

Why so much commotion over shaking hands Jaishankar shakes hands Pakistani Parliament Speaker Sardar Ayaz Sadiq in Dhaka blog Vikas Mishra | Handshake in Dhaka: हाथ मिलाने पर हंगामा है क्यों बरपा?

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Highlightsकितना अजीब है कि इस सामान्य सी घटना को अपने पक्ष में मोड़ कर शान बघारने की वो कोशिश कर रहा है.जयशंकर वहां पहुंचते हैं और विभिन्न लोगों से हाथ मिलाते हुए सरदार अयाज सादिक के पास पहुंच कर हाथ मिलाते हैं. आपको अपना परिचय देने की जरूरत नहीं है. यानी इसमें भी सादिक का गुरुर नजर आता है.

कितनी अजीब बात है कि उससे  यदि हाथ न मिलाएं तो हंगामा बरपा देता है और हाथ मिला लें तब तो बल्लियों उछल कर हंगामा मचाता है. ये है हमारा पड़ोसी पाकिस्तान. आपको याद होगा कि पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान क्रिकेट टीम को हराने के बाद भारतीय कप्तान सूर्य कुमार यादव और दूसरे खिलाड़ियों ने पाकिस्तानियों से हाथ नहीं मिलाया था. तब पड़ोसियों ने जबर्दस्त हल्ला मचाया था. यहां तक कह दिया था कि भारतीय टीम को दस्तूर की समझ नहीं है लेकिन अब भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाकिस्तानी संसद के स्पीकर सरदार अयाज सादिक से ढाका में हाथ मिला लिया तो पाकिस्तानियों को लग रहा है कि भारत उनके साथ रिश्तों को सुधारने की पहल कर रहा है. कितना अजीब है कि इस सामान्य सी घटना को अपने पक्ष में मोड़ कर शान बघारने की वो कोशिश कर रहा है.

यदि जयशंकर हाथ नहीं मिलाते तोे भी वह हंगामा बरपाता ही! अब आप उस दृश्य की कल्पना कीजिए जब बांग्लादेश की संसद के स्वागत कक्ष मेें विभिन्न देशों के नेता बैठे हुए थे. जयशंकर वहां पहुंचते हैं और विभिन्न लोगों से हाथ मिलाते हुए सरदार अयाज सादिक के पास पहुंच कर हाथ मिलाते हैं. अब सादिक कह रहे हैं कि उन्होंने अपना परिचय देने की शुरुआत की ही थी कि जशंकर ने कहा कि एक्सीलेंसी, मैं आपको पहचानता हूं. आपको अपना परिचय देने की जरूरत नहीं है. यानी इसमें भी सादिक का गुरुर नजर आता है.

इस गुरुर को पाकिस्तान का मीडिया महिमामंडित करने में भी लगा है. कहा जा रहा है कि बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति के जयशंकर ने हाथ नहीं मिलाया होगा और हाथ मिलाना इस बात का संकेत है कि भारत रिश्ते सुधारने की पहल कर रहा है. पाकिस्तानी मीडिया की यह सोच निश्चित ही उसकी संकीर्णता की परिचायक है.

भारत की नीतियां हर किसी के सामने स्पष्ट हैं और हमारे विदेश मंत्री को पता है कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है. उस कमरे में कैमरे मौजूद थे, यह हमारे विदेश मंत्री को पता था. यदि जयशंकर का हाथ मिलाना किसी कूटनीति का हिस्सा होता तो  मुलाकात की तस्वीर को भारतीय विदेश मंत्रालय सार्वजनिक फोरम पर जरूर डालता.

साथ में कुछ कहता भी लेकिन भारत ने तो कोई खास महत्व ही नहीं दिया. यदि जयशंकर का हाथ मिलाना कूटनीति होती तो भारत लौटने के बाद दो जनवरी को आईआईटी मद्रास के कार्यक्रम में वे पाकिस्तान को आड़े हाथों क्यों लेते? ‘पड़ोसी पहले’ पॉलिसी से संबंधित एक सवाल पर जयशंकर ने बड़े साफ शब्दों में भारत के पश्चिम को यानी पाकिस्तान को बुरा पड़ोसी बताते हुए कहा कि यदि कोई देश यह तय करता है कि वह जानबूझकर, लगातार और बिना पछतावे के आतंकवाद जारी रखेगा, तो हमें अपने लोगों को आतंकवाद से बचाने का अधिकार है.

हम निश्चित ही उस अधिकार का इस्तेमाल करेंगे. यानी उन्होंने पाकिस्तान के प्रति भारत के रुख को स्पष्ट कर दिया. इसके बावजूद यदि हाथ मिलाने को लेकर पाकिस्तानी फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं तो उनकी समझ पर हमें तरस ही खाना चाहिए.पाकिस्तान को यह समझना होगा कि रिश्ते सुधारने की पहल करने की जरूरत भारत को नहीं है बल्कि उसे है.

दो देशों और खासकर पड़ोसियों के बीच जब तनाव चरम पर होता है तो नुकसान दोनों को होता है लेकिन यहां भारत को कम और पाकिस्तान को नुकसान ज्यादा हो रहा है. दोनों देशों के बीच तीसरे देश के माध्यम से जो व्यापार हो रहा था, भारत ने नकेल कस दी है और इसका बहुत बुरा असर पाक की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है.

पिछले दशक में हम कई बार देख चुके हैं कि वह देश दिवालिया होने की कगार पर खड़ा हो गया. महंगाई वहां आसमान छू रही है और हाल के दिनों में हालात इतने खराब हो गए थे कि लोगों को पर्याप्त आटा भी नहीं मिल पा रहा था. भारत से तनाव के कारण पाकिस्तान को अपने लोगों का पेट काट कर अपना रक्षा बजट बढ़ाना पड़ा है.

इसके बावजूद वह समझने का नाम नहीं ले रहा है. भारत में आतंकवाद को लगातार बढ़ावा दे रहा है, अपने यहां से आतंकवादियों को भेज रहा है. बांग्लादेश में घुस कर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत के खिलाफ षड्यंत्र रच रही है. ऐसे पड़ोसी के साथ रिश्ते सुधारने की पहल आखिर हम क्यों करें? कुछ तो कारण होना चाहिए!

एक बात और! पाकिस्तान का मीडिया और उसके नेता हल्ला मचाते रहते हैं कि भारत में जब तक भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं तब तक भारत रिश्ते नहीं सुधारेगा! कितनी अजीब बात है! क्या पाकिस्तान 25 दिसंबर 2015 की तारीख भूल गया जब नरेंद्र मोदी ने रिश्ते सुधारने की बहुत बड़ी पहल की थी.

उस दिन क्रिसमस भी था, नवाज शरीफ का भी जन्मदिन था  और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का भी जन्मदिन  था. शरीफ को नरेंद्र मोदी ने फोन पर जन्मदिन की बधाई दी और कहा कि अफगानिस्तान से लौटते हुए वे उनके घर आना चाहते हैं. शरीफ अपनी बड़ी नातिन मेहरुन्निसा की शादी के लिए लाहौर में थे.

उनकी सहमति मिलने के बाद नरेंद्र मोदी पाकिस्तान पहुंचे. शरीफ और मोदी गले मिले. तब नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जंग को जंग लग गया, अब जंग नहीं होगी! मगर क्या हुआ? मोदी के पहले अटल बिहारी वाजपेयी भी बस में सवार होकर और दोस्ती का पैगाम लेकर लाहौर गए थे. उसके तत्काल बाद कारगिल की जंग हुई.

दगाबाजी पाकिस्तान के खून में है. ऐसे पड़ोसी को शांति की भाषा समझ में नहीं आती. इसलिए रिश्ते सुधारने की जरूरत हमें नहीं बल्कि पाकिस्तान को है. गजवा-ए-हिंद का ख्वाब वह जब तक देखता रहेगा, हमारी जरूरत है कि उसे उसकी औकात दिखाते रहें.

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