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रहीस सिंह का ब्लॉग: यूक्रेन को किसने बनाया युद्ध का मैदान?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 4, 2022 15:05 IST

अगर पुतिन की यह रणनीति सफल हो जाती है तो रूस के प्रभाव की परिधियां बैरेंट्स सागर से लेकर आर्कटिक महासागर तक विस्तृत हो जाएंगी जिसमें पूर्वी यूरोप, दक्षिणी कॉकेशस, यूरेशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका का हिस्सा भी शामिल होगा।

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ठळक मुद्देयूरेशिया में अमेरिका और यूरोप के प्रभुत्व को कम करने के लिए रूस और चीन प्रतिबद्ध दिख रहे हैं।सही अर्थों में तो इस युद्ध में एक तरफ रूस है और दूसरी तरफ नाटो है।

इस समय दुनिया एक अनिश्चित दौर से गुजरती हुई दिख रही है। भले ही रूस-यूक्रेन युद्ध इस दौर का सबसे चर्चित एवं गंभीर विषय बन रहा हो लेकिन सूक्ष्म विश्लेषण करने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह जियो-पाॅलिटिक्स और जियो-इकोनाॅमिक्स की ही पूछ है। सिर तो कहीं और है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रूस-यूक्रेन युद्ध में जो दिख रहा है उसके अतिरिक्त वह बहुत कुछ भी है जो नहीं दिखाया जा रहा है? 

एक बात और। बहुत से विश्लेषक अब इस युद्ध को एटाॅमिक युद्ध तक ले जाने की वैचारिक कोशिश कर रहे हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि वे विचारों में स्वयं एक युद्ध लड़ रहे हैं? अंतिम प्रश्न यह, क्या एकमात्र व्लादीमीर पुतिन ही इस युद्ध के लिए दोषी हैं? सवाल यह क्यों नहीं उठाया जा रहा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के पीछे कौन सी शक्तियां हैं और उनका उद्देश्य क्या है? सवाल तो यह भी पूछा जाना चाहिए था कि ‘नाटो’ शीतयुद्ध के समापन के बाद भी क्यों बना हुआ है और इसने अब तक वैश्विक शांति को स्थापित करने का कौन सा उदाहरण पेश किया है?

यह सच का सिर्फ एक सिरा है कि एक राष्ट्र के रूप में रूस किसी दूसरे राष्ट्र यानी यूक्रेन की संप्रभुता और अखंडता पर प्रहार कर रहा है। इसके दूसरे छोर पर स्थापित एक दूसरा सच भी है। इस दूसरे सच के कई घटक हैं। इनमें से एक यह है कि नाटो शक्तियां सोवियत संघ के विघटन के बाद भी रूस को निरंतर कमजोर करने के प्रयास कर रही हैं।

दरअसल यूक्रेन में लड़ी जा रही लड़ाई एक तरह का शक्ति परीक्षण है। इसमें रूस एक शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है। कारण यह है कि दुनिया में इस समय अमेरिका और चीन के बीच शक्ति संतुलन के लिए चल रहे छद्मयुद्ध या यूं कहें कि सीमित शीतयुद्ध के बीच रूस को यह लग रहा है कि एक वैश्विक शक्ति केंद्र के रूप में अब उसे स्वीकार नहीं किया जा रहा है। शायद पुतिन इस उद्देश्य को पूर्वी यूरोप, दक्षिणी काॅकेशस और यूरेशिया पर नियंत्रण स्थापित करके पूरा करना चाहते हैं। लेकिन यह तभी संभव हो पाएगा जब यूक्रेन रूस के नियंत्रण में आ जाए। इसके लिए पुतिन केवल सैन्य युद्ध ही नहीं लड़ रहे हैं बल्कि वे रूस के भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक हितों को उत्तर और दक्षिण में विस्तार देने की रणनीति भी अपना रहे हैं। 

अगर पुतिन की यह रणनीति सफल हो जाती है तो रूस के प्रभाव की परिधियां बैरेंट्स सागर से लेकर आर्कटिक महासागर तक विस्तृत हो जाएंगी जिसमें पूर्वी यूरोप, दक्षिणी कॉकेशस, यूरेशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका का हिस्सा भी शामिल होगा। यही वजह है कि रूस और चीन ‘अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक नए युग में प्रवेश’ करने की बात कर रहे हैं (4 फरवरी 2022 को शीतकालीन ओलंपिक खेलों के उद्घाटन के समय दोनों देशों के राष्ट्रपतियों का साझा बयान)। वे भले ही इसका उद्देश्य ‘दुनिया का टिकाऊ विकास’ बता रहे हों, लेकिन वास्तव में ड्रैगन और पांडा (बियर, जिम ओ नील द्वारा रूस की अर्थव्यवस्था को पांडा की संज्ञा दी गई थी) यानी ड्रैगनबियर का वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं अधिक जटिल और गैरसंभ्रांत है।)

यही नहीं, यूरेशिया में अमेरिका और यूरोप के प्रभुत्व को कम करने के लिए रूस और चीन प्रतिबद्ध दिख रहे हैं। यही वजह है कि रूस और चीन ने अपने-अपने सीमा विवादों को नेपथ्य की ओर धकेल कर भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक रणनीति को वरीयता दी है। ध्यान रहे कि फरवरी माह में द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने ऐलान किया था कि उनकी ‘दोस्ती की कोई सीमा नहीं’ है। यही बात अमेरिका और यूरोप के लिए सिरदर्द है। दोनों ही यह नहीं चाहते कि रूस यूरेशिया में अपनी मजबूत पकड़ बना पाए या पूर्वी यूरोप, दक्षिणी काॅकेशस और यूरेशिया में एक शक्ति के रूप में स्थापित हो सके। इस दिशा में नाटो काफी पहले से अपना खेल खेल रहा है, लेकिन अब रूस इस पर विराम लगाना चाहता है और विराम के लिए संभवतः एक युद्ध की जरूरत थी। इस युद्ध का मैदान यूक्रेन को बनना था।

सही अर्थों में तो इस युद्ध में एक तरफ रूस है और दूसरी तरफ नाटो है। यूक्रेन तो केवल मोहरा है जबकि इसकी कीमत चुका रहे हैं यूक्रेन के नागरिक। जो भी हो, अमेरिका और यूरोप इसलिए खुश हो सकते हैं कि वे इस युद्ध में रूस को काफी नुकसान पहुंचाने में सफल रहे हैं। दूसरी तरफ पुतिन को इस बात की खीझ हो सकती है कि रूसी फौज यूक्रेन और जेलेंस्की को सबक क्यों नहीं सिखा पाई। लेकिन खुशी और खीझ के बीच का जो सच है वह नेपथ्य में चला गया। इसलिए यह सवाल लगातार छूटता जा रहा है कि यूक्रेन को युद्ध का मैदान आखिर बनाया किसने?

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