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विजय दर्डा का ब्लॉग: अफगानिस्तान की फैशन से बुलेट तक की खौफनाक त्रासदी

By विजय दर्डा | Updated: August 23, 2021 08:07 IST

अमेरिका जिस तालिबान को कुचलने आया था, उसी के क्रूर चुंगल में वह अफगानिस्तान को फिर क्यों सौंप गया?

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इसी कॉलम में पिछले महीने के आखिरी हफ्ते में मैंने अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे वाले इलाकों में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हैवानियत और वहशीपन का जिक्र किया था. मैंने लिखा था कि दुनिया इस जुल्म के खिलाफ इस कदर चुप कैसे बैठ सकती है? उस वक्त यह कल्पना भी नहीं थी कि जुल्मी तालिबान महीने भर के भीतर काबुल के राष्ट्रपति भवन में बैठा होगा और अफगानिस्तान का राष्ट्रपति चुपके से देश छोड़कर भाग खड़ा होगा! 

मगर यह सब हुआ और मौजूदा वक्त का काला सच यही है कि पंजशीर के इलाके को छोड़ कर बाकी सारा मुल्क तालिबानियों के कब्जे में है. न जाने कितने लोग इस क्रूरता का शिकार होंगे और न जाने कितनी लड़कियों को तालिबानी आतंकी नोच डालेंगे! अफगानिस्तान को फिर अंधेरी काल कोठरी में डाल दिया गया है!

अफगानिस्तान को आप त्रसदी की सरजमीं कह सकते हैं. पहले इसे अंग्रेजों ने लूटा, फिर वहां रूस घुस आया. रूस का वर्चस्व वहां न बने इसलिए अमेरिका ने तालिबानियों को न केवल प्रशिक्षण दिया बल्कि ढेर सारा पैसा और बहुत सारे हथियार भी दिए. गांव-गांव हथियार के केंद्र बन गए. आज भी वहां सब्जियों की मंडी की तरह हथियारों की मंडी लगती है. सारे अत्याधुनिक हथियार उन मंडियों में मिल जाते हैं. 

कभी हिंदूकुश में प्यार और मोहब्बत की गूंज सुनाई देती थी, अमन की बांसुरी बजती थी. वह धुन ही बदल गई. बारह-पंद्रह साल के बच्चे एके-47 राइफल लेकर घूमने लगे. कबीले एक दूसरे पर हुकूमत जताने लगे. खून की होली खेली जाने लगी.

खैर, रूस तो वहां से निकल गया लेकिन अफगानिस्तान आतंकियों की पनाहगार बन गया. अलकायदा सरगना लादेन ने जब अमेरिका पर 9/11 का हमला किया तब क्रोधित अमेरिका अफगानिस्तान में घुस आया. लादेन को पाकिस्तान के ऐबटाबाद शहर में अमेरिका ने मार गिराया लेकिन अफगानिस्तान में भारी जंग के बावजूद तालिबान का सफाया वह न कर पाया क्योंकि पाकिस्तान और चीन तालिबान के मददगार बन चुके थे. 

आतंकियों का उपयोग वे भारत के खिलाफ भी कर रहे थे लेकिन अमेरिका कुछ नहीं कर पा रहा था क्योंकि वह अपने घरेलू मोर्चे पर परेशान था. अमेरिकी   अवाम पूछ रही थी कि क्या दुनिया भर का ठेका हमने ही ले रखा है? वहां की अवाम को लग रहा था कि अफगानिस्तान की जंग भी उनके लिए वियतनाम साबित हो रही है.

डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका से बाहर निकलने का फैसला किया. तालिबान के साथ दोहा में शांति वार्ता शुरू हुई लेकिन समस्या यह थी कि तालिबान में भी कई गुट हैं, किससे बात की जाए? सिलसिला चलता रहा और जो बाइडेन ने आकर जल्दी मचा दी. आश्चर्यजनक रूप से बातचीत में अफगानिस्तान की गनी सरकार को भी शामिल नहीं किया गया. 

अमेरिका चाहता तो तालिबान के सामने कड़ी शर्ते रख सकता था लेकिन उसे तो भागने की जल्दी थी. तालिबान ने इसे समझ लिया और अमेरिका के निकलने से पहले ही उसने मुल्क पर कब्जा कर लिया. अमेरिका देखता रहा इसलिए शंका होती है कि कहीं कोई सांठगांठ तो नहीं थी? जिस तालिबान को नेस्तनाबूद करने के लिए अमेरिका आया था, उसी के क्रूर चंगुल में फिर क्यों अफगानिस्तान को छोड़ गया?

पिछले बीस सालों में हेलमंद (अफगानिस्तान की सबसे लंबी नदी) में बहुत सा पानी और ढेर सारा खून बहा लेकिन वहां के नागरिकों की किस्मत कुछ भी नहीं बदली. फिर उसी काली रात ने दबोच लिया! जब भी जंग होती है तो उसका पहला शिकार महिलाएं, बच्चे और बेटियां होती हैं. मलाला की कहानी तो याद ही होगी आपको. उसे गोलियों से छलनी कर दिया था क्योंकि वह बेटियों की शिक्षा की पक्षधर थी. 

तालिबानी आ गए हैं तो अफगानिस्तान में बेटियों की जिंदगी फिर दूभर हो गई है. आपने दृश्य देखे होंगे कि एयरपोर्ट पर महिलाएं अपने बच्चों को विदेशी सैनिकों की ओर फेंक रही हैं ताकि किसी तरह उनकी जिंदगी बच जाए. कितना खौफनाक दृश्य है यह! गनी सरकार के दौर में वर्ल्ड बैंक और एशियन बैंक ने युवकों को रोजगार, बच्चों को शिक्षा और खेल के मैदान के लिए जो प्रयास किए थे वह सब हवा में रह गया. खेतीबारी तो वहां कुछ खास है नहीं तो युवा आखिर क्या करें?

जहां तक भारत का सवाल है तो हमने वहां तीन बिलियन डॉलर विकास पर खर्च किए हैं. जिस संसद भवन को भारत ने तैयार किया है वहां अब तालिबानी बैठेंगे! भारत के लिए तालिबान से तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा. मेरी राय यही है कि भारत को फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए. उसे मान्यता देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. वह एक कट्टर विचार है हमेशा पाकिस्तानी भाषा ही बोलेगा!

..और जहां तक अफगानिस्तान का सवाल है तो क्या कभी पचास साल पुराने दिन वापस लौटेंगे? पचास साल पहले वह फैशन हब था. वहां से फैशन पत्रिकाएं प्रकाशित होती थीं. फैशन शो होते थे. वहां की महिलाओं का पहनावा यूरोप के देशों की महिलाओं जैसा होता था. मोहम्मद कयूमी नाम के व्यक्ति द्वारा खींची गई तस्वीरें उस दौर की कहानी कहती हैं. 

महिलाएं पेंसिल सैंडल, स्कर्ट और फैशनेबल शर्ट पहनती थीं. विश्वविद्यालयों के कैंपस में रौनक होती थी. थियेटरों का जलवा था. लड़कियां जिंदगी के हर क्षेत्र में आगे थीं. 1996 से 2001 के बीच जब तालिबानी सत्ता में थे तो पूरा देश किसी मध्ययुगीन काल में चला गया. वे फिर लौट आए हैं.  फिर वही काली रात..!

सॉरी, अफगानिस्तान! चांद पर झंडा फहराने, अंतरिक्ष की सैर करने और मंगल पर पानी तलाशने वाली ये दुनिया तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पा रही है बल्कि तुम इन ताकतों के शिकार होकर रह गए हो! तुम्हें खुद इस काली रात में उजाला फैलाना होगा. धैर्य रखो, हिम्मत रखो और अपने भीतर की ऊर्जा को इतना जगाओ कि अंधेरी काली रात को उजाला नेस्तनाबूद कर दे.

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