पूरी दुनिया सांसें थामकर बैठी थी. वो सात अप्रैल की शाम थी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कह दिया था कि होर्मुज नहीं खुला तो ईरानी सभ्यता के लिए आज की रात आखिरी होगी. मगर कुछ ही घंटों बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने घोषणा की कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हो गया है. ट्रम्प ने तेवर बदले और सोशल मीडिया पर दो हफ्ते के युद्धविराम की घोषणा कर दी. इसके साथ ही पाकिस्तान की वाहवाही होने लगी कि उसने वो कर दिखाया जिसकी उम्मीद नहीं थी! भारत में तो नरेंद्र मोदी के विरोधियों के हाथ जैसे जैकपॉट लग गया.
पूछा जाने लगा कि इस तरह का समझौता भारत क्यों नहीं करा पाया? पाकिस्तान ने बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल कर ली है और भारत को इससे बड़ा झटका लगा है. इस तरह के बयानों को पढ़कर मुझे हैरत हो रही थी! क्या विदेशी मामलों को भी देशी राजनीति के नजरिये से देखा जाना उचित है? क्या इस बात का विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए कि पाकिस्तान मध्यस्थ क्यों बना और क्या भारत के लिए वाकई कोई भूमिका थी? मुझे नहीं लगता कि अमेरिका-इजराइल और ईरान की जंग में भारत के लिए कोई खास भूमिका थी. इसमें कोई संदेह नहीं कि इजराइल हमारा भरोसेमंद दोस्त है,
ईरान के साथ भी हमारे रिश्ते मधुर ही रहे हैं लेकिन अमेरिका जानता है कि भारत किसी का पिछलग्गू राष्ट्र नहीं है. भारत जो भी बात करेगा, सोच-समझ कर और 24 कैरेट सच्ची बात ही करेगा. अमेरिका को ऐसा कोई मध्यस्थ नहीं चाहिए था. अमेरिका के लिए पाकिस्तान ही मुफीद राष्ट्र है जो अपनी तमाम अविश्वसनीयता और धोखेबाजी के बावजूद अमेरिका की ही भाषा बोलना और सुनना जानता है.
उसने ट्रम्प को शांतिदूत तक कह दिया था और शांति का नोबल प्राइज देने की अनुशंसा भी की थी. ऐसा साथी कहां मिलेगा? इसके अलावा ईरान के साथ पाकिस्तान करीब 900 किलोमीटर की सीमा साझा करता है इसलिए ईरान ने भी उसे संदेशवाहक की तरह स्वीकार किया. वैसे चीन भी यही चाहता था कि पाकिस्तान में ही बातचीत हो.
इसलिए पाकिस्तान सामने आया. उसकी खुद की क्या ऐसी हैसियत है कि वह अमेरिका को भी किसी बात पर मना ले और ईरान को भी मना ले? इस युद्धविराम में वह महज डाकिये की भूमिका में है. और जहां तक इस्लामाबाद में बैठक का सवाल है तो पाकिस्तान को निश्चित रूप से इसकी वाजिब कीमत भी मिलेगी.
वैसे भी पाकिस्तान को इस वक्त मदद की बहुत जरूरत है क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात ने 3.5 अरब डॉलर का कर्ज और डिपॉजिट लौटाने के लिए कहा है. यह कर्ज पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 18 प्रतिशत है. पाकिस्तान चाहता था कि कर्ज का एक्सटेंशन हो जाए, केवल ब्याज देते रहने से काम चले लेकिन लाख मिन्नतों के बावजूद यूएई राजी नहीं हुआ.
वैसे कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि यूएई ने भारत के उकसावे पर ऐसा कदम उठाया. पाकिस्तान के सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने खुद यूएई को यह मशविरा जारी किया कि यूएई में 43 लाख लोग भारत के हैं, ये जो दोस्ती बढ़ रही है, उसका नतीजा कहीं ये न हो कि आप भी अखंड भारत का हिस्सा बन जाएं. मेरी नजर में निश्चय ही मुशाहिद हुसैन बकवास कर रहे हैं.
भारत वसुधैव कुटुम्बकम की नीति पर चलता है और हम तो दिल से दुआ करते हैं कि हमारा पड़ोसी पाकिस्तान भी खूब फले-फूले! मगर पाकिस्तान एक तरफ भीख का कटोरा लेकर घूमता रहता है तो दूसरी ओर आतंक की फैक्ट्री चलाता है. वैसे मुशाहिद हुसैन को मैं याद दिलाना चाहूंगा कि पाकिस्तान ने हाल ही में सऊदी अरब से रक्षा करार किया है तो क्या इससे यूएई नाराज नहीं हुआ होगा?
अभी ईरानी हमला सबसे ज्यादा यूएई पर हुआ. दो हजार से ज्यादा मिसाइलें यूएई पर दागी गईं लेकिन युद्धविराम की बातचीत में यूएई को शामिल नहीं किया गया. इसीलिए यूएई ने युद्धविराम की तारीफ तो की लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया. ध्यान रखिए मिस्टर मुशाहिद हुसैन कि यूएई बड़े दिल वाला देश है जो अपने यहां मंदिर भी बनाने की इजाजत देता है.
वैसे युद्धविराम की घोषणा की तारीफ करते हुए बांग्लादेश ने भी तो पाकिस्तान का नाम नहीं लिया! तो क्या ये मशविरा भी भारत ने दिया? जी नहीं! बांग्लादेश की नई सरकार को समझ में आ गया है कि यदि वह पाकिस्तान की ओर झुकी तो बर्बादी निश्चित है. पाकिस्तान ने मोहम्मद यूनुस के माध्यम से कोशिश की थी कि बांग्लादेश कट्टरपंथी राह पर चले.
मगर उसकी आसुरी खुशी टिक नहीं पाई और बांग्लादेश की अवाम ने लोकतंत्र का रास्ता चुना. बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान लिबरल और लोकतांत्रिक सोच वाले व्यक्ति हैं. उनके विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर रहमान ने अभी-अभी भारत की यात्रा की. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ बैठक के बाद एक साथ डिनर किया.
अगले दिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ मुलाकातें हुईं और फिर एस. जयशंकर के साथ एक ही विमान में मॉरीशस के लिए रवाना हो गए. पाकिस्तान परेशान है कि दोनों देशों के मंत्रियों में बातचीत क्या हुई?
मगर दोनों देशों ने चुप्पी साध रखी है. स्पष्ट है कि बांग्लादेश और भारत एक बार फिर बेहतर रिश्ते की राह पर निकल पड़े हैं. अब इससे पाकिस्तान के कलेजे में आग लगी है तो हम क्या करें? जलना उसकी किस्मत में है तो जलता रहे!