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अफगानिस्तान : वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग- तालिबान को लेकर पाकिस्तान की दुविधा

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: August 21, 2021 10:31 IST

पाकिस्तान ने तालिबान को हथियार, पैसा, प्रशिक्षण और रहने को जगह दी है. इसका अर्थ सारी दुनिया ने यह लगाया कि तालिबान उसकी कठपुतली बनकर रहेगा लेकिन ऐसा समझने वाले लोग अफगान पठानों का मूल चरित्र नहीं समझते.

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ठळक मुद्देअगर अफागनिस्तान में तालिबान निरंकुश हुए तो पाकिस्तान के लिए ये भी खतरा हैदुनिया के शक्तिशाली देश भी इसके आगे नहीं टिके तालिबान भविष्य में पाकिस्तान का सबसे बड़ा सिरदर्द बन सकता है

दिल्ली :   भारत के लोग समझ रहे हैं कि काबुल में तालिबान के आ जाने से पाकिस्तान की पौ बारह हो गई है. यह ठीक है कि यदि पाकिस्तान मदद नहीं करता तो तालिबान का जिंदा रहना ही मुश्किल होता. पाकिस्तान ने उन्हें हथियार, पैसा, प्रशिक्षण और रहने को जगह दी है. इसका अर्थ सारी दुनिया ने यह लगाया कि तालिबान उसकी कठपुतली बनकर रहेगा लेकिन ऐसा समझने वाले लोग अफगान पठानों का मूल चरित्र नहीं समझते. अफगानों से बढ़कर आजाद स्वभाव वाले लोग सारी दुनिया में नहीं हैं. उन्होंने 1842 में ब्रिटिश सेना के 16000 जवानों में से 15999 को मौत के घाट उतार दिया था. अन्य दो हमलों में फिर उसने ब्रिटेन को मात दी. उसके बाद उसने 30-40 साल पहले रूस के हजारों सैनिकों को मार भगाया और अब 20 साल छकाने के बाद अमेरिकी फौज को धूल चटा दी.

दुनिया के तीन बड़े देशों की नाक नीची करने वाले अफगान क्या पाकिस्तान की फौज के आगे अपनी नाक रगड़ेंगे? कदापि नहीं. पाकिस्तान के नेता, फौजी और इतिहास के विद्वान इन तथ्यों से अनजान नहीं हैं इसीलिए वे जश्न तो मना रहे हैं लेकिन उनसे पूछिए कि वे कितने पसीने में तर हो गए हैं? यदि तालिबान पाकिस्तान की कठपुतली होते तो क्या वजह है कि अभी तक काबुल में नई सरकार शपथ नहीं ले सकी है? पाकिस्तान के हुक्मरानों को डर है कि यदि काबुल में तालिबान की निरंकुश सत्ता कायम हो गई तो वह पाकिस्तान का सबसे बड़ा सिरदर्द होगा. तालिबान आंदोलन में कई फिरके हैं. ‘तहरीके-तालिबान पाकिस्तान’ तो पाकिस्तान के अंदर रहकर उसके खिलाफ कार्रवाई करता रहा है.

1983 में जब पेशावर के जंगलों में मैं पहली बार मुजाहिदीन नेताओं से मिला तो वे कहते थे कि पेशावर तो हम पठानों का है. पाकिस्तान ने उस पर जबरन कब्जा कर रखा है. वे 1893 में अंग्रेजों द्वारा खींची गई डूरंड सीमा-रेखा को बिल्कुल नहीं मानते. आज तक किसी भी अफगान सरकार ने उसे मान्यता नहीं दी है बल्कि सरदार दाऊद के प्रधानमंत्री काल में तीन बार पाक-अफगान युद्ध की नौबत आ खड़ी हुई थी इसीलिए अब पाकिस्तान की कोशिश है कि काबुल में एक मिलीजुली सरकार कायम हो जाए. उसे पता है कि यदि काबुल में कोहराम मच गया तो लाखों अफगान शरणार्थी उनके यहां घुस आएंगे.

यदि काबुल की सरकार स्थिर और मजबूत हो तो अफगानिस्तान खनिजों का भंडार है. वह दक्षिण एशिया का सबसे मालदार देश बन सकता है. यदि काबुल की सत्ता अल्पदृष्टि वाले संकुचित हाथों में चली गई तो अफगानिस्तान अस्थिरता के गहरे कीचड़ में फिसल सकता है. 

टॅग्स :अफगानिस्तानतालिबानपाकिस्तान
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