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पाकिस्तान में परीक्षा के दौर से गुजरता लोकतंत्र

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: February 15, 2024 10:46 IST

पाकिस्तान में आठ फरवरी को हुए चुनाव के करीब एक हफ्ते बाद आखिरकार राजनीतिक धुंध छंटती नजर आ रही है और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के शहबाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद बंध रही है।

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ठळक मुद्देपाकिस्तान में हुए आम चुनाव के करीब एक हफ्ते बाद राजनीतिक धुंध छंटती नजर आ रही हैपीएमएल-एन) के शहबाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद बंध रही हैहालांकि शहबाज शरीफ ने पीएमएल-एन के प्रमुख नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने की बात कही थी

पाकिस्तान में आठ फरवरी को हुए चुनाव के करीब एक हफ्ते बाद आखिरकार राजनीतिक धुंध छंटती नजर आ रही है और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के शहबाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद बंध रही है। शहबाज ने हालांकि पीएमएल-एन के प्रमुख नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने की बात कही थी, लेकिन नवाज शरीफ ने शहबाज शरीफ का नाम आगे कर दिया है।

हालांकि चुनाव के पहले ही पीएमएल-एन की जीत तय होने की बात कही जा रही थी क्योंकि उसे सेना का साथ मिला हुआ था लेकिन आश्चर्यजनक रूप से निर्दलीय उम्मीदवारों ने 101 सीटें जीत लीं, जिनमें अधिकतर जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी द्वारा समर्थित उम्मीदवार थे। चूंकि चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के कारण पीटीआई चुनाव नहीं लड़ सकती थी, इसलिए उसने निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन दिया था।

इसके बावजूद 75 सीटें हासिल करने वाली पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन सरकार बनाने जा रही है क्योंकि उसे 54 सीटें जीतने वाली पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सहित कई छोटे दलों ने समर्थन दे दिया है। भारत के नजरिये से अगर देखा जाए तो हमारे इस पड़ोसी देश में लोकतांत्रिक सरकार के गठन की उम्मीद शुभ संकेत है क्योंकि सेना जब तक वहां हावी रहेगी, भारत के साथ उसके संबंध सामान्य नहीं हो सकते।

पड़ोसी देश के साथ युद्ध का डर दिखाकर ही वहां की सेना अपना प्रभुत्व बनाए रख सकती है. इसलिए अगर वहां लोकतांत्रिक सरकार के गठन की उम्मीद बंध रही है तो हमें खुश होना चाहिए कि अब दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होंगे लेकिन मामला इतना सरल नहीं है। सेना के जोर लगाने के बावजूद पीएमएल-एन बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह गई है, जबकि एक पार्टी के रूप में चुनाव न लड़ पाने के बावजूद पीटीआई अपने जीते हुए समर्थक उम्मीदवारों के संख्या बल के हिसाब से सबसे आगे है।

यह इस तथ्य के बावजूद है कि पीटीआई के नेताओं ने चुनाव में धांधली और कई सीटों पर अपने उम्मीदवारों के जीतने के बावजूद उन्हें हारा हुआ घोषित करने का आरोप लगाया है। जाहिर है कि सरकार गठित कर लेने के बावजूद नवाज शरीफ की पार्टी के पक्ष में जनमत होने के बारे में संशय बना रहेगा। चूंकि सेना का उसे जिताने में बड़ा योगदान रहा है, इसलिए वह सरकार के कंधे पर अपनी बंदूक रखकर चलाना चाहेगी।

अगर यह कहा जाए कि लोकतंत्र के मुखौटे में सेना ही वहां अभी भी सरकार चलाएगी तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसलिए पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार गठित होने के बावजूद  भारत के साथ उसके संबंध सुधरने की उम्मीद कम ही है। पाकिस्तान का यह दुर्भाग्य है कि सेना वहां लोकतंत्र को मजबूत नहीं होने दे रही है, जिससे वह बदहाली के दौर से गुजर रहा है और सैन्य अधिकारी देश को लूट-खसोट कर अकूत संपत्ति जुटाने में लगे हुए हैं।

टॅग्स :पाकिस्तान चुनावनवाज शरीफशहबाज शरीफइमरान खानबिलावल भुट्टो जरदारी
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