अलौकिक शांति की भूमि जैन विश्व भारती

By राजेंद्र दर्डा | Updated: April 30, 2026 05:15 IST2026-04-30T05:15:11+5:302026-04-30T05:15:11+5:30

लाडनूं राजस्थान के दीदवाना-कुचामन (पूर्व में नागौर) जिले में स्थित एक शहर और नगर पालिका है. यह दिल्ली से लगभग 380 किलोमीटर और जयपुर से लगभग 210 किमी दूर स्थित है. इसे तेरापंथ जैन समाज की राजधानी कहा जाता है.

Jain Vishva Bharati land of eternal peace blog Rajendra Darda | अलौकिक शांति की भूमि जैन विश्व भारती

file photo

Highlightsआचार्य की प्रेरणा किस प्रकार विश्व के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन की स्थली में परिवर्तित हो सकती है.वर्ष 1971 में नौवें आचार्य अणुव्रत अनुशास्ता तुलसीजी ने जैन विश्व भारती की स्थापना की नींव रखी थी.आचार्य महाप्रज्ञजी ने संस्था को आगे बढ़ाया और अब इसे वर्ष 2010 से आचार्य महाश्रमणजी नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं.

जिंदगी में कई आमंत्रण-निमंत्रण हमें मिलते हैं, जहां हम औपचारिकता निभाने के लिए जाते-आते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो जिंदगी के प्रति सोचने का नजरिया ही बदल देते हैं. ऐसा ही एक प्रेरणा पुंज है राजस्थान के लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती, जो एक मानद विश्वविद्यालय है. पिछले दिनों छत्रपति संभाजीनगर के जैन तेरापंथ के प्रमुख सुभाष नाहरजी के निमंत्रण पर सकल जैन समाज के प्रतिनिधिमंडल को ले जाने का अवसर मिला. वहां तेरापंथ के सर्वोच्च आचार्य महाश्रमणजी के दर्शन ग्रहण करने का सौभाग्य मिला और एक अनुभव मिला कि 55 वर्षों का सतत परिश्रम किसी संस्था-संस्थान को कितनी ऊंचाइयों पर ले जा सकता है. साथ ही एक आचार्य की प्रेरणा किस प्रकार विश्व के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन की स्थली में परिवर्तित हो सकती है.

लाडनूं राजस्थान के दीदवाना-कुचामन (पूर्व में नागौर) जिले में स्थित एक शहर और नगर पालिका है. यह दिल्ली से लगभग 380 किलोमीटर और जयपुर से लगभग 210 किमी दूर स्थित है. इसे तेरापंथ जैन समाज की राजधानी कहा जाता है. यहां पर वर्ष 1971 में नौवें आचार्य अणुव्रत अनुशास्ता तुलसीजी ने जैन विश्व भारती की स्थापना की नींव रखी थी.

बाद में आचार्य महाप्रज्ञजी ने संस्था को आगे बढ़ाया और अब इसे वर्ष 2010 से आचार्य महाश्रमणजी नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं. वर्तमान में जैन धर्म दर्शन और कला संस्कृति के अद्‌भुत शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में जैन विश्व भारती अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना विशेष महत्व प्राप्त कर चुकी है. यहां धर्म और विज्ञान का एक साथ समावेश होने के विचार को साकार किया जा रहा है.

यह एकमात्र ऐसा केंद्र है, जहां केजी से जैन धर्म में डॉक्टरेट(पीएचडी) तक की उपाधि मिलती है. यहां केवल जैन धर्म ही नहीं, अन्य धर्मों के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी किया जा सकता है. साथ ही उससे जुड़े किसी विषय पर पीएचडी तक की उपाधि ग्रहण की जा सकती है. जैन विश्व भारती में केवल अध्यापन ही नहीं, बल्कि साहित्य सृजन का भी बड़ा काम हो रहा है.

संस्था की ओर से 18 हजार किताबें प्रकाशित की जा चुकी हैं. यहां हजारों साल पुराने दस्तावेजों का संरक्षण किया गया है, जिन्हें देखने और पढ़ने के लिए उपलब्ध कराया जाता है. यहां सभी धर्मों की किताबें मिलती हैं. स्वाभाविक रूप से यहां का पुस्तकालय बहुत ही समृद्ध है. संस्था के परिसर में स्कूल-कालेज तो हैं ही, उनके साथ प्राकृतिक चिकित्सा का एक बड़ा केंद्र है.

परिसर में एक बड़ा अस्पताल भी है. इसके अतिरिक्त सैकड़ों लोगों के रहने के लिए सुंदर व्यवस्था है. जब हम लोग लाडनूं पहुंचे, तब वहां लगभग 430 साधु-साध्वियां और 54 श्रमणीजी निवास कर रहे थे. यह एक अनूठा आध्यात्मिक केंद्र इस दृष्टिकोण से भी है, क्योंकि यहां दीक्षा लेने वाले साधु-साध्वी को धर्म - ज्ञान का विधिवत प्रशिक्षण दिया जाता है.

इन दिनों यहां आचार्य श्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में 2026-27 योगक्षेम वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है. योगक्षेम में साधु-संतों, साध्वियों का ज्ञानवर्धन और संवर्धन किया जा रहा है. उन्हें विधिवत प्रशिक्षण के माध्यम से वह बातें बताई जाती हैं, जो उनके संज्ञान में नहीं हैं. यूं भी जैन धर्म का श्वेतांबर तेरापंथ संप्रदाय अनुशासन, ज्ञान आधारित शिक्षा और अपने उत्कृष्ट प्रबंधन के लिए पहचान रखता है.

समाज के दसवें आचार्य श्री महाप्रज्ञजी महान योगी, आध्यात्मिक दार्शनिक और विश्व के लिए प्रेक्षाध्यान के प्रदाता थे. लाडनूं में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रेक्षाध्यान शिविरों का आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश से लोग सहभागी होते हैं. उन्होंने ‘जीवन विज्ञान’ के माध्यम से मानवीय चरित्र निर्माण और ‘अणुव्रत आंदोलन’ के द्वारा नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना में अहम भूमिका निभाई.

वे अहिंसा और शांति के अग्रदूत थे. उन्होंने शांति सद्‌भाव को लेकर एक लाख किलोमीटर पदयात्रा की थी. ध्यान योग्य यह है कि आचार्यों के साथ चलने वाले साधु-संत यात्रा प्रबंधन में अलग कार्यों को संभालते हैं. उनका कार्य सरकारों के मंत्रिमंडल की तरह ही बंटा रहता है. आचार्य महाप्रज्ञजी की तरह ही वर्तमान आचार्य महाश्रमणजी ने अष्टवर्षीय राष्ट्रव्यापी अहिंसा यात्रा कर मानवता के उत्थान की एक नई महागाथा लिखी है. आपने भारत के 20 राज्यों सहित नेपाल, भूटान देशों की पदयात्रा कर सद्‌भावना, नैतिकता, नशामुक्ति का संदेश लाखों लोगों तक पहुंचाया है.

इन दिनों जैन विश्व भारती में अनेक विकास कार्य जारी हैं, जिन्हें जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंदजी लुंकड़, मंत्री सलिलजी लोढ़ा और धरमचंदजी लुंकड़ संभाल रहे हैं. क्षेत्र में अनेक फ्लैट बनाए गए हैं, जिनमें लोग रह सकते हैं. भारत के इस अलौकिक जैन धर्म केंद्र का भ्रमण अपने आप में अलग अनुभव है.

छत्रपति संभाजीनगर से मेरे साथ पहुंचे विधायक प्रशांतजी बंब, पूर्व न्यायमूर्ति कैलाशचंदजी चांदीवाल, पूर्व न्यायमूर्ति पुखराजजी बोरा, डॉ पुरुषोत्तमजी दरख, एडवोकेट रामेश्वरजी तोतला, श्री अनिलजी संचेती, श्री मीठालालजी कांकरिया, श्री झुंबरलालजी पगारिया, श्री इंदरचंदजी संचेती, श्री गौतमजी संचेती, श्री पंकजजी फुलफगर, श्री हीरालालजी भंडारी, श्री महावीरजी पाटनी, श्री पारसजी तातेड, श्री राजेशजी कांकरिया, डॉ सुशीलजी भारुका, डॉ शांतिलालजी सिंगी, डॉ प्रकाशजी झांबड़, श्री सचिनजी करवा, श्री विलासजी साहूजी और श्री राजेशजी पाटनी को मानद विश्वविद्यालय के कुलगुरु बच्छराजजी दुगड़ ने जैन विश्व भारती का भ्रमण और हर छोटी-बड़ी बात से अवगत कराया.

भोजन से लेकर सभी सुख-सुविधाओं का अनुभव कराया. निश्चित ही अपने तन-मन और पूरे जीवन से शुद्ध सात्विक और पवित्रता की पहचान के साथ तेरापंथ के साधु-संत और साध्वियां ज्ञान प्रकाश से अहिंसा के संदेश को निरंतर समूचे विश्व में प्रसारित करते हैं. जैन विश्व भारती वह अविस्मरणीय स्थान है, जहां मानवीय मूल्यों के साथ सेवा का भाव प्रखर रहता है. मुझे पूज्य आचार्य तुलसी के चरणों से पावन हुई लाडनूं की भूमि पर परम शांति और पवित्रता का अनुभव हुआ. निश्चित रूप से यह मेरे ही नहीं, बल्कि हजारों-लाखों लोगों के दिल की बात होगी.

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