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मानुषता को खात है रैदास जाति को रोग! कृष्ण प्रताप सिंह का ब्लॉग

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: February 27, 2021 12:13 IST

विक्रम संवत् 1441 से 1455 के बीच रविवार को पड़ी किसी माघ पूर्णिमा के दिन मांडुर नामक गांव में उनका जन्म हुआ. यह मांडुर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में मंडेसर तालाब के किनारे मांडव ऋषि के आश्रम के पास स्थित वही गांव है, जो अब मंडुवाडीह कहलाता है.

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ठळक मुद्देलोक प्रचलित नाम रैदास है जो उनकी रचनाओं में बार-बार आता है. पीड़ित के रूप में वे तत्कालीन धर्म व संस्कृति को उस रूप में न लें, जिसमें  दूसरे संत कवि ले रहे थे. संत रविदास ने अपने समय में जिन मानवतावादी मूल्यों के लिए संघर्ष किया, जैसे आदर्श समाज की कल्पना की.

हिंदी की भक्ति काव्यधारा में संत रविदास की अपनी सर्वथा अलग व विलक्षण पहचान है. लेकिन दूसरे संत कवियों की ही तरह उनके जन्म के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं मिलती.

जो मिलती है, उसके अनुसार विक्रम संवत् 1441 से 1455 के बीच रविवार को पड़ी किसी माघ पूर्णिमा के दिन मांडुर नामक गांव में उनका जन्म हुआ. यह मांडुर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में मंडेसर तालाब के किनारे मांडव ऋषि के आश्रम के पास स्थित वही गांव है, जो अब मंडुवाडीह कहलाता है.

उनके पिता का नाम रग्घू अथवा राघव था जबकि माता का करमा, जिन्हें सामाजिक गैरबराबरी के पैरोकार ‘घुरबिनिया’ कहते थे. उनका लोक प्रचलित नाम रैदास है जो उनकी रचनाओं में बार-बार आता है. उनके समय में अस्पृश्यता समेत वर्णव्यवस्था की नाना व्याधियां देश के सामाजिक मानस को आक्रांत कर सहज मनुष्यता का मार्ग अवरुद्ध किए हुए थीं. अन्त्यज के रूप में खुद उनकी जाति पर भी उनका कहर टूटता रहता था. वे इन व्याधियों को धर्म व संस्कृति का चोला पहन कर आती और स्वीकृति पाती देखते तो कुछ ज्यादा ही त्रास पाते थे.

ऐसे में स्वाभाविक ही था कि एक पीड़ित के रूप में वे तत्कालीन धर्म व संस्कृति को उस रूप में न लें, जिसमें  दूसरे संत कवि ले रहे थे. तभी तो वे अपनी रचनाओं में इन कवियों से अलग, प्रतिरोधी और वैकल्पिक नजरिये के साथ सामने आते और उस श्रमण संस्कृति से ऊर्जा ग्रहण करते दिखाई देते हैं जो उन दिनों की मेहनत-मजदूरी करने वाली जनता का एकमात्न अवलंब थी.

संत रविदास ने अपने समय में जिन मानवतावादी मूल्यों के लिए संघर्ष किया, जैसे आदर्श समाज की कल्पना की और अच्छे राज्य की जो अवधारणा पेश की, वह हू-ब-हू हमारे संवैधानिक संकल्पों जैसी है : ‘ऐसा चाहौं राज मैं जहं मिलै सभन को अन्न, छोट बड़ो सभ सम बसैं रैदास रहै प्रसन्न’.

यह अवधारणा उन्हें वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से भी आगे ले जाती है. इस तर्क तक कि जब सभी लोग हाड़-मांस व खून के ही बने हैं तो भिन्न या छोटे-बड़े कैसे हो सकते हैं : ‘जब सभ कर दोउ हाथ पग दोउ नैन दोउ कान, रविदास पृथक कइसे भये हिंदू औ मुसलमान?’ मानवीय नैतिकता के किसी भी नियम से इस पार्थक्य को सही नहीं ठहराया जा सकता और रविदास इसी बात को अपनी प्रतिभा, तर्कशक्ति, अनुभव व विवेक से सिद्ध करके बार-बार कहते हैं.

अन्त्यज श्रमजीवी के तौर पर गुजरी उनकी जिंदगी भी हमें कुछ कम संदेश नहीं देती. अब तो वह मिथक सी हो गई है. उनसे जुड़ा एक बहुप्रचारित मिथक ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ वाला है, जिसमें सिद्ध किया गया है कि मन मैला न हो तो कर्म व कर्तव्यपालन की कठौती भी गंगा है और मन में भरे हुए मैल को निकाले बिना गंगास्नान से भी कोई पुण्यखाता नहीं खुला करता. एक और किंवदंति है : वे अपनी साधुता के कारण घर से अलग कर दिए गए हैं और भीषण गरीबी में रहते हैं.

उनकी गरीबी दूर करने के लिए पारस पत्थर लाया जाता है, जिसमें ऐसी शक्ति है कि उसे जिस भी पत्थर में छुआ दिया जाए, वह सोने में बदल जाए. एक संत उनसे बार-बार अनुरोध करते हैं कि वे पारस का इस्तेमाल कर ढेर सारे पत्थरों को सोने में बदल लें और अमीर हो जाएं. रविदास उनकी अनसुनी करते रहते हैं.

लेकिन एक दिन संत का अनुरोध जिद में परिवर्तित हो जाता है, तो वे उनको दिखाकर अपनी रांपी उठाते और अपने माथे पर चुहचुहा रहे पसीने से छुआ देते हैं. रांपी सोने में बदल जाती है और जिद्दी संत का चेहरा बुझ जाता है. इस किंवदंति की शिक्षा इसके सिवा और क्या हो सकती है कि किसी श्रमजीवी के लिए उसका पसीना ही पारस पत्थर है और उसको पारस से ज्यादा अपने पसीने पर भरोसा करना चाहिए.

 भारतभूमि पर वे संभवत: पहले ऐसे संत हुए जिसने सम्यक आजीविका पर जोर देकर लोगों को नेक कमाई की शिक्षा दी और उसे ही धर्म मानने को कहा : ‘श्रम को ईस्वर जानि कै जो पूजै दिन रैन, रैदास तिनि संसार मा सदा मिलै सुख चैन.’ श्रम को ही ईश्वर बताने वाले अपने इस गुरु को वृद्धावस्था में उनकी प्रिय शिष्या मीरा ने आग्रहपूर्वक चित्ताैड़ बुलाया तो वहां कुछ विद्वेषियों ने धोखे से पत्नी लोना समेत रविदास की हत्या कर दी. तब इतिहास ने इस तथ्य को भारी हृदय के साथ अपने पृष्ठों में दोहराया और दर्ज किया : मानुषता को खात है रैदास जाति को रोग!

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