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कलराज मिश्र का ब्लॉग: अष्ट सिद्धि नव निधि दाता-रूद्रावतार हनुमान

By कलराज मिश्र | Updated: April 23, 2024 09:55 IST

हनुमान अतुलितबलधाम हैं. उनकी शक्तियों की तुलना किसी और से नहीं हो सकती है. धर्म की रक्षा के लिए उन्हें अमरता का वर मिला. इसलिए कलियुग में भी वह जागृत देव हैं.

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ठळक मुद्देहनुमान माता अंजना के पुत्र हैं. उनके पिता महाराज केसरी हैं.पर वह पवन देव के मानस पुत्र हैं, इसलिए पवन पुत्र हैं.

हनुमानजी भगवान शिव के रुद्रावतार हैं. अष्ट सिद्धियां और नौ निधियां प्राप्त हनुमानजी शक्ति एवं साहस के प्रतीक हैं. उनकी आराधना से व्यक्ति अपने भीतर स्वयमेव ऊर्जा का अनुभव करता है. भारतीय संस्कृति में हनुमान भगवान श्री राम की भक्ति के भी अद्भुत उदाहरण हैं. हमारे यहां पौराणिक कथाओं में आता है कि भगवान श्री राम से हनुमान ने यह वरदान मांगा था कि धरती पर जब तक रामकथा हो तब तक उनका भी जीवन बना रहे. इसीलिए आज भी हनुमान पृथ्वी के जीवंत देवता हैं. शरीर के साथ-साथ मन से भी वह अपार बलशाली हैं. उनके स्मरण मात्र से जीवन का बड़े से बड़ा संकट दूर हो जाता है, इसलिए वह संकटमोचक हैं. संत तुलसीदास जी रचित हनुमान चालीसा की चौपाइयां पढ़ेंगे तो पाएंगे हनुमानजी का पूरा जीवन-चरित्र उसमें समा गया है. हनुमान का पूरा जीवन ही प्रेरणा देने वाला है. 

कथा आती है कि वह जब छोटे बालक थे तब उन्हें एक दिन जोरों की भूख लगी. हनुमानजी ने सूर्य को फल समझकर निगल लिया. उस समय सूर्यग्रहण था और राहु सूर्य को ग्रस्त करने के लिए आया था. हनुमानजी का विशाल आकार और उनको सूर्य को निगलते देखकर राहु ने डरकर देवराज इन्द्र से शिकायत की. इन्द्र को ऐरावत पर चढ़कर आते देख पवनकुमार ने उसे बड़ा-सा सफेद फल समझा और उसी को पकड़ने के लिए चले. 

इस पर इन्द्र ने अपने वज्र से हनुमानजी के मुख पर जोरों से प्रहार किया, जिससे उनकी हनु यानी ठुड्डी टेढ़ी हो गई और वे पृथ्वी पर गिर पड़े. इससे कुपित होकर हनुमान के पिता वायुदेव ने अपना प्रवाह रोक दिया जिससे सबका श्वास अवरुद्ध होने लगा. यह देखकर ब्रह्माजी ने हनुमानजी को पूर्ण स्वस्थ कर उन्हें अमरत्व प्रदान किया और अग्नि-जल-वायु से उन्हें अभय प्रदान किया. इस प्रकार हनु के टेढ़ी हो जाने से वे ‘हनुमान’ कहलाए.

हनुमान माता अंजना के पुत्र हैं. उनके पिता महाराज केसरी हैं. पर वह पवन देव के मानस पुत्र हैं, इसलिए पवन पुत्र हैं. भगवान श्री राम के परमभक्त हैं, इसलिए राम दूत हैं. दूत का काम होता है अपने स्वामी का संदेश सुनना-सुनाना. हनुमान जी सारे जगत में अपने स्वामी प्रभु श्री राम का ही संदेश सुनाते हैं. तुलसी रचित रामचरित मानस के सुंदरकांड में हनुमान जी ने हर स्थान पर अपना परिचय अपने नाम के स्थान पर श्री राम दूत के रूप में ही दिया है.

हनुमान अतुलितबलधाम हैं. उनकी शक्तियों की तुलना किसी और से नहीं हो सकती है. धर्म की रक्षा के लिए उन्हें अमरता का वर मिला. इसलिए कलियुग में भी वह जागृत देव हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान हिमालय स्थित गंधमादन पर्वत पर रहते हैं. यह पर्वत अंजनाद्रि के नाम से जाना जाता है, यही हनुमान का जन्मस्थान भी है. 

बचपन में जब हनुमानजी ने सूर्य को फल समझकर खाने का प्रयास किया तो समस्त संसार में अंधकार छा गया था. इन्द्र ने उन पर वार किया तो वायुदेव नाराज हुए और चहुंओर प्राणवायु रूक गई. तब समस्त देवी- देवताओं ने वायुदेव को मनाया और बजरंगबली को दिव्य अस्त्र-शस्त्र भेंट किए. हनुमानजी को कुबेर ने गदा प्रदान की. हनुमानजी ने बाएं हाथ में गदा धारण की, इसलिए ‘वामहस्तगदायुक्तम’ कहे गए. 

उनकी गदा का नाम है कौमोदकी. इस गदा के एक वार से ही उन्होंने रावण के रथ को तहस-नहस कर दिया था. हनुमानजी बुद्धि और बल के दाता हैं. भगवान श्री राम ने हनुमानजी को प्रज्ञा, धीर, वीर, राजनीति में निपुण आदि विशेषणों से संबोधित किया है. हनुमानजी बल और बुद्धि से संपन्न हैं. उनको मानसशास्त्र, राजनीति, साहित्य, तत्वज्ञान आदि शास्त्रों का गहन ज्ञान है. बड़ी रोचक कथा है लक्ष्मणजी के मूर्छित होने के समय की. 

द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर जब हनुमान लौट रहे थे तब रावण को इस बात का पता चल गया. रावण ने शनिदेव को उनके पीछे लगा दिया. हनुमानजी ने तब अपने बल और बुद्धि से शनि को बांध दिया. शनिदेव बहुत परेशान हुए और हार मान ली. कहते हैं तब हनुमानजी ने इस शर्त पर शनि को माफ किया कि कोई भी व्यक्ति शनि से पीड़ित होगा और भगवान श्री राम का जाप करेगा तो वह उसे परेशान नहीं करेंगे.

हनुमान इसीलिए संकटमोचक हैं कि वह इसी तरह मनुष्य को हर संकट से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं. हनुमान मानव जीवन की प्रेरणा के स्रोत हैं. वह यह सीख देते हैं कि कैसे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण रखते हुए कार्य करें और लक्ष्य प्राप्ति तक विश्राम न करें. उनका जीवन श्री राम के हर आदेश का पालन करते हुए उसे सफल तरीके से सिद्ध करते स्वामिभक्ति और निमित्त मात्र होते कार्य करने का संदेश है. 

बल और बुद्धि का कैसे समुचित उपयोग किया जाए, यह हनुमानजी के जीवन-चरित से समझा जा सकता है. उन्हें जब जरूरत पड़ी तो उन्होंने अपने आपको छोटे स्वरूप में बदल लिया और सुरसा के मुंह के भीतर जाकर बाहर निकल आए और आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने पूंछ को बढ़ाकर पूरी लंका को भस्म कर दिया. ऐसे बजरंगबली के जन्मोत्सव पर उन्हें स्मरण करते, उनसे सीख लेते हुए भव सागर की हर बाधा पार करने का प्रयास करें.

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