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गौरीशंकर राजहंस का ब्लॉग: चीन में प्रवासी मजदूरों का शोषण

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 16, 2020 14:56 IST

चीन की सरकार ने इनके साथ धोखा किया. चीन में वहां के स्थानीय मजदूरों को सेवामुक्ति के बाद अच्छी रकम पेंशन के रूप में मिलती है. परंतु जब ये प्रवासी मजदूर अपनी पेंशन लेने जाते हैं तब इनसे कहा जाता है कि उनकी पेंशन में बहुत सी खामियां हैं

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ठळक मुद्देआज की तारीख में चीन संसार का एक अत्यंत समृद्ध देश है चीन में सारी दुनिया से मजदूर गए

आज की तारीख में चीन संसार का एक अत्यंत समृद्ध देश है, परंतु कुछ वर्ष पहले या यूं कहा जाए कि एक पीढ़ी पहले यह एक पिछड़ा हुआ देश था. उस समय किसी ने सोचा भी नहींं था कि चीन एक दिन इतना समृद्ध देश बन जाएगा. चीन में सारी दुनिया से मजदूर गए. तत्कालीन अंग्रेज शासकों ने  लाखोें मजदूरों को चीन में बुला लिया.

ये मजदूर समझ नहीं पा रहे थे कि वे कहां जा रहे हैं और उन्हें क्या काम करना होगा. चीन के दलदली प्रांतों में पहुंचकर उन्होंने महसूस किया कि उनके साथ धोखा हुआ है. समय बीतता गया और ये मजदूर गांव-घर छोड़कर उन जगहों में आ गए जहां कल-कारखाने थे. यहां आकर उन्होंंने कड़ी मेहनत की और चीन को समृद्ध देश बना दिया.  

परंतु चीन की सरकार ने इनके साथ धोखा किया. चीन में वहां के स्थानीय मजदूरों को सेवामुक्ति के बाद अच्छी रकम पेंशन के रूप में मिलती है. परंतु जब ये प्रवासी मजदूर अपनी पेंशन लेने जाते हैं तब इनसे कहा जाता है कि उनकी पेंशन में बहुत सी खामियां हैं, उन्होंने समय पर अपनी पेंशन की रकम जमा नहीं की थी. अधिकतर मजदूर अनपढ़ हैं. हजारों मजदूर भारत और दूसरे पड़ोसी देशोें से चीन गए थे.

अंग्रेजों और बाद की साम्यवादी सरकार ने इनसे कड़ी मेहनत कराई जिसका नतीजा यह है कि आम मजदूर के हाथों की उंगली भी पूरी नहीें बची और वे अच्छी तरह चाय का कप पकड़कर चाय भी नहीं पी सकते हैं. दुखी होकर बहुत से मजदूरोें ने आत्महत्या कर ली. परंतु चीन की सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. विदेशी पर्यटक जब प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा देखते हैं तो सन्न रह जाते हैं. चीन की कठोर सरकार प्रवासी मजदूरोंं से उन्हें मिलने भी नहीं देती है. अब वहां धीरे-धीरे विद्रोह की आंंधी उठ रही है और जो बूढ़े मजदूर कल तक लाचार होकर चीन की सरकार की सेवा करते थे वे अब ऐसा करने से मना कर रहे हैंं.

सारे संंसार की नजरें चीन पर लगी हुई हैंं और लोग इस बात का आकलन कर रहे हैंंं कि क्या वे प्रवासी मजदूर जो सारे संसार से चीन में आए हैंंं, इसी  तरह घुट-घुट कर मर जाएंगे.  कुल मिलाकर चीन ने लोहे की जंजीर के बल पर अपने देश की तरक्की तो कर ली परंतु जहां तक मानवाधिकारों का सवाल है, उसमें वह बहुत पिछड़ गया है.

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