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पंकज चतुर्वेदी का ब्लॉग: दिल्ली में उथली यमुना लेती है बदला

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: July 13, 2024 08:06 IST

देश की राजधानी दिल्ली भी अजब है, जब पानी की कमी को लेकर अनशन, धरने-प्रदर्शन चल रहे थे, ठीक उसी समय आषाढ़ की पहली फुहार गिरी और शहर के कई हिस्सों में बस-डुब्बा पानी भर गया.

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ठळक मुद्देनेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश भी बेमानी ही साबित हो रहे हैं.ऐसे में नदी के प्रवाह से उपजे प्रतिगामी बल से नाले फिर पलट कर सड़कों को दरिया बना देते हैं. वैसे एनजीटी सन्‌ 2015 में ही दिल्ली  के यमुना तटों पर निर्माण पर पाबंदी लगा चुका है लेकिन इससे बेपरवाह सरकारें मान नहीं रहीं.

देश की राजधानी दिल्ली भी अजब है, जब पानी की कमी को लेकर अनशन, धरने-प्रदर्शन चल रहे थे, ठीक उसी समय आषाढ़ की पहली फुहार गिरी और शहर के कई हिस्सों में बस-डुब्बा पानी भर गया. क्या मिंटो रोड तो क्या नवनिर्मित प्रगति मैदान की सुरंग, हर जगह पानी ने शहर की रफ्तार थाम दी. जिस शहर के बीचोंबीच से  27 किमी तक यमुना बहती है, वह शहर उसी यमुना का पानी 104 किमी दूर करनाल से मूनक नहर के जरिये लेता है. 

कभी कोई सोचता नहीं कि दिल्ली की बाढ़ और सुखाड़ का असल कारण तो कालिंदी के किनारों के प्रति बरती गई क्रूरता है, जिसने नदी को नाले से बदतर कर दिया. यदि केवल यमुना को अविरल बहने दिया जाए, उससे जुड़े तालाबों और नहरों को जिला दिया जाए और उसमें गंदगी न डाली जाए तो दिल्ली से दुगुने बड़े शहरों को पानी देने और बारिश के चरम पर भी हर बूंद को अपने में समेट लेने की क्षमता इसमें है.

दिल्ली में जल भराव का कारण यमुना का गाद और कचरे के कारण इतना उथला हो जाना है कि यदि महज एक लाख क्यूसेक पानी आ जाए तो इसमें बाढ़ आ जाती है. नदी की जल ग्रहण क्षमता को कम करने में बड़ी मात्रा में जमा गाद (सिल्ट), रेत, सीवरेज, मलबा और तमाम तरह के कचरे का योगदान है. नदी की गहराई कम हुई तो इसमें पानी भी कम आता है. 

आजादी के 77 साल में कभी भी नदी की गाद साफ करने का कोई प्रयास हुआ ही नहीं, जबकि नदी में कई निर्माण परियोजनाओं के मलबे को डालने से रोकने में एनजीटी के आदेश नाकाम रहे हैं. सन्‌ 1994 से लेकर अब तक यमुना एक्शन प्लान के तीन चरण आ चुके हैं, हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, पर यमुना में गिरने वाले दिल्ली के 21 नालों की गाद भी अभी तक नहीं रोकी जा सकी. 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश भी बेमानी ही साबित हो रहे हैं. फिर जब महानगर के बड़े नाले गाद से बजबजाते हैं तो जल भराव की चोट दोधारी होती है– जब नाले का पानी नदी की तरफ लपकता है और उथली नदी में पहले से ही नाले के मुंह तक पानी भरा  होता है. ऐसे में नदी के प्रवाह से उपजे प्रतिगामी बल से नाले फिर पलट कर सड़कों को दरिया बना देते हैं. 

वैसे एनजीटी सन्‌ 2015 में ही दिल्ली  के यमुना तटों पर निर्माण पर पाबंदी लगा चुका है लेकिन इससे बेपरवाह सरकारें मान नहीं रहीं. अभी एक साल के भीतर ही लाख आपत्तियों के बावजूद सराय कालेखान के पास ‘बांस घर’ के नाम से कैफेटेरिया और अन्य निर्माण हो गए.  

दिल्ली बसी ही इसलिए थी कि यहां यमुना बहती थी, सो जान लें कि यदि दिल्ली की प्यास से जूझना है या जल भराव से, दोनों का निदान इसी में है कि यमुना अविरल बहे, उसकी गहराई और पाट बचे रहें.

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