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सफाईकर्मियों की उपेक्षा क्यों?

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: September 25, 2018 07:50 IST

यह मौतें आसानी से रोकी जा सकती हैं। बस ! जरूरत समाज का नजरिया बदलने और सरकार द्वारा सफाई कामगारों की सुरक्षा के लिए सकारात्मक कदम उठाने की दरकार है। 

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जाहिद खान

देश के मुख्तलिफ हिस्सों से सीवर के अंदर दम घुटने से सफाईकर्मियों की मौत की खबरें, आए दिन की बात हो गई हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता होगा, जब कहीं कोई दर्दनाक हादसा न घटे। सफाईकर्मी जाम सीवर लाइन की सफाई-मरम्मत के लिए मैन होल में उतरते हैं और मौत उन्हें वहां अपने आगोश में ले लेती है। हर साल तकरीबन सौ लोग सीवर में जहरीली गैसों की चपेट में आकर घुट-घुटकर दम तोड़ देते हैं। साल 1993 से लेकर अब तक देश भर में 1500 से ज्यादा लोगों की सीवर में मौत हुई है।

ऐसे ही दो दर्दनाक हादसे इस महीने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक के बाद एक घटित हुए हैं। पहला हादसा पश्चिमी दिल्ली के मोतीनगर इलाके में हुआ, जहां ‘ग्रीन कैपिटल डीएलएफ सोसाइटी’ में एक सीवर टैंक की सफाई करने उतरे 6 मजदूरों में 5 की मौत हो गई। मजदूर, सीवर में मौजूद विषैली गैस की चपेट में आ गए और आॅक्सीजन न मिलने की वजह से इन मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई।

दूसरा हादसा, द्वारका में हुआ, जहां सीवर की सफाई करने उतरे एक युवक की रस्सी कमजोर होने से टूट गई और युवक सीवर में जा गिरा। जब तक उसे सीवर से बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।          

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों पर अमल के लिए दिल्ली जल बोर्ड और मुख्तलिफ सरकारों को दो महीने का समय दिया था। लेकिन अफसोस! आज भी उसके निर्देशों पर कहीं भी ईमानदारी से अमलदारी नहीं हो रही है। मोती नगर के ‘ग्रीन कैपिटल डीएलएफ सोसाइटी’ में घटी यह दर्दनाक घटना, बतलाती है कि दिल्ली सरकार ने पूर्व की घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया है। यदि उसने कोई सबक सीखा होता, तो राज्य में यह दर्दनाक हादसे बार-बार अंजाम नहीं लेते. सीवर में मौतें, और कुछ नहीं शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता एवं घोर लापरवाही का नतीजा हैं।

यह मौतें आसानी से रोकी जा सकती हैं। बस ! जरूरत समाज का नजरिया बदलने और सरकार द्वारा सफाई कामगारों की सुरक्षा के लिए सकारात्मक कदम उठाने की दरकार है। सीवर में काम करने वाले भी हमारी तरह हाड़-मांस के इंसान हैं और वे हमारे मल-मूत्र को साफ करने एवं हमारी सहुलियतों के लिए ही अपनी जान जोखिम में डालते हैं। फिर भी उनके प्रति यह उपेक्षापूर्ण और असंवेदनशील रवैया क्यों ? 

टॅग्स :दिल्लीसुप्रीम कोर्ट
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