लाइव न्यूज़ :

वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉगः सबके लिए एक जैसा कानून कब बनेगा?

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: July 12, 2021 16:44 IST

समान आचार संहिता का अर्थ यह नहीं है कि देश के 130 करोड़ नागरिक एक ही भाषा बोलें, एक ही तरह का खाना खाएं या एक ही ढंग के कपड़े पहनें। उस धारा का अभिप्राय बहुत सीमित है। वह है शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने आदि की प्रक्रिया में एकता।

Open in App
ठळक मुद्देदिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकार देश के नागरिकों के लिए समान आचार संहिता बनाए। जैसे हिंदू कोड बिल बना, वैसे ही भारतीय कोड बिल भी बनना चाहिए।सभी नागरिकों के लिए समान कानून बन जाए तो राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बार फिर कहा है कि सरकार देश के नागरिकों के लिए समान आचार संहिता बनाए और संविधान की धारा 44 में जो अपेक्षा की है, उसे पूरा करे। समान आचार संहिता का अर्थ यह नहीं है कि देश के 130 करोड़ नागरिक एक ही भाषा बोलें, एक ही तरह का खाना खाएं या एक ही ढंग के कपड़े पहनें। उस धारा का अभिप्राय बहुत सीमित है। वह है शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने आदि की प्रक्रिया में एकता। भारत में इन मामलों में इतना अधिक रूढ़िवाद चलता रहा है कि आम आदमी का जीना दूभर हो गया था। इसलिए 1955 में हिंदू कोड बिल पास हुआ लेकिन यह कानून भी कई आदिवासी और पिछड़े लोग नहीं मानते। वे अपनी घिसी-पिटी रूढ़ियों के मुताबिक शादी, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के अपने ही नियम चलाते रहते हैं।

उच्च न्यायालय ने सिर्फ हिंदुओं के बारे में ही नहीं, प्रत्येक भारतीय के लिए समान आचार संहिता बनाने को कहा है। सभी धर्मों की अपनी-अपनी आचार-संहिता है, जो सैकड़ों या हजारों वर्ष पहले बनी थी। उस देश-काल के हिसाब से वे शायद ठीक रही होंगी लेकिन आज की बदली हुई परिस्थितियों में उन्हें आंख मींचकर अपने पर थोपे रहना कहां तक ठीक है? इसीलिए जैसे हिंदू कोड बिल बना, वैसे ही भारतीय कोड बिल भी बनना चाहिए।

सरकार ने तीन तलाक प्रथा को खत्म करके समान आचार संहिता का रास्ता जरूर खोला है लेकिन उससे उम्मीद की जाती है कि जैसे नेहरू और आंबेडकर ने घनघोर विरोध के बावजूद हिंदू कोड बिल को पुख्ता कानून बनवा दिया, वैसे ही सभी धर्मावलंबियों के लिए समान आचार संहिता बनाने का साहस वर्तमान सरकार को दिखाना चाहिए। यूरोप और अमेरिका में रहनेवाले किसी भी धर्म, किसी भी वंश, किसी भी जाति, किसी भी रंग के आदमी के लिए कोई अलग कानून नहीं है।

यदि सभी नागरिकों के लिए समान कानून बन जाए तो वह राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने में विशेष भूमिका अदा करेगा। तब अंतरधार्मिक, अंतरजातीय और अंतरभाषिक विवाह आसानी से होने लगेंगे। यदि गोवा में पुर्तगालियों द्वारा 1867 में बनाई समान आचार-संहिता लागू हो रही है तो हमारी अपनी समान आचार संहिता पूरे भारत में क्यों नहीं लागू हो सकती है? 

टॅग्स :दिल्ली हाईकोर्ट
Open in App

संबंधित खबरें

भारत'अगर CBI की उनकी रिहाई के खिलाफ याचिका पर वही जज सुनवाई करते हैं, तो उन्हें इंसाफ नहीं मिलेगा', दिल्ली हाईकोर्ट से बोले केजरीवाल

बॉलीवुड चुस्कीरिलीज के 20 साल बाद?, रैपर यो यो हनी सिंह और बादशाह के 'अश्लील और अपमानजनक' गाने को हटाने का निर्देश, दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा-‘अंतरात्मा पूरी तरह से झकझोर’ दी?

भारतदिल्ली हाईकोर्ट ने तमिल मीडिया हॉउस 'नक्कीरन' को ईशा फाउंडेशन और सद्गुरु के खिलाफ मानहानिकारक सामग्री हटाने को कहा

भारतदिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल, सिसोदिया समेत 12 लोगों को जारी किया नोटिस, आबकारी नीति मामले में सीबीआई ने दायर की याचिका

क्राइम अलर्टविवाह का वादा कर शारीरिक संबंध बनाना और कुंडली मिलान न होने के कारण शादी से इनकार पर लागू होगी धारा 69

भारत अधिक खबरें

भारत10 रुपये की झालमुड़ी खाने सड़क पर रुक गए पीएम मोदी, झारग्राम में PM का देसी अंदाज वायरल

भारतचारधाम यात्रा की शुरुआत, अक्षय तृतीया पर खुला Gangotri Temple, हेलीकॉप्टर से हुई फूलों की बारिश

भारत'भई हमें अपना झालमुड़ी खिलाओ, कितने का है?' बंगाल के ज़ोरदार चुनावी अभियान के बीच PM मोदी 10 रुपये की झालमुड़ी खाने दुकान पहुंचे, देखें VIDEO

भारततमिलनाडु में पटाखों की फैक्ट्री में धमाके से 16 से ज़्यादा लोगों की मौत; एम.के. स्टालिन ने शोक व्यक्त किया

भारतसामान में सैटेलाइट फ़ोन मिलने के बाद श्रीनगर हवाई अड्डे पर 2 अमेरिकी हिरासत में लिए गए