Ways to tackle excess rain and Drought | अतिवृष्टि और अनावृष्टि से निपटने की चुनौतियां
अतिवृष्टि और अनावृष्टि से निपटने की चुनौतियां

डॉ. एसएस मंठा

देश में जून से सितंबर के महीने में कभी सूखा देखने को मिलता है तो कभी बाढ़, जैसा कि इस साल भी देखने को मिला। बारिश या तो बहुत कम होती है या इतनी ज्यादा होती है कि कई बार पुलों के ऊपर से पानी बहने लगता है। अतिवृष्टि और अनावृष्टि दोनों ही चिंता का कारण बनते हैं और नागरिकों को मुसीबत में डालते हैं।

इस साल नासा ने अगस्त में भारत में होने वाली मानसूनी बारिश का पूर्वानुमान उपलब्ध कराया था। इसके अनुसार 13 से 20 अगस्त के बीच देश के कई हिस्सों में भारी बारिश होने की बात कही गई थी। इस बारिश से उत्तर भारत के साथ ही केरल और कर्नाटक के कई हिस्से बाढ़ से गंभीर रूप से प्रभावित हुए जहां कम से कम 350 लोगों की जान चली गई और करीब आठ लाख लोग बेघर हो गए। पहले से उपलब्ध सूचनाओं को देखते हुए क्या इसे टाला नहीं जा सकता था? तथ्य यह है कि एक आम भारतीय प्रतिक्रिया अक्सर धार्मिक मान्यताओं में डूबी होती है और वे इसे भाग्य की नियति मान लेते हैं। क्या भविष्य को ऐसी आपदाओं से सुरक्षित किया जा सकता है?

इसका समाधान खोजने की जरूरत है। निरंतर होने वाली बरसात, सुनामी, नदियों का उथला होना, बाढ़ प्रवण क्षेत्र में जलनिकासी व्यवस्था का ठीक नहीं होना, बादल फटना आदि बाढ़ के कारण माने जाते हैं। यह सही है कि बाढ़ से लोगों की परेशानी बढ़ती है, लेकिन बाढ़ के कुछ फायदे भी हैं। इससे खेतों में जमा होने वाली गाद से मिट्टी को पोषक तत्व हासिल होते हैं और वह कृषि उत्पादन के लिए अधिक उपजाऊ बनती है।

देश के कई हिस्सों में नदियों के किनारे नियमित रूप से बाढ़ आती है। जैसे ब्रह्मपुत्र, गंगा, उत्तर-पश्चिम की नदियां और दक्षिण के पठार की नदियां। उनमें बाढ़ आने के कारण अलग-अलग हैं, इसलिए सब जगह बचाव के एक जैसे उपाय नहीं अपनाए जा सकते। भारत में हिमपात सहित वार्षिक वर्षा अनुमानत 4000 बिलियन घनमीटर (बीसीएम) होती है। इसमें से मानसून के दौरान मौसमी हिमपात 3000 बीसीएम होता है। 

बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले  दस प्रमुख राज्यों में पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, केरल, असम, गुजरात और ओडिशा शामिल हैं। बिहार में बाढ़ के कारण पिछले साल 500 मौतें हुई थीं। जब इस त्रसदी के प्रमुख कारणों का पता लगाया गया तो पता चला कि इसका कारण बाढ़ के पानी के खतरनाक स्तर को पार करने के बाद भी ग्रामीणों का अपने घरों को खाली करने के लिए अनिच्छुक होना था।

दक्षिण भारत में वर्ष 2015 में मूसलाधार बारिश के कारण आई बाढ़ से अर्थव्यवस्था को 20 हजार करोड़ रुपया का आर्थिक नुकसान हुआ था। जबकि 2016 में असम की बाढ़ से नौ हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे और करीब 29 गांव बाढ़ में डूब गए थे। चेन्नई में सौ साल में पहली बार आई भयानक बाढ़ ने आर्थिक विकास की एकतरफा प्रकृति में अंतर्निहित कमजोरी को उजागर किया था और इसे दूर करने तथा शहरी परिदृश्य के पुनर्निर्माण की आवश्यकता सामने रखी थी। 

2016 में एक अंग्रेजी अखबार ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि हर साल करीब तीन करोड़ लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं। बाढ़, भारी वर्षा से हर साल करीब 11 हजार करोड़ रु। का नुकसान होता है। इसके अलावा एक हजार से अधिक लोगों की जान हर साल जाती है। तेलंगाना की नई राजधानी अमरावती कृष्णा नदी के तट पर बसाई जा रही है। इस नदी में हर साल कम से कम तीन बार बाढ़ आती है। यह यहां रहने वालों के लिए चिंता का कारण बन सकती है। क्या इसका अंदाजा लगाया गया है कि भावी पीढ़ियों को बाढ़ की वजह से कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी? 

जोखिम के मूल्यांकन से वित्तीय और अन्य क्षति को कम करने में काफी मदद मिल सकती है। बाढ़ के पानी को नियंत्रित करने के लिए दीवारों और फ्लडगेट्स का निर्माण किया जाना चाहिए। डूब क्षेत्र में आने वाले घरों की वाटरप्रूफिंग करना भी जरूरी है। इसी प्रकार बाढ़ के दौरान वहां के लोगों का पुनर्वास करने की योजना भी बनाई जानी चाहिए। बाढ़ की चेतावनी देने के लिए फ्लड वार्निग सिस्टम भी मजबूत किए जाने की जरूरत है। घरों का निर्माण करते समय अपेक्षाकृत ऊंची जगह पर निर्माणकार्य किया जाना चाहिए।

नदियों की गाद निकाल कर उन्हें गहरा किए जाने की जरूरत है ताकि बाढ़ का पानी फैले नहीं। बाढ़ के पानी को रोकने के लिए तालाबों का निर्माण और वनीकरण जैसे उपाय अपनाने की भी जरूरत है। तभी हर वर्ष बाढ़ के कारण होने वाले नुकसान को टाला जा सकेगा। हम देश में स्मार्ट सिटी के निर्माण पर जोर दे रहे हैं तो प्राकृतिक आपदाओं से भी स्मार्ट तरीके से निपटे जाने की जरूरत है।


Web Title: Ways to tackle excess rain and Drought
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