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ब्लॉग: कब तक बरकरार रह पाएगी भारत की तटस्थता की नीति?

By शोभना जैन | Updated: March 5, 2022 10:49 IST

भारत सरकार एक तरफ जहां इस विषम स्थिति में तटस्थता बरते जाने के आरोपों को लेकर सवालों के घेरे में है, वहीं दूसरी तरफ वह यूक्रेन में रह रहे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए समय रहते चेतावनी देने/ कार्रवाई नहीं करने के लिए भी कठघरे में है.

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ठळक मुद्देभारत ने सीधे तौर पर रूस का न तो विरोध, न ही समर्थन किया है.रूस भारत का सदैव ही भरोसेमंद साथी रहा है और अमेरिका उसका अहम सामरिक सहयोगी.स्विट्जरलैंड जैसा तटस्थ देश इन्हीं बदले समीकरणों के चलते अब नाटों के साथ आ गया है.

यूक्रेन पर रूस के भीषण हमले लगातार जारी हैं. राजधानी कीव, खेरसन जैसे कितने ही शहर जहां कभी जिंदगी चहकती थी, उन शहरों में मातम पसरा है. विशाल इमारतें धू धू कर जल रही हैं, इस अनजान मुल्क में पढ़ने या रोजगार के लिए गए भारतीय छात्र जान बचाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. 

इन सबके बीच भारत सरकार एक तरफ जहां इस विषम स्थिति में तटस्थता बरते जाने के आरोपों को लेकर सवालों के घेरे में है, वहीं दूसरी तरफ वह यूक्रेन में रह रहे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए समय रहते चेतावनी देने/ कार्रवाई नहीं करने के लिए भी कठघरे में है.

भारत इस विषम स्थिति में एक तरफ जहां तटस्थता बरते जाने को लेकर सवालों के घेरे में है वहीं एक वर्ग यह भी आरोप लगा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत जिस तरह से रूस के खिलाफ मतदान में गैरहाजिर हो रहा है, उससे लगता है रूस के खिलाफ कुछ नरम रुख अख्तियार कर रहा है, बावजूद इसके कि हाल के कुछ बरसों में अमेरिका के प्रति झुकाव बढ़ा है. 

भारत ने सीधे तौर पर रूस का न तो विरोध, न ही समर्थन किया है, हालांकि भारत की ओर से रूस को परोक्ष रूप से यह संदेश दिया गया है कि वो अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करे. 

देखा जाए तो भारत के लिए अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर तटस्थता का यही रास्ता अपनाना सही भी है, लेकिन सवाल यह भी है कि अगर कहीं यह युद्ध लंबा खिंचता है तो भारत को कौन सा रास्ता लेना होगा. 

ऐसी स्थितियां आने पर खास तौर पर इस नए घटनाक्रम के चलते देशों के समीकरण बदल रहे हैं, स्विट्जरलैंड जैसा तटस्थ देश इन्हीं बदले समीकरणों के चलते अब नाटों के साथ आ गया है. 

बहरहाल, भारत के लिए बड़ी डिप्लोमेटिक चुनौती है, लेकिन भारत निश्चय ही अपने राष्ट्रीय हित और सुरक्षा सरोकारों को ध्यान में रखकर ही इस मसले पर आगे रुख अख्तियार करेगा.

मौजूदा यूक्रेन-रूस युद्ध में भारत फिलहाल निष्पक्ष रुख अपनाए हुए है, लेकिन उसके लिए दुविधा की स्थिति तो है ही. सुरक्षा परिषद के वोट से पहले विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई से बात कर संकट के समाधान के लिए युद्ध का रास्ता छोड़कर बातचीत के जरिये राजनयिक प्रयास करने पर जोर दिया. 

कीव में चल रहे रूसी हमलों के बीच ही यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्री ने उन्हें स्थिति के बारे में अपना आकलन दिया, ब्रिटेन और ईयू के विदेश मंत्रियों ने भी जयशंकर से बात की. जी-20 देशों के राजदूतों ने भी यूक्रेन के प्रति अपना समर्थन दोहराया.

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा की आपातकालीन बैठक में रूस के खिलाफ यूक्रेन पर हमले को लेकर निंदा प्रस्ताव 141-5 वोट से पास हो गया. इस प्रस्ताव में कहा गया है कि रूस यूक्रेन से अपने सैनिकों को बिना शर्त वापस बुलाए. 

यूएजीए में कुल 193 देशों में से 141 देशों ने रूस के खिलाफ वोटिंग की और पांच देशों ने रूस का साथ दिया. इन पांचों में एक ख़ुद रूस भी है. 35 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. इनमें भारत, पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश और श्रीलंका भी शामिल हैं. इससे पहले भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में भी हिस्सा नहीं लिया था.

रूस भारत का सदैव ही भरोसेमंद साथी रहा है और अमेरिका उसका अहम सामरिक सहयोगी. लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि भारत किसी भी स्थिति में अपनी सुरक्षा की अनदेखी नहीं कर सकता, वो भी ऐसे समय जब चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी भारत के खिलाफ खुलकर मैदान में खड़े हैं. 

रूस और यूक्रे न के बीच जारी युद्ध में, भारत के तटस्थ रुख से कुछ सवालिया निशान तो लगे हैं. किसी भी देश की संप्रभुता पर हमला पूरी दुनिया के लिए गहरी चिंता ही नहीं चेतावनी भी है, खासतौर पर ऐसे में जबकि महाशक्तियां परमाणु हथियारों से लैस हैं. 

रूस ने भले ही अपने सुरक्षा सरोकारों और पश्चिमी देशों से उसकी तरफ निरंतर बढ़ती लामबंदी के खिलाफ यह कदम उठाया, लेकिन युद्ध किसी भी मसले का समाधान नहीं है. 

बकौल एक पूर्व राजनयिक, भारत दुनिया में निरपेक्ष गुट का सदस्य देश रहा है, इसलिए इस बार भी उसने मानवतावादी नीति अख्तियार करते हुए निष्पक्ष कदम उठाया है. लेकिन भारत के लिए यह एक बड़ी डिप्लोमेटिक चुनौती है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो वह निष्पक्षता की नीति को आगे कैसे बढ़ाएगा.

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