मशीनें सेवक अच्छी होती हैं पर मालिक निर्मम बनती हैं

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 29, 2026 07:24 IST2026-04-29T07:24:50+5:302026-04-29T07:24:55+5:30

मशीनों द्वारा अनुपयोगी बना दिए जाने पर क्या भविष्य में उनकी भी हालत मवेशियों जैसी ही नहीं होने वाली है?

Swayivejo Dzudo young farmer from Nagaland Machines are good servants but ruthless masters | मशीनें सेवक अच्छी होती हैं पर मालिक निर्मम बनती हैं

मशीनें सेवक अच्छी होती हैं पर मालिक निर्मम बनती हैं

हेमधर शर्मा

पिछले दिनों एक खबर सामने आई कि नगालैंड के युवा किसान स्वयीवेजो डजुडो ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री के उपयोग से एक कम लागत वाला ‘सोलर ड्रायर’ बनाया है, जो किसानों की सब्जियों को पारंपरिक तरीकों की तुलना में 30 प्रतिशत तेजी से सुखाता है. उन किसानों के लिए, जिन्हें सीजन में बम्पर पैदावार होने पर अपनी सब्जियां माटी मोल बेचनी पड़ती हैं या फेंकनी पड़ती हैं, निश्चय ही इस खबर से राहत मिली होगी, क्योंकि वे फेंकने के बजाय सुखाकर अपनी सब्जियों का जीवनकाल बढ़ा सकेंगे और उनकी यथेष्ट कीमत पा सकेंगे.

जब दुनिया में सिलाई मशीन का आविष्कार हुआ था या साइकिल ईजाद हुई थी तो इसे बहुत बड़ी क्रांति माना गया था. मनुष्य बल से चलने वाली इन दोनों मशीनों ने एक झटके में ही मानव श्रम को कई गुना बचाने में मदद की थी. जो दूरी पैदल तय करने में एक घंटे लगते, साइकिल से उसे बीस मिनट में ही तय किया जा सकता था. जो कपड़ा हाथ से सिलने में एक घंटा लगता, उसे सिलाई मशीन दस मिनट में ही सिल सकती थी.

तब से लेकर अब तक तकनीकी विकास जमीन से आसमान पर पहुंच गया है, लेकिन दुर्भाग्य से मानव श्रम से चलने वाली मशीनों का विकास लगभग वहीं पर ठिठका हुआ है. महात्मा गांधी को मशीन विरोधी बताते हुए बहुत से लोग उनकी आलोचना करते रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि गांधीजी सिलाई मशीन और साइकिल जैसी मानव श्रम से चलने वाली मशीनों के विरोधी हर्गिज नहीं थे, बल्कि वे इसी तरह की मशीनों को बढ़ावा देना चाहते थे, जो जन-जन की पहुंच में हों.

प्रदूषण फैलाने वाली भीमकाय मशीनों ने पर्यावरण को तबाह करने के साथ पूंजी का जिस तरह से केंद्रीयकरण किया है, उसे इन स्तब्ध कर देने वाले आंकड़ों से समझा जा सकता है कि दुनिया में शीर्ष एक प्रतिशत लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का आधे से अधिक हिस्सा है, जबकि नीचे की पचास प्रतिशत आबादी के पास मात्र दो प्रतिशत संपत्ति है. मशीनें बेशक एक मजदूर द्वारा दिन भर में किए जाने वाले काम को कुछ सेकंड में ही कर डालती हैं लेकिन मजदूर की दिन भर की कमाई को भी क्या वे मशीनों के मालिक की तिजोरी में ही नहीं डाल देती हैं?

अमेरिका जैसे देश में, जहां आबादी कम है और क्षेत्रफल ज्यादा, वहां मशीनों की मदद लेना फिर भी समझ में आता है लेकिन भारत जैसे देश में, जहां करोड़ों लोग रोजगार के लिए तरस रहे हों, दैत्याकार मशीनें क्या गरीबों के शोषण का ही औजार नहीं बन गई हैं?

जिन किसानों से पीक सीजन में औने-पौने दाम में अनाज और फल-सब्जी खरीद कर बड़े-बड़े व्यापारी उसे ऑफ सीजन में कई गुना ज्यादा भाव पर बेचते हैं, अगर किसान उसे कुछ महीनों तक भी सहेज कर रख सकें तो उन्हें कम से कम इतनी दुर्गति तो नहीं ही झेलनी पड़ेगी कि आत्महत्या तक की नौबत आ जाए (सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में हर साल दस से बारह हजार किसान आत्महत्या करते हैं). इस दृष्टि से नगालैंड के किसान का सोलर ड्रायर एक बड़ी उम्मीद बंधाता है.

ऐसा नहीं कि इस तरह के आविष्कार पहले नहीं हुए हैं, लेकिन इस क्षेत्र में इतना कम काम हुआ है कि जो गिने-चुने उत्पाद बाजार में हैं भी, वे इतने महंगे हैं कि गरीब किसानों की औकात से बाहर हैं. त्रासदी इसलिए भी ज्यादा बड़ी हो गई है क्योंकि अत्याधुनिक विकास की चकाचौंध में पीढ़ियों से चले आ रहे पारम्परिक तौर-तरीके हम भूलते जा रहे हैं. फलों-सब्जियों की बम्पर पैदावार के सीजन में पहले हर घर में उन्हें सुखाकर सहेजने के तरीके लोग जानते थे.

गोभी, टमाटर, कद्दू जैसी सब्जियों को उड़द या मूंग की पिसी दाल के साथ मिलाकर उनकी वड़ी बनाकर सुखा लिया जाता था. आम के रस को सुखाकर बनाई जाने वाली अमावट आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग साल भर खाते हैं. इसी तरह अन्य फलों का रस भी सुखा लिया जाता था. यह सच है कि बड़ी-बड़ी मशीनें उन्हें पलक झपकते ही सुखाने की क्षमता रखती हैं लेकिन उनका यह गुण जहां मशीन मालिक पूंजीपतियों के लिए वरदान साबित होता है, वहीं सामान्य किसानों के लिए अभिशाप बन जाता है.

जो गो-धन कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, अनुपयोगी होने के कारण आज वह मारा-मारा फिर रहा है. यह कितना शर्मनाक है कि पूरे देश का पेट भरने वाले अन्नदाता किसानों को खुद सरकार द्वारा दिए जाने वाले मुफ्त राशन पर पलना पड़ रहा है! मशीनों द्वारा अनुपयोगी बना दिए जाने पर क्या भविष्य में उनकी भी हालत मवेशियों जैसी ही नहीं होने वाली है? ईश्वर न करे कि कभी अकाल पड़े, लेकिन वैसी हालत में सरकार मुफ्त में बांटने के लिए अनाज कहां से लाएगी? और तब क्या मुफ्तखोरी की आदत लगने वालों पर ही इसकी सबसे बड़ी गाज नहीं गिरेगी?

इसलिए जरूरत यह है कि आज मनुष्य बल (इसमें पशु बल को भी शामिल कर सकते हैं, क्योंकि निरुपयोगी होने पर उनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है) से चलने वाली मशीनों के विकास पर ध्यान दिया जाए. इससे जहां आम आदमी को फायदा मिलेगा, वहीं पर्यावरण भी प्रदूषित होने से बचेगा. परंतु इससे जिनका मुनाफा प्रभावित होगा, क्या वे ऐसा होने देंगे?  

Web Title: Swayivejo Dzudo young farmer from Nagaland Machines are good servants but ruthless masters

भारत से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे