रंगनाथ सिंह का ब्लॉग: हिन्दी लेखकों को लोकप्रियता विरोधी पाखण्ड का पिण्डदान कर देना चाहिए

By रंगनाथ सिंह | Published: June 29, 2021 09:23 AM2021-06-29T09:23:17+5:302021-06-29T11:01:10+5:30

हिन्दी साहित्यकार यह कभी नहीं समझ पाता कि महान से महान साहित्य तभी महान बन पाता है जब वह अपना पाठक खोज लेता है। अकेली पड़ी किताब और तराजू का बटखरा एक बराबर हैं।

rangnath singh blog popularity and hindi writers | रंगनाथ सिंह का ब्लॉग: हिन्दी लेखकों को लोकप्रियता विरोधी पाखण्ड का पिण्डदान कर देना चाहिए

रंगनाथ सिंह का ब्लॉग: हिन्दी लेखकों को लोकप्रियता विरोधी पाखण्ड का पिण्डदान कर देना चाहिए

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लोकप्रियता पर लानत भेजना हिन्दी समाज में लेखक से साहित्यकार तक ले जाने वाली सीढ़ी का पहला डण्डा है। जब कोई नया बालक लेखन की दुनिया में दीक्षित होने के लिए गुरुमुख होता है तो गुरु उसके कान में मंत्र बुदबुदाता है- 'लोकप्रियता गुणवत्ता का पैमाना नहीं है।' सच्चा हिन्दी वीलबालक गुरुमुखी होता है इसलिए आजीवन अपने गुरु का स्मरण करते हुए यह मंत्र बुदबुदाता रहता है,  'लोकप्रियता गुणवत्ता का पैमाना नहीं है।'

हमारे लेखक इतने ज्यादा लोकप्रियता विरोधी हैं कि उनके हर बैनर-पोस्टर पर प्रसिद्ध लेखक, जानेमाने कथाकार, चर्चित कहानीकार इत्यादि लिखा होता है। लेकिन मजाल है कि किसी पोस्टर में साहित्यकार के नाम के आगे लोकप्रिय विशेषण दिख जाए? जानेमाने या चर्चित होने के साथ-साथ किसी लेखक की किताबें जरूरत से ज्यादा बिकने लगें तो कुछ लोग उनके पीछे हाथ धो कर पीछे पड़ जाते हैं कि इसने साहित्यकारों का नाम खराब कर दिया। यह अलग बात है कि हमारे साहित्कार लोकप्रिय होने के सभी सम्भव दाँव-पेंच आजमाते रहते हैं। 

जनदबाव और आबोहवा को भाँपने में माहिर कुछ लेखकों ने खुद को लोकप्रियता के झण्डाबरदार के तौर पर मार्केट में पोजिशन किया लेकिन ऐसे लेखकों के अन्दर भी दबा पड़ा साहित्यकार जब नहीं तब जाग जाता है। आधी रात को बुरा सपना देखकर भौंचक होकर उठने जैसी अवस्था में ये अचानक ही अपना सुर बदलते हुए सोशलमीडिया पर बुदबुदाने लगते हैं कि 'लोकप्रियता गुणवत्ता का पैमाना नहीं है।'

हिन्दी साहित्यकार यह कभी नहीं समझ पाता कि महान से महान साहित्य तभी महान बन पाता है जब वह अपना पाठक खोज लेता है। अकेली पड़ी किताब और तराजू का बटखरा एक बराबर हैं। किताब तभी मुकम्मल होती है जब पाठक उसे पढ़ता है। हिन्दी विभागों में घोटना सिखाया जाता है, सोचना नहीं सिखाया जाता इसलिए हिन्दी आलोचक कक्षा में माडर्न लिटररी क्रिटिसिज्म या पोस्टमार्डनिस्ट लिटररी क्रिटिसिज्म जैसे जुमले उछाल-उछाल कर अपनी दिहाड़ी पूरी करता है लेकिन कक्षा से बाहर आते ही वह सारे पाठ भूलकर गुरु का दिया मंत्र बुदबुदाने लगता है,  'लोकप्रियता गुणवत्ता का पैमाना नहीं है।' 

दुनिया में कोई ऐसा साहित्य नहीं है जिसे दुनिया का हर आदमी पढ़ता है। हर तरह के साहित्य का एक पाठक वर्ग होता है। किसी भी साहित्य की लोकप्रियता उसके पाठक वर्ग के अन्दर उसकी लोकप्रियता से मापा जाना चाहिए। मसलन, एचसी वर्मा या गोरख प्रसाद जैसे लेखकों के नाम स्कूल से कॉलेज तक साहित्य या समाजशास्त्र या वाणिज्य के विद्यार्थियों के लिए कोई मायने नहीं रखते। गणित और भौतिकी का ऐसा कोई भारतीय विद्यार्थी न होगा जो इन लेखकों के नाम को न जानता हो।

 कुछ लोग कहते हैं कि जब आइंस्टीन पूरी दुनिया के सबसे मशहूर वैज्ञानिक हो चुके थे तब उनके सिद्धान्त को ठीक से समझने वाले दुनिया में केवल आठ प्रोफेसर थे। खुद आइंस्टीन ने पॉल रॉब्सन से मजाक किया था कि आप इसलिए लोकप्रिय हैं कि आपका काम सब समझते हैं, और मैं इसलिए कि मेरा काम बहुत कम लोग समझते हैं। सत्येन्द्र नाथ बोस को वह लोकप्रियता कभी नहीं मिलेगी जो प्रेमचन्द को मिली जबकि दोनों ने मानवीय ज्ञान के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया। 

अगर हम विशुद्ध साहित्य की बात कर लें तो मैं जिस दायरे में रहता हूँ उसमें मुक्तिबोध सबसे लोकप्रिय कवि हैं। मैंने मुक्तिबोध की अधिकतर कविताएँ पढ़ी हैं। वहीं एक दायरा ऐसा है जिसमें मैं नहीं रहता वहाँ कुमार विश्वास लोकप्रिय हैं। सही मायनों में दोनों दायरों में कोई तार्किक टकराव नहीं है लेकिन कुछ लोग भारतीयों के खून में समाहित जातिगत श्रेष्ठता ग्रन्थि से इतने पीड़ित होते हैं कि वो कुमार विश्वास को छोटा साबित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं। उनका बरताव ऐसा होता है जैसे कुमार विश्वास कोई असमाजिक तत्व हो जिससे समाज को बचाना जरूरी हो। 

ऐसे लोग यह कभी नहीं समझ पाते कि विश्व इतिहस में ऐसा कभी नहीं हुआ जब समूची मानव जाति भावबोध और ज्ञानबोध के एक धरातल पर खड़ी हो। हम जिसे महान साहित्य मानते हैं उसकी एक ही खूबी है जो उसे महान बनाती है। वह खूबी है, देश, काल और भाषा का अतिक्रमण करने की क्षमता। कालिदास इसलिए महान लेखक हैं क्योंकि अपनी मृत्यु के हजार साल बाद भी संस्कृत से अंग्रेजी अनुवाद में पढ़ रहे यूरोपीय को भी उनका साहित्य उत्कृष्ट लगता है। 

यह कतई न समझिएगा कि विदेशी भाषाओं में अनुवाद से कोई साहित्य महान बन जाता है। संस्कृति उद्योग (कल्चर इंडस्ट्री) भी एक तरह का उद्योग है। कारोबार की अच्छी समझ रखने वाले लेखक बहुत जल्दी विदेशी भाषाओं में अनुदित हो जाते हैं लेकिन वहाँ भी सवाल वही है कि क्या उस भाषा में उनका कोई पाठक वर्ग तैयार हुआ है? या बस वो जुगाड़ के दम पर वहाँ के पुस्तकालयों में सेट हो गये हैं। ऊपर मुक्तिबोध का जिक्र आया था। जिस पाठक वर्ग में मुक्तिबोध लोकप्रिय हैं उसी पाठक वर्ग में जर्मन कवि ब्रेख्त भी बहुत लोकप्रिय हैं। यह लोकप्रियता ब्रेख्त ने अपने लेखन के दम पर हासिल की है न कि किसी संस्कृति उद्योग की कारस्तानी से।     

मेरे ख्याल से हिन्दी लेखकों को इस पाखण्ड का पिण्डदान कर देना चाहिए कि 'लोकप्रियता गुणवत्ता का पैमाना नहीं है।' यह मान लेना चाहिए कि लोकप्रिय होने में कोई बुराई नहीं है। अपना लोक ढूँढे बिना दुनिया का कोई साहित्य तैयार नहीं होता। पाठक के बिना रचना अधूरी है।  किसका साहित्य देश, काल और भाषा की सीमा का अतिक्रमण करेगा इसका जवाब केवल काल के पास है। 

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