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प्रणब मुखर्जीः गरिमा एवं शालीनता की प्रतिमूर्ति, सीताराम येचुरी का ब्लॉग

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: September 1, 2020 16:48 IST

चार दशकों तक उनके साथ मेरे जुड़ाव के दौरान मतभेद जारी रहे. हालांकि संसद में नहीं लेकिन विभिन्न राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों में रहते हुए मुझे डब्ल्यूटीओ के गठन और भारत द्वारा डंकल ड्राफ्ट के समर्थन के लिए बातचीत करने के लिए वाणिज्य मंत्री के रूप में उनका सामना करना पड़ा.

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ठळक मुद्देवरिष्ठता के बावजूद उन्होंने मेरे जैसे लोगों के साथ इस तरीके से व्यवहार नहीं किया कि हम कनिष्ठ हैं. हमेशा मेरे साथ समानता के स्तर का व्यवहार किया, हमारे मतभेदों पर कोई आक्रोश व्यक्त नहीं किया. 2004 के आम चुनावों में उस सरकार को हराने के लिए धर्मनिरपेक्ष विपक्षी दलों को एकजुट करने के प्रयासों के बीच मुझे उनके नजदीक आने का अवसर मिला.

प्रणब मुखर्जी की मृत्यु के साथ, जिन्हें हम प्रणब दा कहकर संबोधित करते थे, भारत और भारतीय राजनीति में एक शून्य व्याप्त हो गया है. जब वे राज्यसभा में पहुंचे तब मैं स्कूल में ही था. अपनी वरिष्ठता के बावजूद उन्होंने मेरे जैसे लोगों के साथ इस तरीके से व्यवहार नहीं किया कि हम कनिष्ठ हैं.

जहां तक मेरा सवाल है, उन्होंने हमेशा मेरे साथ समानता के स्तर का व्यवहार किया, हमारे मतभेदों पर कोई आक्रोश व्यक्त नहीं किया. लगभग चार दशकों तक उनके साथ मेरे जुड़ाव के दौरान मतभेद जारी रहे. हालांकि संसद में नहीं लेकिन विभिन्न राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों में रहते हुए मुझे डब्ल्यूटीओ के गठन और भारत द्वारा डंकल ड्राफ्ट के समर्थन के लिए बातचीत करने के लिए वाणिज्य मंत्री के रूप में उनका सामना करना पड़ा.

वाजपेयी सरकार की अवधि के दौरान और 2004 के आम चुनावों में उस सरकार को हराने के लिए धर्मनिरपेक्ष विपक्षी दलों को एकजुट करने के प्रयासों के बीच मुझे उनके नजदीक आने का अवसर मिला. उस समय अक्सर होने वाली विवादग्रस्त चर्चाओं के दौरान एक बार उन्होंने अचानक मुझसे इस बारे में राय देने के लिए कहा कि क्या उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए.

वह तब तक एक निर्वाचित सांसद के रूप में कभी लोकसभा में नहीं आए थे. मुझे याद है कि मैं उस समय उनके जैसे कद के किसी व्यक्ति को राय देने के हिसाब से बहुत कनिष्ठ था और मैंने कोई राय देने से मना कर दिया.  फिर भी उन्होंने जोर दिया. तब मैंने उनसे कहा था कि उन्हें जीतने का पूर्ण विश्वास होने पर ही चुनाव लड़ना चाहिए.

आखिरकार, उन्होंने जंगीपुर से चुनाव लड़ा और जीते और फिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन तथा गठबंधन सरकार के मुख्य बिंदु के रूप में उभरे. वे यूपीए सरकार के लिए अपरिहार्य थे, गठबंधन सहयोगियों के साथ हर समिति में अपनी सेवा प्रदान की. वे हमेशा जोर देते थे कि मुझे संसद में आना चाहिए.

जब पार्टी के कहने पर मैंने 2005 में राज्यसभा में प्रवेश किया तब प्रणबदा ने जिस तरह से मेरा स्वागत किया, उसने मुझे बहुत प्रभावित किया. उन्होंने मुझे संसदीय कार्यवाही के बारे में मूल्यवान सुझाव दिए जिनके बारे में मुझे बहुत कम ज्ञान था. उन वर्षों के दौरान, उनके भारत का राष्ट्रपति चुने जाने तक, हम लगभग रोज बातचीत करते रहे थे.

एक अवसर पर, 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी से भारत को बचाने के लिए सफलता का दावा करते हुए प्रणबदा ने राज्यसभा को बताया कि भारतीय बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली को इंदिरा गांधी के बैंक राष्ट्रीयकरण के कदम का शुक्रगुजार होना चाहिए. भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर असहमति के बाद वामपंथियों ने 2008 में यूपीए से अपना समर्थन वापस ले लिया था.

मुझे याद है कि मैंने उनकी बात में हस्तक्षेप किया था और आग्रह किया था कि वे मुझे अपनी बात रखने की अनुमति दें, जिसे उन्होंने शालीनता के साथ मंजूर किया. ऐसी संसदीय शोभा और गरिमा अब अतीत की बात हो गई है. मैंने तब सदन को बताया था कि बैंक राष्ट्रीयकरण एक शर्त पर हुआ था और वामपंथी दलों ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार वी.वी. को अपने समर्थन के बदले में इंदिरा गांधी के सामने यह शर्त रखी थी. इसके अलावा वाम दलों ने कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के लिए भी कहा था.

भारत का राष्ट्रपति बनने के बाद पहली आधिकारिक यात्रा प्रणबदा ने बांग्लादेश की की थी. बांग्लादेश के दामाद के रूप में उनका शानदार स्वागत हुआ क्योंकि उनकी पत्नी शुभ्रा अविभाजित बंगाल के इस हिस्से से थीं. मैं इस राजकीय यात्रा में उनके साथ था.

बंगाल, उसकी संस्कृति, विभाजन, पीड़ाओं और परेशानियों के बारे में उनका ज्ञान अभूतपूर्व था. वे बंगालियों की संस्कृति और जीवन को गहराई से समझते थे. अपनी धार्मिक मान्यताओं और इससे जुड़ी संस्कृति दोनों के लिए, वे हर साल वे पूजा के दौरान अपने पैतृक गांव लौटते थे. उनके बेटे अभिजीत और बेटी शर्मिष्ठा के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएं हैं. प्रणब दा बहुत याद आएंगे.

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