piyush babele book on jawaharlal Nehru review by amit pandey | नेहरू मिथक और सत्य: भारत के पहले प्रधानमंत्री के पक्ष में जोरदार जिरह करती एक किताब
कुछ अध्याय पढ़ने के बाद ये स्पष्ट हो चुका था कि पीयूष बबेले की किताब 'नेहरू मिथक और सच्चाई' 2014 के संदर्भ में नेहरू के सच्चे रूप को सामने लाने की कोशिश है.

Highlightsनेहरू कुछ भी थोपना नहीं चाहते थे, न तो विकास और न ही विचारधारा. उन्हें चीन का मॉडल पसंद नहीं था, जिसमें मनुष्य की गरिमा का सम्मान नहीं था. नेहरू को विरासत में सोने की चिड़िया का मयूर सिंहासन नहीं, बल्कि गरीबी और भूख से जूझता भारत मिला था.

आप किसी किताब की समीक्षा लिखने बैठे हों और ये पता चले कि किताब छपते ही उसकी सारी प्रतियां बिक गई हैं और दूसरे संस्करण की छपाई का काम शुरू हो चुका है, तो जाहिर तौर पर यह खबर लेखक के लिए उत्साहजनक है, लेकिन समीक्षक की चुनौती बढ़ाने के लिए काफी है. पत्रकार और लेखक पीयूष बबेले की किताब 'नेहरू मिथक और सत्य' की समीक्षा करते समय मेरी भी यही स्थिति है. किताब रिलीज होते ही 'बेस्ट सेलर' का तमगा पा चुकी है.

नेहरू जैकेट (जिसे आजकल मोदी जैकेट भी कहा जाने लगा है) पर सुर्ख लाल गुलाब के फूल और गांधी टोपी (जिसे बीच में अन्ना टोपी भी कहा जाने लगा था) लगाए नेहरू, बचपन में सभी के चाचा थे. बड़े होने पर हम सभी के जीवन से नेहरू कहीं गुम हो गए. लेखक ने भी पुस्तक की शुरुआत में नेहरू को लेकर अपनी बनती बिगड़ी सोच के बारे में बताया है. वो कहते हैं कि 2014 तक वे नेहरू के लेकर लगभग बेपरवाह से रहे.

पीयूष लिखते हैं, 'नेहरू तो मेरे दिमाग में तब ज्यादा जोरदार ढंग से आए जब भारतीय जनता पार्टी ने 2013 में नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया. इस घोषणा के साथ ही मुझे यह बात स्पष्ट लगी कि आने वाले समय में सरदार वल्लभभाई पटेल सामाजिक विमर्श के केंद्र में आएंगे और पंडित नेहरू की निंदा के बहाने जरूर खोजे जाएंगे.' लेखक ने ये स्पष्ट नहीं किया कि 2013 में ऐसा उन्हें क्यों लगा, हालांकि बाद में हमने पाया कि हुआ ऐसा ही. और यही बात इस किताब को प्रासंगिक बना देती है.

कुछ अध्याय पढ़ने के बाद ये स्पष्ट हो चुका था कि पीयूष बबेले की किताब 'नेहरू मिथक और सच्चाई' 2014 के संदर्भ में नेहरू के सच्चे रूप को सामने लाने की कोशिश है. जानेमाने पत्रकार रवीश कुमार ने इस पुस्तक के लिए लिखी गई अपनी भूमिका में इसे और स्पष्ट कर दिया है. वे लिखते हैं, 'पत्रकार पीयूष बबेले ने नेहरू को लेकर फैलाए जा चुके अनेक मिथ्या प्रकरणों के इस दौर में नेहरू के सत्य को कायम करने की कोशिश की है.' इस तरह पीयूष एक मंझे हुए वकील की तरह अपने मुवक्किल पर लगाए गए संगीन आरोपों का बचाव कर रहे हैं. 

नेहरू से जुड़े तथ्य और घटनाक्रम

इस किताब की सबसे अनोखी बात यह है कि जहां आमतौर पर हम सभी अपनी राय देने के लिए उतावले रहते हैं, वहीं इस किताब में लेखक ने अपनी राय बहुत कम रखी है. उन्होंने सिर्फ तथ्यों और घटनाक्रम को एक धागे में पिरो दिया है. हालांकि ये काम इतना आसान था नहीं. इसके लिए प्रमाणिक सामग्री की तलाश में कई वर्ष लगे और फिर 40 हजार से ज्यादा पन्नों को करीब 400 पन्नों में समेटा गया.

एक तरफ सूचना-संचार की दृष्टि से आज की सबसे ताकतवर धारा है, जो हमारी हर समस्या के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराती है. टीवी डिबेट और फेसबुक की वॉल से होते हुए गली-चौराहे तक नेहरू को विलेन साबित करने की होड़ है. दूसरी ओर पीयूष बबेले प्रमाणिक ऐतिहासिक तथ्यों से सजी एक दिलचस्प कहानी के साथ खड़े हैं. पीयूष के तथ्य सच्चे हैं, इसलिए वह अपने विपक्षी पर भारी हैं. लब्बोलुआब यही है कि नेहरू के बारे में कोई अंतिम राय बनाने से पहले इस किताब को जरूर पढ़ना चाहिए.

मुझे किताब पढ़ कर समझ में आया कि अगर वर्तमान सरकार को तथाकथित 60 साल का कुशासन विरासत में मिला, तो नेहरू को भी करीब 150 साल की अंग्रेजों की गुलामी विरासत में मिली थी. हिंदू राष्ट्रवादी चाहें तो इसे 750 साल की गुलामी भी पढ़ सकते हैं. इस लिहाज से नेहरू प्रदर्शन काफी प्रभावशाली रहा. नेहरू जो देश की जटिलताओं को समझ भी रहे थे और सबको साथ लेकर नए भारत की बुनियाद भी रख रहे थे. 

पीयूष हमें बेहतर तरीके से समझाते हैं कि नेहरू को विरासत में सोने की चिड़िया का मयूर सिंहासन नहीं, बल्कि गरीबी और भूख से जूझता भारत मिला था. किताब में राष्ट्रवाद, जम्मू-कश्मीर, भारत-चीन युद्ध और भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल के साथ उनके संबंधों को इन्हीं महापुरुषों के हवाले से समझाया गया है. इन बातों को विस्तार से जानने के लिए तो आपको 'नेहरू मिथक और सत्य' खरीदनी जरूर चाहिए. किताब की भाषा बेहद सरल-सरस है और किताब की कीमत है सिर्फ 300 रुपये. किताब अमेजन और फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध है.

नीचे पढ़ें 'नेहरू मिथक और सत्य' का एक अंश-

"नेहरू कुछ भी थोपना नहीं चाहते थे, न तो विकास और न ही विचारधारा. उन्हें चीन का मॉडल पसंद नहीं था, जिसमें मनुष्य की गरिमा का सम्मान नहीं था. उन्हें सोवियत संघ का मॉडल पसंद नहीं था, क्योंकि वह इंसान को मशीन की तरह इस्तेमाल करना चाहता था. उन्हें अमेरिका और उसके पिछलग्गुओं का पूंजीवादी मॉडल तो बिल्कुल नागवार था, क्योंकि उसका आधार मुनाफा और लालच था. नेहरू का सिद्धांत था- सब को आगे बढ़ने के समान मौके मुहैया कराना. वह हर काम में अपने उस्ताद महात्मा गांधी की तरह आम जनता की सहमति और इच्छा चाहते थे. अनेकता में एकता ही उनका नारा था क्योंकि उन्हें पता था कि तेजी से आगे बढ़ने के नाम पर चुने हुए नेताओं को फासीवाद की तरफ मुड़ने में देर नहीं लगती. वह 19वीं और 20वीं शताब्दी में यूरोप में हुई इस तरह की क्रांतियों से पनपे तानाशाहों और उनके कारण मानवता को हुए नुकसान से खूब वाकिफ थे. और भारत को हर कीमत पर उससे बचाना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने चुनाव मशीनरी को लोकतांत्रिक दृष्टि से बहुत मजबूत किया."


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