Nationalist Congress Party: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) में महत्वाकांक्षा रखना कोई नई बात नहीं है, क्योंकि 25 मई 1999 को पार्टी का गठन ही निजी लक्ष्यों पर केंद्रित होकर किया गया था. तब पार्टी के मुखिया शरद पवार कांग्रेस से दूसरी/तीसरी बार अलग हुए थे और इस बार उन्होंने देश के दो अन्य नेताओं पीए संगमा और तारिक अनवर को साथ लिया था. उनके साथ भी महाराष्ट्र कांग्रेस से जितने नेता आए वे सभी निजी सोच और चिंता के साथ गए. पवार सहित सभी नेता कांग्रेस में उतने भी हताश-निराश नहीं थे, जिस तेजी के साथ वे नए दल के साथ हो लिए.
एक बार फिर 24 साल बाद मई 2023 में गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ा और उत्तराधिकारी चुनने तक बात पहुंची. लेकिन उस आग को अचानक और बिना कोई कारण बताए बुझा दिया गया. नतीजा यह हुआ कि जुलाई 2023 में पार्टी में विभाजन हो ही गया और 40 विधायकों के साथ एक नया दल अस्तित्व में आ गया.
एक समय जब कांग्रेस से अलग होकर अलग पहचान के लिए प्रयास हुआ, वहीं दूसरी बार नए चेहरे को सामने लाने में बात इतनी उलझ गई कि पार्टी दो-फाड़ हो गई. किंतु आज नेतृत्व का सवाल वही है, जो दो साल पहले उठा था. वह अब विभाजन के बाद एकीकरण के नाम पर अधिक जटिल हो चला है. वर्ष 1999 में जब शरद पवार कांग्रेस से अलग हुए थे, तब उन्होंने कांग्रेस में विदेशी नेतृत्व का मुद्दा उठाया था,
जिस पर उन्हें व्यापक सहमति नहीं मिली, लेकिन उन्होंने राज्य के राजनीतिक समीकरण अवश्य ही बदल दिए. अलग होने से पहले और केंद्र में जाने के बाद उन्हें राज्य में अपने किसी नेता को उपमुख्यमंत्री बनाने में सफलता नहीं मिलती, लेकिन नया दल बनाने के बाद उनकी मोलभाव की क्षमता बढ़ी. उन्हें केवल राज्य में उपमुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि अनेक अच्छे विभागों के मंत्री पद मिले.
यही नहीं, केंद्र में भी राजनीतिक हैसियत बढ़ने से केंद्रीय मंत्रिमंडल में अच्छे विभाग हासिल हुए. हालांकि उस समय कांग्रेस से अलग हुए अधिक दिन नहीं बीते थे. दूसरे शब्दों में, थोड़ा-सा खतरा मोल लेकर महत्वाकांक्षा पूरी हो गई थी. उस समय अजित पवार तो उनके परिवार के ही सदस्य थे, लेकिन छगन भुजबल, जयंत पाटिल, मधुकरराव पिचड़, हसन मुश्रीफ, अनिल देशमुख, राजेश टोपे, जितेंद्र आव्हाड़ जैसे अनेक नेता राजनीति में अपना कद रखने के बावजूद शरद पवार की राकांपा की ओर खिंचे चले गए और अधिकतर नेताओं को अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने का अवसर मिला.
यह राजनीतिक सुख तभी तक बना रहा, जब तक केंद्र और राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार रही, लेकिन वर्ष 2014 से देश में बड़ा राजनीतिक बदलाव आने से छिपी असहजता सामने आने लगी. जिसे मूर्त रूप वर्ष 2019 में मिला और आखिरकार राकांपा के समर्थन से राज्य में उद्धव ठाकरे की सरकार बनी. वैसे तो राकांपा में महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए हमेशा ही कोई न कोई रास्ता निकाला जाता रहा,
लेकिन उत्तराधिकार को लेकर कभी स्थितियां साफ नहीं हुईं. राजनीति में शरद पवार के साथ उनके सबसे निकट भतीजे अजित पवार ही रहे. जिन्होंने वर्ष 1991 से वर्ष 2023 तक उन्हें हर प्रकार का साथ दिया. वर्ष 2006 में शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले का राज्यसभा से राजनीति में आगमन हुआ, जिन्होंने सात साल पहले बनी राकांपा पर अजित पवार के वर्चस्व पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया.
जब सुले वर्ष 2009 में बारामती से लोकसभा के लिए चुनी गईं, तब कई सवालों के जवाब मिलने आरंभ हो गए. उनकी वर्ष 2019 में उद्धव ठाकरे की सरकार बनाने में भूमिका के बाद कुछ और बातें भी साफ हो गईं. इसीलिए जब दो मई 2023 को शरद पवार ने पार्टी प्रमुख के पद से त्यागपत्र दिया तो उनके उत्तराधिकारी को लेकर जिज्ञासा अधिक बढ़ गई.
महत्वाकांक्षी नेताओं के दल में अनेक नेताओं के नाम सामने आने लगे. यद्यपि सभी को मालूम था कि इस घटनाक्रम को सुले या अजित पवार के नाम के बाद विराम मिलेगा. किंतु अंत चौंकाने वाला ही था, जिसमें शरद पवार ने ही इस्तीफा वापस ले लिया. यह तात्कालिक स्तर पर उचित निर्णय कहा गया, मगर इसके दूरगामी परिणामों का आकलन नहीं किया गया.
कहीं न कहीं आग बुझाकर एक चिंगारी को छोड़ दिया गया. लिहाजा दो माह बाद पार्टी दो-फाड़ हो गई. वर्ष 2023 में विभाजन के बाद राकांपा का अजित पवार गुट बना. उसने राज्य में भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार के साथ हिस्सेदारी हासिल की. वर्ष 2024 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों ने राकांपा के दोनों गुटों को उनकी ताकत का अनुभव कराया,
जिससे नुकसान और फायदे भी सामने आए. यही कुछ बात आपस में विलय की हुई, लेकिन संकट उत्तराधिकारी के नाम पर तैयार हुआ. दुर्भाग्य से इसी बीच अजित पवार असामयिक मौत के शिकार हो गए. परंतु उनके न रहने के बाद कुछ पीछे की पंक्ति में बैठे नेता भी सामने आ गए. जिनमें से एक रोहित पवार भी हैं, जो दूसरी बार विधायक बने.
जिनके लिए मंच से अजित पवार कहते थे कि वह उनकी ‘कृपा’ से विधायक बने. मगर नए माहौल में उनकी तमन्ना छिपाए नहीं छिप रही है. सवाल यही है कि 27 साल पहले महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए गठित पार्टी कब और कैसे अपने नेताओं को संयम और त्याग का पाठ पढ़ाएगी? भले ही दल तीन दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा हो,
लेकिन नेताओं के आचरण में परिपक्वता या अनुशासन का अभाव झलकता है. वे पवार परिवार की डोर से बंधे तो नजर आते हैं, लेकिन उसके परे बेतरतीबी से बिखरे भी नजर आते हैं. शायद यही पार्टी के उत्तरार्द्ध में उत्तराधिकार का संघर्ष है. सर्वविदित है कि दल वर्षों के परिश्रम और नैतिकता के आधार पर तैयार जमीन में खड़े होते हैं. उन्हें मनोकामना से बल कभी नहीं मिलता है. थोड़ा भ्रम अवश्य कुछ समय साथ चलता है.