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ब्लॉग: क्या छोटे दल दिखा पाएंगे अपनी ताकत बड़ी?

By अभिषेक श्रीवास्तव | Updated: April 13, 2024 10:56 IST

आरक्षण आंदोलनों से जाति विशेष से प्रभावित छोटे दलों का प्रभाव विपरीत परिणाम भी दे सकता है. मजबूरी के हालात के चलते छोटे दलों को बड़े दलों की ओर से महत्व मिलना राजनीतिक जरूरत है।

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महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को होने जा रहा है और काफी कुछ तय होने के बावजूद छोटे दल कहीं इधर से तो कहीं उधर से बड़े दलों के साथ मोलभाव में लगे हुए हैं। यूं देखा जाए तो राज्य में दो मुख्य गठबंधन चुनाव मैदान में हैं, जिनमें से एक महाविकास आघाड़ी और दूसरा महागठबंधन है। दोनों में एक का तो सीटों का बंटवारा हो चुका है, लेकिन दूसरे का अंतिम बंटवारा सामने आना बाकी है। दोनों ही गठबंधन मुख्य रूप से तीन दलों के तालमेल के साथ तैयार हुए हैं, इसलिए तीनों दलों को अपने छोटे मित्र दलों को संतुष्ट करना है।

राज्य में चुनाव की बयार बहने के साथ प्रकाश आंबेडकर नीत वंचित बहुजन आघाड़ी, राज ठाकरे नीत महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, राजू शेट्टी नीत स्वाभिमानी पक्ष, महादेव जानकर नीत राष्ट्रीय समाज पक्ष, अरविंद केजरीवाल नीत आम आदमी पार्टी, मायावती नीत बहुजन समाज पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी नीत ऑल इंडिया मजलिस- ए- इत्तेहादुल मुस्लिमीन, बच्चू कडू नीत प्रहार जनशक्ति पार्टी, अबू आजमी नीत समाजवादी पार्टी, वाम दल, जोगेंद्र कवाड़े की पीपल्स रिपब्लिकन पार्टी, रामदास आठवले नीत रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया(आठवले), हितेंद्र ठाकुर नीत बहुजन विकास आघाड़ी जैसे अनेक दल बड़े दलों के साथ तालमेल के लिए सामने आ जाते हैं। कुछ हद तक बड़े दल ही उनकी स्थानीय ताकत को समझ कर हिस्सा बांट की तैयारी के लिए कदम उठाते हैं। इनमें महत्व उन्हीं को मिलता है, जिनका प्रभाव अपने क्षेत्र में अधिक होता है।

पिछले चुनाव में कुल 95 दलों ने हिस्सा लिया। यदि मतों के हिसाब से देखा जाए तो दस-बारह दलों के अलावा सभी दल सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए थे। यदि मतदान की हिस्सेदारी के हिसाब से देखा जाए तो 15 प्रतिशत मत मुख्य गठबंधनों के अलावा छोटे दलों और निर्दलीयों के पास थे। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवारों ने 51.3 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे, संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे के प्रत्याशियों ने 33.7 प्रतिशत मत पाए थे। यदि इन आंकड़ों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो छोटे दल, यहां तक कि निर्दलीयों के मत भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

बीते दो लोकसभा चुनावों की तुलना में वर्तमान चुनाव में राजनीतिक स्थितियां देखी जाएं तो वे बहुत ही विचित्र स्तर तक पहुंच चुकी हैं। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा) के बिखराव के चलते किसी भी दल को अपनी ताकत समझ में नहीं आ रही है। भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) और कांग्रेस दोनों बिखरे हुए दलों के गठबंधन में साथी होने के कारण अपनी क्षमता का सही अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं। अनेक स्थानों पर उन्हीं उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ना है, जिनका सालों-साल समर्थन किया था। यदि ऐसे में मत विभाजन हुआ तो दो की लड़ाई में तीसरे का भला के समीकरण अनेक स्थानों पर बन सकते हैं।

इसी कारण वर्तमान चुनाव में दलों के बीच, सीटों के बंटवारे को लेकर अधिक गंभीरता बरती जा रही है। वहीं छोटे दलों को नजरअंदाज करने का कोई खतरा मोल नहीं लिया जा रहा है. परभणी में राष्ट्रीय समाज पार्टी के नेता जानकर का नामांकन भरने के समय उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को उपस्थित रहना पड़ा, जबकि अमरावती में नवनीत राणा को भाजपा में शामिल करने के लिए पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले स्वयं पहुंचे।

मनसे के नेता राज ठाकरे और उनके बेटे अमित ठाकरे से मिलने से लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने व्यस्त समय में से भी समय निकाला. हालांकि वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रकाश आंबेडकर को अपने दांव को खेलने में अधिक सफलता नहीं मिली। इसी के चलते उन्होंने ज्यादातर स्थानों पर अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया है। रिपाई(आठवले) को भाजपा ने सीट नहीं दी है, फिर भी वह अपना समर्थन दे रही है।

अमरावती में चुनाव लड़ रहे रिपब्लिकन सेना के उम्मीदवार आनंद आंबेडकर को एआईएमआईएम ने समर्थन दिया है। वहीं मनसे प्रमुख ने तो अपनी गुढ़ी पाड़वा की सभा में भाजपा को खुला समर्थन देने की घोषणा कर दी है। कुल मिलाकर जिसको जहां जगह मिल रही है, वह वहां पांव रखकर अपनी जगह को गंवाना नहीं चाह रहा है। कुछ वर्तमान की चिंता में परेशान हैं, कुछ दल आने वाले विधानसभा चुनावों की भी सोच रहे हैं। कुछ छोटे दल तो नगर पालिकाओं और जिला परिषदों में वर्चस्व बनाए रखने के लिए भाव-ताव कररहे हैं।

वर्तमान चुनाव में जब प्रमुख दलों का अपने ही मतों को संभाल पाना अनिश्चित हो चला है, ऐसे में छोटे दलों पर कितना भरोसा किया जाए, यह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो चला है। अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में त्रिकोणीय से लेकर चतुष्कोणीय मुकाबलों के समीकरण आसानी से ही बन रहे हैं, इसलिए कम अंतर से विजय पाने के लिए कुछ सहारों को जरूरत भी बन पड़ी है। मगर मतों के बिखराव की अत्यधिक संभावनाओं के चलते किसी पर भी विश्वास कर पाना आसान नहीं है।

बीते चुनावों में किसी छोटे दल के किसी एक पाले में जाने से मतों का अंतर बदल जाता था, लेकिन अब उस अंतर में भी बंटवारा होने की आशंका के चलते छोटे दलों की बड़ी भूमिका सवालों के घेरे में आ चुकी है। साथ ही जाति-धर्म के समीकरण अपनी जगह जोर लगा रहे हैं। आरक्षण आंदोलनों से जाति विशेष से प्रभावित छोटे दलों का प्रभाव विपरीत परिणाम भी दे सकता है. मजबूरी के हालात के चलते छोटे दलों को बड़े दलों की ओर से महत्व मिलना राजनीतिक जरूरत है।

किंतु उलझी स्थितियों में लाभ-हानि का सही आंकलन चुनाव के बाद ही हो पाएगा। फिलहाल हर बड़ा दल भी अपनी नैया अपने हाथों संभाल रहा है, जो मंझधार में हिचकोले खा रही है। चुनाव के बाद जो पार लगेगा, वही अपना सच्चा खेवैया तय करेगा। 

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