Karnataka Assembly Election is first semi final before final between bjp and congress in 2019 rajasthan and madhya pradesh | 2019 के फाइनल से पहले पहला सेमीफाइनल है कर्नाटक, राजस्थान-मध्य प्रदेश चुनाव में होगा दूसरा सेमीफाइनल

कर्नाटक में करीब पाँच लाख मतदाता 224 सीटों में से 222 विधान सभा सीटों का भविष्य तय कर रहे हैं। हिन्दी पट्टी में भी कर्नाटक के चुनाव को काफी उत्सुकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कर्नाटक में बीजेपी और कांग्रेस का आमने-सामने होना। राजनीतिक जानकार कर्नाटक विधान सभा चुनाव को 2019 के लोक सभा चुनाव का पहला सेमीफाइनल मान रहे हैं। थर्ड फ्रंट की आहटों के बावजूद ये लगभग तय है कि अगला आम चुनाव भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच ही होना है। थर्ड फ्रंट अगर बना भी राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका वैसी ही होगी जैसी कर्नाटक में फिलहाल जनता दल (सेकुलर) की नजर आ रही है।

अगला लोक सभा चुनाव अगले साल मई तक होना है। लोक सभा चुनाव से पहले दो ऐसे बड़े राज्यों में विधान सभा चुनाव है जहां मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच होना है। ये राज्य हैं राजस्थान और मध्य प्रदेश। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि  राजस्थान-मध्य प्रदेश का चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के बीच दूसरा सेमीफाइनल होगा। इन तीनों विधान सभा चुनावों से अगले आम चुनाव का रुख भाँपा जा सकेगा क्योंकि इन राज्यों में वही खिलाड़ी मैदान में हैं जो लोक सभा में आमने-सामने होंगे। वही मुद्दे होंगे जिन पर अभी कर्नाटक और बाद में राजस्थान और मध्य प्रदेश का चुनाव लड़े जाएंगे।  आइए देखते हैं वो कौन से तीन मुद्दे हैं जो इन तीनों विधान सभा चुनावों और लोक सभा में कॉमन होंगे।

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1- बीजेपी बनाम कांग्रेस- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पिछले लोक सभा चुनाव से पहले से कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा दिया था। चुनाव जीतने के बाद पिछले एक साल में पीएम मोदी, अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी कह चुके हैं कि कांग्रेस-मुक्त भारत का वैसा मतलब नहीं है जैसा आम तौर पर निकालते हैं। हालाँकि कर्नाटक चुनाव में एक बार फिर पीएम मोदी और अमित शाह कर्नाटक को कांग्रेस-मुक्त कराने की  मंशा जाहिर करते नजर आए। राष्ट्रीय राजनीति में किसी भी अन्य राजनीतिक दल की ऐसी स्थिति नहीं है कि जिस पर तीसरे विकल्प के रूप में विचार करे। बीजेपी खुद भी शायद कांग्रेस को सामने रखकर ही चुनाव लड़ना चाहती है। लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ बीजेपी नेता अतीत में राष्ट्रीय राजनीति में दो दलीय प्रणाली का समर्थन कर चुके हैं। खुद कांग्रेस भी बीजेपी के आ जाने का हव्वा दिखाती नजर आती है क्योंकि उसकी नजर में बाकी सारे दल "सेकुलर" हैं। कांग्रेस भले ही तीन राज्यों (पंजाब, पुदुच्चेरी और कर्नाटक) में बची हो जिन राज्यों में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं तीनों में ही बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में वही है। यानी दोनों दल एक दूसरे के खिलाफ वही लाइनलेंथ चुन रहे हैं जो अगले लोक सभा तक काम आए।

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2- नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी- गुजरात विधान सभा के नतीजे आने के ठीक पहले राहुल गांधी को सोनिया गांधी की जगह कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया। हालाँकि इसके लिए राहुल ने काफी लम्बा इंतजार कराया। इसी तरह  प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर भी लम्बे समय से राहुल के आधिकारिक हाँ का इंतजार हो रहा था। ये इंतजार अब कर्नाटक चुनाव के लिए मतदान से ठीक पहले पूरा हुआ है। राहुल ने कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान ही पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा कि अगर 2019 में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने की संभावना हुई तो उन्हें पीएम बनने से गुरेज नहीं होगा। सोशल मीडिया पर बीजेपी के समर्थक लम्बे समय से कांग्रेस बनाम बीजेपी की लड़ाई को राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी की लड़ाई बताते रहे हैं। बीजेपी समर्थक अक्सर ये कहते पाए जाते हैं कि मोदी नहीं तो क्या राहुल को चुन लें? लेकिन ये पहली बार होगा कि आधिकारिक तौर पर पीएम उम्मीदवार के रूप में दोनों नेता आमने-सामने होंगे। कर्नाटक चुनाव के दौरान ही राहुल गांधी ने पीएम मोदी को सीधी बहस की चुनौती दे दी। खुद पीएम भी अपने सामने राहुल गांधी को ही रखते नजर आते हैं। यानी अब से लेकर अगले आम चुनाव तक दोनों नेताओं के बीच सीधा दंगल होगा। बहुत संभव है कि कांग्रेस लोक सभा चुनाव से पहले ही आधिकारिक तौर पर राहुल को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दे। इस लिहाज से भी 2019 में राहुल बनाम मोदी के फाइनल से पहले कर्नाटक और राजस्थान-मध्य प्रदेश सेमीफाइनल साबित होंगे।

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3- मेरा काम बनाम तेरा काम- कर्नाटक की तरह ही राजस्थान, मध्य प्रदेश और आम चुनाव में जनता को बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनाव करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोक सभा के प्रचार में इस बात पर बहुत जोर दिया कि कांग्रेस को देश की जनता ने 60 साल दिए हैं तो बीजेपी को 60 महीने देकर देखना चाहिए। ये अलग बात है कि बीजेपी को देश की जनता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार को नरेंद्र मोदी से पहले ही 60 से ज्यादा महीने दे चुकी थी। 2014 में देश की जनता ने नरेंद्र मोदी की बात सुन ली। केंद्र समेत इस समय 21 राज्यों में बीजेपी या बीजेपी-गठबंधन की सरकार है। कर्नाटक में पिछले कुछ दशकों से लगभग हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता रहा है। आज के चुनाव में कांग्रेस सत्ता में है तो बीजेपी विपक्ष में। वहीं राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी सत्ता में है और कांग्रेस विपक्ष में। राजस्थान की स्थिति कमोबेश कर्नाटक जैसी है, बस भूमिकाएँ उलट गयी हैं। राजस्थान में पिछले कुछ दशकों से कांग्रेस और बीजेपी के बीच सत्ता का अदल-बदल हो रहा है। राज्य में पिछले विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया था। आगामी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस दोबारा गद्दी पाने की कोशिश करेगी।

मध्य प्रदेश में करीब डेढ़ दशक से बीजेपी सरकार है। मौजूदा हालात में इस बात की पूरी उम्मीद है कि बीजेपी के सीएम उम्मीदवार वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही रहेंगे। कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता कमलनाथ को मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस आलाकमान ने मध्य प्रदेश का प्रचार समिति का प्रमुख  बनाया है। बीजेपी ने 2014 के लोक सभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को प्रचार समिति का प्रमुख बनाया था, उन्हे आधिकारिक तौर पर पीएम पद का उम्मीदवार बाद में घोषित किया गया था। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस भी बीजेपी के इसी दाँव को आजमा रही है और उसने इशारा कर दिया है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश में सीएम उम्मीदवार हो सकते हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास सत्ताविरोधी लहर का फायदा उठाने का मौका होगा।   

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वहीं लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के पास पिछले साल क्लीन स्लेट थी। लेकिन अगले चुनाव में 60 महीने में किए गए उनके कामकाज के आधार पर जनता उन्हें तौलेगी। जाहिर है, "60 साल बनाम 60 महीने" के जुमले की असली परीक्षा अगले साल ही होगी। अभी तक सभी चुनावों में बीजेपी कांग्रेस के "आ जाने" का डर दिखाती रही है। पिछले आम चुनाव तक ये पलड़ा एक तरफ झुका हुआ था लेकिन अगले चुनाव में कांग्रेस के पास चार साल पूरी कर चुकी नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ ढेरों मुद्दे हैं। कर्नाटक चुनाव में ही पीएम मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी-अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। जहाँ पीएम ने बीजेपी के शासन को अच्छा बताया तो कांग्रेस अध्यक्ष ने कांग्रेस के शासन को। कुल मिलाकर पलड़ा एक तरफ झुका हुआ नहीं दिखा।

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