Indian postal service stays in communication era | संचार क्रांति के दौर में भी कायम है भारतीय डाक 
संचार क्रांति के दौर में भी कायम है भारतीय डाक 

अरविंद कुमार सिंह

संयुक्त राष्ट्र संघ के बनने के भी पहले 9 अक्तूबर 1874 को विश्व डाक संघ बना और विभिन्न देशों की डाक सेवाओं का आपस में एक बेहतरीन जुड़ाव इसी समय हुआ। इसके बाद से दुनिया भर की तमाम डाक सेवाओं ने खुद को बदला और सुधारा। 9 अक्तूबर 1874 को  विश्व डाक संघ के गठन की याद में ‘विश्व डाक दिवस’ मनाया जाता है। 

भारत 1 जुलाई 1876 को इसका सदस्य बनने वाला पहला एशियाई देश था। विश्व डाक दिवस पर दुनिया भर के डाक प्रशासन आयोजन करते हैं और अपनी सेवाओं के प्रति लोगों में जागरूकता लाने का प्रयास करते हैं। लेकिन 164 साल पुरानी भारतीय डाक दुनिया की सभी डाक प्रणालियों में आज भी अव्वल है। 

दुनिया भर में सूचना और संचार क्रांति के असर के नाते डाकघर या तो बंद हो रहे हैं या सिमट रहे हैं, जबकि भारतीय डाक का विस्तार हो रहा है। आज भी ये सारे ग्रामीण इलाकों में खास तौर पर अपनी अहमियत बरकरार रखे हैं। शायद ही कोई नागरिक हो जिसका साबका किसी न किसी रूप में डाकघरों से न पड़ता हो। चाहे सामान्य डाक हो, बैंकिंग सेवा हो, जीवन बीमा और मनीऑर्डर हो या फिर पोस्टल ऑर्डर, रिटेल सेवाओं का मामला हो या फिर स्पीड पोस्ट का, मनरेगा की मजदूरी हो या फिर कई वित्तीय सेवाएं - भारतीय डाक के बिना काम नहीं चलता। 

भारतीय डाक के पास 1.55 लाख डाकघरों का विशाल नेटवर्क मौजूद है। एक डाकघर औसतन 7753 व्यक्तियों को सेवा दे रहा है। हमारे करीब 90 फीसदी और 1.39 लाख डाकघर गांवों में हैं। एक डाकघर औसतन  21.56  वर्ग किमी को सेवा प्रदान कर रहा है। डाकघरों में कुल 1.84 लाख विभागीय कर्मचारी और ढाई लाख ग्रामीण डाक सेवक हैं। इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया के इस दौर में समय के साथ भारतीय डाक ने खुद को बदला है, इसी नाते वह रेस में बना हुआ है। 

भारतीय डाक की सबसे बड़ी ताकत पोस्टमैन या डाकिया है। वह आज भी सरकार और जनता के बीच सबसे मजबूत कड़ी और खुद में एक बड़ी संस्था बना हुआ है। वह अपने इलाके के भूगोल ही नहीं समाज की भी गहरी समझ रखता है। लोग उसे अपना शुभचिंतक मानते हैं। राष्ट्रपति भवन हो या गरीब की झोपड़ी, हर जगह डाकिये को सम्मान मिलता है। वह सदियों तक बच्चों के सबसे लोकप्रिय खिलौनों का हिस्सा रहा। उसे कथा-कहानियों, लोकगीतों और फिल्मों में खास जगह मिली।

बेशक मोबाइल क्रांति में डाकिए की वह पुरानी जगह नहीं रह पाई है लेकिन उसकी अहमियत कायम है। आज भी वे जम्मू-कश्मीर और  पूर्वोत्तर के कई कठिन और नक्सल इलाकों में जान हथेली पर रख काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट पोस्ट पेमेंट्स बैंक की सफलता का दारोमदार भी इन पर ही डाला गया है।


Web Title: Indian postal service stays in communication era
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