indian media paid news assembly elections | झूठ का सहारा लेने वालों को बेनकाब करे मीडिया
झूठ का सहारा लेने वालों को बेनकाब करे मीडिया

विश्वनाथ सचदेव

पैसे लेकर खबरें छापने/ प्रसारित करने की बात भले ही नई नहीं हो, पर पेड न्यूज का खबर बनना बहुत पुरानी बात नहीं है। कुछ ही साल पहले एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री पर पैसे देकर अखबारों में अपने समर्थन में बड़ी-बड़ी खबरें छपवाने का आरोप लगा था। और तभी यह बात भी जोर-शोर से उठी थी कि छोटे ही नहीं, बड़े-बड़े अखबार भी पैसा लेकर खबरें छापने में लगे हैं। यानी पैसा देने वाला भी तैयार था, लेने वाला भी तैयार था। 

इसका यही परिणाम निकल सकता था कि खबर विज्ञापन बनती गई और अखबारों की, मीडिया की विश्वसनीयता खत्म होने के कगार पर पहुंच गई। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में, जनतांत्रिक समाज में शासन का चौथा स्तंभ माने जाने वाले मीडिया की यह स्थिति होना शर्म की बात तो है ही, पूरी व्यवस्था के लिए एक खतरे का संकेत भी है। और यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब हम यह देखते हैं कि मीडिया की यह दयनीय स्थिति न शासन को परेशान कर रही है और न ही जनता को। 

मान लिया गया है कि राजनीति ऐसे ही चलती है, चलेगी और मीडिया यानी खबरपालिका जनतंत्र का एक स्तंभ नहीं, एक व्यवसाय है-और व्यवसाय नफे के लिए ही किया जाता है। 

जहां तक मीडिया की विश्वसनीयता के संकट का सवाल है, बात पेड न्यूज  तक ही सीमित नहीं है। एक और शब्द भी प्रचलित हो रहा है मीडिया की दुनिया में- फेक न्यूज। अंग्रेजी के इस शब्द का अर्थ होता है नकली यानी झूठी खबर। वैसे तो पेड न्यूज  भी एक तरह से झूठी खबर ही है, पर फेक न्यूज का खतरा और ज्यादा है। पेड न्यूज में, फिर भी, इस बात का पता लगने की संभावना होती है कि पाठक या दर्शक को सच्चाई का अहसास हो सकता है, पर फेक न्यूज में इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि झूठ पकड़ा न जाए-झूठ को सच मान लिया जाए।  

उदाहरण के लिए, यदि प्रधानमंत्री के स्तर का नेता कोई बात कहता है तो उसे गलत मानने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। ऐसे में जब किसी प्रधानमंत्री पर गलत तथ्यों को आधार बनाकर अपनी बात जनता के गले उतारने का आरोप लगता है तो हैरानी भी होती है और दु:ख भी होता है। अज्ञान अथवा गलती हो जाना क्षम्य हो सकता है, पर जब यह लगे कि कुछ निहित स्वार्थो के लिए जान बूझकर ग़लतबयानी की जा रही है तो नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। 

हमारे अपने प्रधानमंत्री पर ऐसा ही सवाल उठाया गया था। चार, साढ़े चार साल पहले उन्होंने बिहार की एक जनसभा में तक्षशिला विश्वविद्यालय के राज्य में होने की बात कही थी। मैं इसे गलती हो जाना मानता हूं। इस बात की पूरी संभावना है कि वे विक्रमशिला विश्वविद्यालय के स्थान पर तक्षशिला बोल गए होंगे। लेकिन जब कर्नाटक के पिछले चुनावों में प्रधानमंत्री ने कुर्ग की एक चुनावी सभा में देश के दो बहादुर और प्रशंसित सेनाध्यक्षों जनरल थिमैया और जनरल करियप्पा के कथित अपमान की दुहाई देकर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर आरोप लगाए तो यह स्पष्ट था कि वे उस क्षेत्र के मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। जनरल थिमैया और जनरल करियप्पा, दोनों कुर्ग क्षेत्र के ही थे।  

कर्नाटक के चुनाव भी अब बीती बात हो चुके, अब उसकी बात क्यों? सवाल गलत नहीं है, पर यह भी सही है कि पिछले तीन-चार साल में देश कुल मिलाकर चुनावी माहौल में ही जी रहा है। इस बीच कई जगह चुनाव हुए हैं और कई जगहों पर हमारे नेता चुनावी अंदाज में ही बातें करते रहे हैं। अब तो चार राज्यों में मतदान की घोषणा भी की जा चुकी है। यानी राजनीति में झूठ के बोलबाले के लिए मैदान तैयार है। 

झूठ के सहारे राजनीति चलाने की यह बीमारी सिर्फ हमारे ही देश में नहीं है। सबसे ताकतवर जनतंत्र माना जाने वाला देश अमेरिका भी इस बीमारी से ग्रस्त है। वॉशिंगटन पोस्ट  नामक अमेरिका के एक नामी अखबार ने हाल ही में बाकायदा गिनती करके अपने देश की जनता को यह बताया था कि अपने शासन के पहले वर्ष में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने 2150 बार झूठ बोला था और अगले छह महीनों में सार्वजनिक झूठ की यह गिनती बढ़कर 4229 हो गई। 

यह अच्छी बात है कि अमेरिकी मीडिया इतना जागरूक है, इस तरह की गिनती सामने रख कर जनता को आगाह करता है। हमारी त्रसदी दुहरी है। एक तो राजनेता झूठ बोलना अपना अधिकार समझते हैं, और दूसरे, मीडिया इस झूठ को बेनकाब करना अपना कर्तव्य नहीं समझता। नेताओं का झूठ कभी सामने आता भी है तो अक्सर इस रूप में कि उसे अज्ञान या गलती मान लिया जाए, अपराध नहीं। जनतांत्रिक मूल्यों का तकाजा है कि राजनीति करने वाले स्वयं इस अपराध की गंभीरता को समङों और जनतंत्र का पहरेदार माना जाने वाला मीडिया भी राजनीतिक स्वार्थो की सिद्धि के लिए झूठ का सहारा लेने वालों को बेनकाब करने का अपना दायित्व निभाए।


Web Title: indian media paid news assembly elections
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