ब्लॉग: मोदी-पवार के बीच मिलनसारिता का राज, यूपीए के शासनकाल से है इसका कनेक्शन

By हरीश गुप्ता | Published: July 22, 2021 12:50 PM2021-07-22T12:50:52+5:302021-07-22T12:53:41+5:30

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शरद पवार के बीच मिलनसारिता को लेकर अक्सर बातें होती रहती हैं। हालांकि कई लोगों के इसके पीछे की कहानी पता नहीं है।

Harish Gupta Blog Inside story connection between Sharad Pawar and Narendra Modi | ब्लॉग: मोदी-पवार के बीच मिलनसारिता का राज, यूपीए के शासनकाल से है इसका कनेक्शन

शरद पवार और नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

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प्रधानमंत्री मोदी और शरद पवार के बीच मिलनसारिता का राज क्या है? बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि यह यूपीए के दौर की बात है जब मोदी को केंद्रीय एजेंसियों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा था और कांग्रेस पार्टी में कुछ लोग चाहते थे कि मोदी से हिरासत में पूछताछ की जाए. 

बताया जाता है कि शरद पवार ने सरकार में इस तरह के किसी भी कदम का उच्चतम स्तर पर इस आधार पर विरोध किया था कि राजनीतिक लड़ाई एजेंसियों के बजाय चुनावी क्षेत्र में लड़ना बेहतर होगा. मोदी को सीबीआई की पूछताछ का सामना करना पड़ा लेकिन यूपीए उन्हें गिरफ्तार करने की हद तक नहीं गया. 

मोदी को एक के बाद एक अदालतों से राहत भी मिली. इसके अलावा, मोदी और पवार के बीच उस समय व्यक्तिगत तालमेल भी विकसित हुआ जब गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी पी. के. मिश्र के केंद्र में सचिव के पद पर पदोन्नत होने के बाद भी कोई केंद्रीय मंत्री उन्हें अपने मंत्रालय में लेने के लिए इच्छुक नहीं था. 

कहा जाता है कि उस समय मोदी ने मिश्र की मदद करने के लिए पवार को फोन किया था क्योंकि उनके पास कई विभाग थे. पवार ने 2006 में मिश्र को कृषि सचिव नियुक्त किया. मोदी समय-समय पर कई मुद्दों पर पवार से सलाह भी लेते थे. इसलिए राजनीतिक डील हो या न हो, दोनों में सही तालमेल और आपसी सम्मान बरकरार है.

27 साल बाद कार्रवाई

गुजरात दंगों के दौरान मोदी की खिलाफत करने की कीमत चुकाने वाले राजनेताओं, अधिकारियों और पत्रकारों की एक लंबी सूची है. इस श्रृंखला में नवीनतम नाम आर.बी. श्रीकुमार का है जो गुजरात पुलिस के एडीशनल डीजीपी थे और गोधरा में दंगे भड़कने पर एक यूनिट का नेतृत्व किया था. 

वे 2007 में सेवानिवृत्त हुए और सीबीआई उन्हें कभी भी गिरफ्तार कर सकती है. लेकिन इस कार्रवाई का गुजरात से कोई लेना-देना नहीं है. सीबीआई ने नवंबर 1994 में केरल में इसरो वैज्ञानिक नंबी नारायणन और अन्य को झूठे मामले में फंसाने के मामले की फिर से जांच शुरू की है.

 श्रीकुमार तब खुफिया ब्यूरो, केरल के डिप्टी डायरेक्टर थे. उनकी ‘टॉप सीक्रेट’ रिपोर्ट के आधार पर ही केरल पुलिस ने नंबी, मालदीव की दो महिलाओं और अन्य को कुख्यात ‘इसरो स्पाई रिंग’ में गिरफ्तार किया था. नंबी नारायणन इसरो के उभरते सितारे थे और महत्वपूर्ण क्रायोजेनिक तकनीक पर काम कर रहे थे. 

हालांकि सीबीआई ने नंबी को दिसंबर 1994 में ही क्लीन चिट दे दी और सभी को बरी करते हुए एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दुर्भावनापूर्ण और ‘काल्पनिक धारणाओं पर आधारित’ बताते हुए क्लोजर रिपोर्ट को सही ठहराया था. 

नंबी को केरल सरकार सहित विभिन्न एजेंसियों द्वारा 2018 में 1.9 करोड़ रु. का मुआवजा दिया गया था. लेकिन श्रीकुमार किसी भी दंड से बच गए. अब श्रीकुमार की संदिग्ध फर्जी आईबी रिपोर्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट की विशेष अनुमति के बाद सीबीआई द्वारा मामला फिर से खोला गया है, क्योंकि उस रिपोर्ट से भारी नुकसान हुआ था. 

सीबीआई ने श्रीकुमार के मामले को 27 साल बाद शायद फिर से नहीं खोला होता, अगर उन्होंने गोधरा मामले में अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारी होती. उन्होंने जाहिर तौर पर मोदी के अधीन कानून-व्यवस्था में लगे अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका के बारे में नानावती-मेहता आयोग और जेएम लिंगदोह समिति के समक्ष एक झूठा हलफनामा और बयान दर्ज कराया था. 

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे सभी दावों को झूठा पाया. अब इसरो मामले का भूत श्रीकुमार को सता रहा है क्योंकि सीबीआई कभी भी कार्रवाई कर सकती है.

वैष्णव की छिपी प्रतिभा

इस बारे में कई चर्चाएं हैं कि मोदी ने अश्विनी वैष्णव को इस हद तक क्यों पसंद किया कि उन्होंने बीजद प्रमुख और ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक को अश्विनी वैष्णव की खातिर एक राज्यसभा सीट के लिए फोन किया. बीजद राज्यसभा की तीनों सीटें जीत सकती थी, लेकिन 2019 में उसने भाजपा के लिए एक सीट छोड़ दी थी. 

मोदी का वैष्णव से क्या संबंध था? एक थ्योरी यह है कि वैष्णव ने मोदी को तब महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे जब वे 2003 में वाजपेयी के अधीन पीएमओ में उपसचिव के रूप में काम कर रहे थे. लेकिन अंदरूनी सूत्र इस बात से इनकार करते हैं क्योंकि वैष्णव की वाजपेयी तक किसी भी समय पहुंच नहीं थी. 

यहां तक कि जब वे पूर्व प्रधानमंत्रियों को दिए गए प्रोटोकॉल के अनुसार वाजपेयी के साथ उनके पीएस के रूप में जुड़े थे, तब भी वे पूर्व पीएम के करीबी नहीं थे. दो साल के भीतर वे मोरमुगाओ पोर्ट ट्रस्ट के उपाध्यक्ष के रूप में गोवा चले गए, 2008 में व्हार्टन के लिए अध्ययन अवकाश पर चले गए और अंत में 2010 में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में शामिल होने के लिए आईएएस छोड़ दिया. वे 2012 में एक उद्यमी के रूप में गुजरात पहुंचे और फिर से मोदी के संपर्क में आए. 

कहा जाता है कि मोदी वैष्णव जैसे होनहार युवाओं की टीम की तलाश में थे, जिनके पास विविधतापूर्ण अनुभव हैं. वैष्णव गुजराती धाराप्रवाह जानते थे, एक ऐसे उड़िया थे, जिसने आईएएस छोड़ने का जोखिम लिया था. मोदी को वैष्णव में प्रतिभा दिखी और उन्होंने 2014 में कई अन्य अत्यधिक कुशल व्यक्तियों की तरह मोदी के वॉर रूम में उनके बैकरूम ब्वॉय के रूप में काम किया. लेकिन वैष्णव में निश्चित रूप से कहीं अधिक छिपी हुई प्रतिभा थी, जिसके बल पर वे वर्तमान पद पर पहुंचे.

 

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