Glorifying the accused is not right | आरोपियों का महिमामंडन करना उचित नहीं

लेखक- विश्वनाथ सचदेव

यह सही है कि हर अभियुक्त अपराधी नहीं होता, लेकिन गलत यह भी नहीं है कि हर अपराधी पहले अभियुक्त ही होता है। एक लंबी प्रक्रिया है किसी आरोपी को अपराधी घोषित होने और सजा मिलने की। इसलिए, कभी-कभी यह सवाल उठ खड़ा होता है कि इस प्रक्रिया से गुजरने वालों के प्रति समाज का क्या रु ख होना चाहिए? इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर तो यह है कि जब तक कानून ऐसे आरोपियों को निरपराध घोषित नहीं कर देता, उन्हें महिमामंडित न किया जाए, उनके प्रति संवेदना जगाने की कोशिश न की जाए।

कानून के शासन का, और कानून के प्रति सम्मान प्रकट करने का यही मतलब होता है। लेकिन हमारे यहां क्या होता है? पिछले दिनों कम-से-कम दो ऐसी घटनाएं घटी हैं जो यह सोचने पर विवश करती हैं कि हम कानून के सम्मान का अर्थ भी समझते हैं अथवा नहीं। पहली घटना का रिश्ता केंद्रीय मंत्नी जयंत सिन्हा से है। सिन्हा के चुनाव-क्षेत्न में कुछ लोगों पर आरोप था कि उन्होंने गौ-मांस ले जाने के संदेह में अलीमुद्दीन अंसारी नामक व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डाला था। अदालत ने इस आरोप को सही पाया और हत्या के अपराधी पाए गए 11 व्यक्तियों को आजीवन कारावास की सजा दी। उच्चतम न्यायालय ने इनमें से आठ की अपील पर सुनवाई करते हुए उन्हें जमानत पर छोड़ने का आदेश दिया। इसका मतलब यह होता है कि अदालत उनके मामले में सुनवाई करेगी। जयंत सिन्हा ने मालाएं पहनाकर इन आठों का अभिनंदन करना क्यों जरूरी समझा, यह वही जानें, पर इससे जो संदेश गया वह किसी भी दृष्टि से कानून के सम्मान का नहीं था।

यह सही हो सकता है कि आरोपी जो हैं वे मंत्नी जयंत सिन्हा की पार्टी, भाजपा के समर्थक या सदस्य हों, लेकिन इससे देश के किसी मंत्नी को इस बात का आधार नहीं मिल जाता कि वह जमानत पर छूटे जघन्य अपराध के अपराधियों का सार्वजनिक अभिनंदन करे। इसे अपराध को शह देना न भी मानें तब भी यह काम अपराधी को महिमामंडित तो करता ही है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि अदालत ने उन आठों को दोष-मुक्त करार नहीं दिया था- वे सिर्फ जमानत पर छूटे हुए निचली अदालत द्वारा अपराधी घोषित किए गए व्यक्ति थे। उन्हें माला पहना कर केंद्रीय मंत्नी आखिर क्या संदेश देना चाहते थे? या फिर वे उनके कृत्य को, यानी किसी को पीट-पीट कर मार देने को, अपराध नहीं मानते। कानून के शासन की दृष्टि से ये दोनों बातें गलत हैं। सवाल किसी को अपराधी मानने या न मानने का नहीं है, सवाल किसी के अपराधी होने या न होने का है और यह तय करना अदालत का काम है, किसी मंत्नी का नहीं।

पर हमारे कई मंत्नी शायद इस बात में विश्वास नहीं करते कि उनका काम यह भी है कि वे समाज में कानून के शासन के प्रति आस्था और विश्वास का भाव जगाएं। एक और केंद्रीय मंत्नी, गिरिराज सिंह, ने इसी बात का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। जयंत सिन्हा के व्यवहार के औचित्य पर सवाल उठने के कुछ ही दिन बाद गिरिराज सिंह नवादा के दंगों के आरोपियों से मिलने जेल पहुंच गए। बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के इन कार्यकर्ताओं पर पिछले साल रामनवमी के दौरान हुए दंगों में हिंसा फैलाने का आरोप है। गिरिराज सिंह यह मानते हैं कि इन आरोपियों को फंसाया गया है और उन्होंने राज्य सरकार पर यह आरोप लगाया है कि वह सांप्रदायिक सौहाद्र्र के लिए हिंदुओं को दबाने की  मानसिकता रखती है। इस मामले में गिरिराज सिंह को अपनी राय रखने का अधिकार है और गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को इंसाफ दिलाने  की कोशिश भी वे कर सकते हैं। लेकिन ऐसी हिंसा के किसी भी मामले में इंसाफ तो अदालत ही कर सकती है। जेल में आरोपियों से मिलकर मंत्नी महोदय क्या संदेश देना चाहते हैं? और फिर आरोपियों के घर जाकर सांत्वना देने के नाम पर मंत्नी महोदय का आंसू बहाना क्या दर्शाता है? उन्हें सरकार में रहकर इस मामले में कुछ भी न कर पाने की विवशता पर दु:ख है। दु:ख उन्हें सांप्रदायिक दंगों के होने पर होना चाहिए, दंगों को न रोक पाने की अपनी विवशता पर होना चाहिए। किसी भी मंत्नी के आंसू निरपराध लोगों के दंगों के मरने पर बहने चाहिए।

बहरहाल, यह पहली बार नहीं है कि हमारे माननीय मंत्रियों ने इस तरह का अनुचित व्यवहार कर कानून के शासन के प्रति अपनी अवज्ञा प्रदर्शित की है। यह कहकर इन मामलों को रफा-दफा मान लिया जाता है कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है, इसे शासन अथवा दल की नीति का हिस्सा न माना जाए। पहली बात तो यह कि मंत्रियों के आचरण का सीधा असर आम नागरिक की सोच पर पड़ सकता है, इसलिए उन्हें वैयक्तिक अधिकार के नाम पर कानून और उसकी भावना के विरुद्ध विचार प्रकट करने या काम करने की छूट नहीं दी जा सकती। और दूसरी बात यह कि मंत्रियों के ऐसे आचरण पर संबंधित राजनीतिक दलों एवं सरकारों की चुप्पी यही संकेत देती है कि कहीं न कहीं उस आचरण को व्यवस्था का समर्थन प्राप्त है। ये दोनों ही बातें अनुचित हैं, इन दोनों की भर्त्सना होनी चाहिए।   

मंत्नी सरकार का हिस्सा होते हैं, उनका विवादास्पद आचरण यह संदेश देता है कि सरकार कानून की सामान्य प्रक्रिया के प्रति सम्मान दिखाना आवश्यक नहीं समझती। यह खतरनाक स्थिति है। इसकी चरम परिणति अराजकता ही हो सकती है। दूसरा संदेश जो हमारे मंत्रियों के ऐसे आचरण से मिलता है वह यह कि शायद वे ऐसा काम राजनीतिक लाभ उठाने के लिए करते हैं। भावनाओं के ज्वार उठाकर राजनीतिक लाभ की फसल काटने के ढेरों उदाहरण हम देखते हैं। जनतांत्रिक व्यवस्था का मेरु दंड विवेक होना चाहिए, भावनाएं नहीं। भावनाओं की यह राजनीति समाज के एक न एक वर्ग में असुरक्षा का भाव भरती है। कमजोर अपने आप को और कमजोर पाते हैं। स्वस्थ सांवैधानिक जनतंत्न धीरे-धीरे बीमार होता जाता है। इस स्थिति को किसी तर्क से स्वीकारा नहीं जाना चाहिए। 

जयंत सिन्हा और गिरिराज सिंह जैसे मंत्रियों को इस बात को समझना होगा कि वे किसी दल विशेष के सदस्य मात्न नहीं हैं, उन पर पूरे भारतीय समाज के संरक्षण का दायित्व है। मंत्नी जब ऐसे मामलों के आरोपियों को मालाएं पहनाते हैं या उनकी स्थिति पर आंसू बहाते हैं या फिर आरोपियों की गिरफ्तारी के विरोध में निकाले जुलूसों का हिस्सा बनते हैं, जैसा कि कठुआ बलात्कार-कांड में हुआ था, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले किस के प्रति उत्तरदायी हैं अपने राजनीतिक स्वार्थो के अथवा राष्ट्रीय हितों के? और इस सवाल का उत्तर हम सबको भी देना है कि मंत्रियों के ऐसे असंवैधानिक और असंवेदनशील व्यवहार पर हम कब तक चुप रहेंगे ? 


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