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गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: मजदूरों को अपना गांव छोड़ने के लिए फिर न होना पड़े बाध्य

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: May 25, 2020 09:16 IST

फैक्टरी के बंद होने से घर बैठे निरुपाय मजदूरों का जो रोजी-रोटी को मोहताज होकर शहरों को छोड़ सैकड़ों मील दूर अपने गांवों की ओर जा रहे हैं. वे  पैदल, साइकिल, रिक्शा, ट्रक, ट्रॉली  आदि से अपना रास्ता नाप रहे हैं.

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कोरोना महामारी के चलते पूरे देश में लॉकडाउन के बीच विभिन्न राज्यों द्वारा कुछ छूट मिलते ही मानवीय मजबूरियों के कई रूप उभरे जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को व्यथित कर सोचने को विवश कर सकते हैं. इनको प्रस्तुत करते जो दृश्य सामने आए वे भारतीय समाज की विषमताओं और नीतिगत संकट को  रेखांकित करते हैं. पहला दृश्य है महंगी अंग्रेजी शराब की दुकानों पर सुबह-सुबह लगी कई किलोमीटर लंबी लाइन का.

धक्कामुक्की करती संभ्रांत से दिखने वाले लोगों की भारी भीड़ के बीच बोतल के साथ दिग्विजयी मुद्रा में लौट रहे लोगों के चेहरों पर संतोष और उल्लास की आभा थी. दूसरा दृश्य है फैक्टरी के बंद होने से घर बैठे निरुपाय मजदूरों का जो रोजी-रोटी को मोहताज होकर शहरों को छोड़ सैकड़ों मील दूर अपने गांवों की ओर जा रहे हैं. वे  पैदल, साइकिल, रिक्शा, ट्रक, ट्रॉली  आदि से अपना रास्ता नाप रहे हैं.

इन  भूखे-प्यासे मजदूरों की टोली - जिसमें स्त्रियां भी हैं,  बच्चे  और बीमार भी  हैं - दिन-रात अनवरत चलती रहती है. उनकी यात्ना कितनी दारुण है इसका अंदाजा तब लगता है जब खबर आती है कि उनमें से कई रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं या फिर ट्रेन या बस की टक्कर से उनकी मौत हो जाती है. रोज ही ऐसी दुखद घटनाओं की खबर मिल रही है. तीसरा दृश्य बस और रेलवे स्टेशन पर हजारों की संख्या में मजदूरों के जुटने का है. फिर उन्हें पता चलता है कि उनके लिए यात्ना की कोई व्यवस्था नहीं है और उन्हें वापस अपनी चाल या झोपड़पट्टी के आशियाने में लौटना पड़ता है.  

इस महामारी के दौर में अमीर  और गरीब  तबकों  के बीच की खाई जिस विद्रूपता के साथ उभर कर सामने आ रही है वह आर्थिक विकास के तिलस्म को तोड़ रही है. इससे प्रगति, विकास और औद्योगिक आधुनिकता की सीमाओं का खुलासा हो रहा है. गांव और शहर का रिश्ता सुधारने की कोई कोशिश नहीं हुई. उल्टे गांव को उपेक्षित छोड़ शहर को ही विकास का पड़ाव बनाते हुए मानवीय गरिमा की रक्षा की जरूरी व्यवस्थाओं जैसे- स्वास्थ्य, शिक्षा, नागरिक सुविधाएं और मनोरंजन आदि को सिर्फ शहर-केंद्रित बनाया गया.

गांव न केवल  इन सुविधाओं से वंचित रहे बल्कि अपनी स्वाभाविक विशेषताओं को भी खोते गए जो उनको कभी आत्मनिर्भर बनाती थीं. ऊपर से शहर अपनी सारी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ गांव के मन पर भी हावी होता गया. जीवन में नकद रुपए की महिमा कुछ इस तरह बढ़ती गई कि सब उसके पीछे भाग लिए. पांसा पलटता गया और गांव की आत्म-निर्भरता इतिहास की वस्तु होती गई. वे बहुत सारे मामलों में शहरों पर निर्भर होते गए और शहर ही उनकी मंजिल होते गए. चूंकि गांव का जीवन कृषि के इर्द-गिर्द आयोजित होता है, जरूरी साधन और सुविधा की कमी दिनोंदिन बढ़ती गई.

इनके सामने शहर  की चकाचौंध थी जहां रुपए कमाने के बहुत सारे अवसर थे. इस आकर्षण में पढ़े-लिखे और अनपढ़ सभी युवा गांव के घर-बार को छोड़कर मन में सपने संजोए शहर की ओर चल पड़े. इसके बावजूद कि शहर की कामयाबी और शहर के निर्माण के लिए वे जरूरी थे, संरचना की दृष्टि से वे सिर्फ‘अतिरिक्त’ भार थे और इस कारण वे हाशिए पर ही बने रहने को अभिशप्त थे. परिणाम यह हुआ कि वे मलिन बस्ती बना कर रहने लगे. चूंकि उनको जो भी काम मिलता उसकी प्रकृति अस्थायी और दिहाड़ी की रही जो लॉकडाउन होने पर जाती रही. चूंकि उनकी कमाई सीमित थी, बेकारी के दौर में जल्दी ही खाने के भी लाले पड़ने लगे. इस अनिश्चय के दौर में गांव ही एक विकल्प दिखा और फिर उनके कदम उसी गांव की दिशा में बढ़ चले जिनको अच्छे भविष्य के लिए कभी छोड़ दिया था.  

लाखों की संख्या में आज ये मजदूर गांवों की शरण में आ रहे हैं. ये वे ही गांव हैं जिन्हें छोड़ कर मजदूर आगे बढ़ लिए थे. हमें गांवों को सशक्त बनाने की दिशा में सोचना होगा. प्रधानमंत्नी ने इस बीच भारत को ‘आत्मनिर्भर’ होने के लिए कहा है. आशा है आत्मनिर्भरता का दायरा व्यापक होगा और गांवों की भूमिका पर भी अवश्य विचार किया जाएगा. वे केवल शहरों की जरूरतों की आपूर्ति करने वाले मात्न नहीं हैं, उनके जीवन को एक इकाई के रूप में समृद्ध और सशक्त बनाने की जरूरत है. प्रवासी मजदूरों को उनके अपने देश काल में पुनर्वासित करना प्राथमिकता होनी चाहिए. 

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