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राजनीति की प्राथमिकता पर विचार की जरूरत, विश्वनाथ सचदेव का ब्लॉग

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: December 9, 2020 12:50 IST

मतदाता राजनेताओं और राजनीतिक दलों का असली चेहरा देख सके. जनता की सेवा के नाम पर राजनीति करने की बात तो सभी करते हैं, पर राजनेता नामक इस सेवक  को पहचानने के लिए शायद यही मौका सबसे उपयुक्त भी होता है.

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ठळक मुद्देराजनेताओं के वादों और दावों पर पैनी नजर रखना नागरिक का एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है.प्राथमिकताएं राजनेताओं की कथनी में नहीं, करनी में स्पष्ट होनी चाहिए.

चुनाव जनतांत्रिक व्यवस्था का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके दो कारण हैं- पहला तो यह कि यह मतदाता को, यानी देश के नागरिक को, अवसर देते हैं अपने हित-अहित को समझने के बारे में निर्णय लेने और अपना महत्व प्रतिपादित करने का.

दूसरा कारण है, यह इस बात का भी अवसर होता है जब मतदाता राजनेताओं और राजनीतिक दलों का असली चेहरा देख सके. जनता की सेवा के नाम पर राजनीति करने की बात तो सभी करते हैं, पर राजनेता नामक इस सेवक  को पहचानने के लिए शायद यही मौका सबसे उपयुक्त भी होता है.

हमारे नेता कैसे हैं, यह बात भी चुनाव प्रचार के दौरान उनके वादों और दावों से सहज ही सामने आ जाती है. जिस जनतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपने लिए स्वीकार किया है, उसके औचित्य और सफलता का एक पैमाना यह भी है कि नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति कितना जागरूक है. राजनेताओं के वादों और दावों पर पैनी नजर रखना नागरिक का एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है.

पुराने नियमों-कानूनों से नई सदी के भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता

हाल ही में हमारे प्रधानमंत्नी ने एक महत्वपूर्ण बात यह कही थी कि पुराने नियमों-कानूनों से नई सदी के भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता. गलत नहीं कहा है उन्होंने. लेकिन ‘नए’ की उनकी अवधारणा को समझाने के लिए यह जानना जरूरी है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं? यह प्राथमिकताएं राजनेताओं की कथनी में नहीं, करनी में स्पष्ट होनी चाहिए.

प्राथमिकता का सीधा-सा आधार जन-हित होता है. जनता के हित में क्या और कितना जरूरी है, सत्ता द्वारा यह जानना ही जरूरी नहीं है, जरूरी यह भी है कि सत्ता की चाबी जिसके पास है, वह उसका उपयोग कैसे करता है. आज भारत की जनता की जरूरत क्या है? यह विडंबना ही है कि स्वतंत्नता प्राप्ति के सत्तर-पचहत्तर साल बीत जाने के बाद भी इस सवाल का एक जवाब रोटी, कपड़ा और मकान है.

देश की एक तिहाई आबादी की भूख नहीं मिट पाती

अनाज बहुत है हमारे पास पर इसके बावजूद देश की एक तिहाई आबादी की भूख नहीं मिट पाती. कपड़ा और मकान का सीधा मतलब भी जीवन की बुनियादी जरूरतों का पूरा होना है. यहां भी हम यह देख रहे हैं कि अमीरी जरूर बढ़ रही है पर गरीबी घट नहीं रही. जावेद अख्तर की पंक्तियां हैं- ऊंची इमारतों से मकां मेरा घिर गया/ कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए. यह हकीकत अपने आप में बहुत कुछ कह देती है. देश में करोड़पतियों की संख्या भले ही बढ़ रही हो, रोजी और रोटी के लिए संघर्ष करने वालों की संख्या भी कम नहीं हो रही.

आर्थिक और सामाजिक विषमता की खाइयां लगातार बड़ी होती जा रही हैं. अस्पताल खुल रहे हैं पर इलाज महंगे होते जा रहे हैं. इक्कीसवीं सदी में भी अठारहवीं सदी की मानसिकता के दर्शन हमारे यहां हो जाते हैं. देश की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी बेरोजगारी की गिरफ्त में है. सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति में हमारी प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? इस सवाल के जवाब के लिए बहुत सोचने की आवश्यकता नहीं है, वह सब कुछ हमारी प्राथमिकता का हिस्सा बनना चाहिए जो रोजी-रोटी की समस्या के समाधान में योग दे सके.

नई सदी के लिए पुराने कानूनों को बदलने की बात आकर्षक लगती है

नई सदी के लिए पुराने कानूनों को बदलने की बात आकर्षक लगती है, पर जरूरत पुरानी सोच को बदलने की है. इस पुरानी सोच में वह सब शामिल है जो हमें समय की नई चुनौतियों के मुकाबले के लिए तैयार होने में बाधक बनता है. एक मुद्दा शहरों के नाम बदलने का है. सवाल उठता है शहरों का नाम बदलना कैसे इतना महत्वपूर्ण हो गया कि इसे चुनावी घोषणापत्नों में शामिल करना हमारे राजनीतिक दलों को जरूरी लगने लगा? हाल ही में हुए हैदराबाद महानगर पालिका के चुनावों में देश के गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्नी को यह कहना सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगा कि तेलंगाना में यदि उनकी सरकार बनी तो इस प्राचीन ऐतिहासिक शहर का नाम बदलकर भाग्यनगर कर दिया जाएगा!

इस भाग्यनगर ने भले ही हैदराबाद के चुनावों में भाजपा का भाग्य बदलने में कुछ मदद की हो, पर निश्चित रूप से शहरों के नाम बदलना देश की समस्याओं के समाधान का हिस्सा नहीं बन सकता, नहीं बनना चाहिए. आज इतिहास बदलने की नहीं, इतिहास बनाने की आवश्यकता है. काश, हमारे राजनीतिक दल और हमारे राजनेता इस बात को समझे कि तीन सौ साल पीछे जाकर आने वाले कल का इतिहास नहीं लिखा जा सकता. नया इतिहास नई सोच से रचा जाएगा और यह नई सोच सही प्राथमिकताओं के निर्धारण में झलकनी चाहिए.

हम अपनी राजनीति को जन-हित का माध्यम बनाएं

नई सदी के लिए नई सोच का तकाजा है  कि हम अपनी राजनीति को जन-हित का माध्यम बनाएं. जब हम एक सौ तीस करोड़ भारतीयों की बात करें तो हमारी सोच में हिंदू या मुसलमान या सिख या ईसाई नहीं होना चाहिए. हाल ही में बिहार की नई विधानसभा में एक विधायक ने हिंदुस्तान के नाम पर शपथ लेने से इंकार कर दिया था.

उसका कहना था संविधान में हमारे देश का नाम भारत है, हिंदुस्तान नहीं. सही कहा था उस विधायक ने. पर धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों ने इसे एक मुद्दा बनाने में देर नहीं की. अच्छी बात यह रही कि देश की जनता ने इस मुद्दे को ज्यादा तूल नहीं दिया. पर इस कांड से हमारे राजनीति करने वालों की सोच तो सामने आती ही है.

राजनेता और राजनीतिक दल अपने स्वार्थों को पूरा करने का लालच नहीं छोड़ेंगे. यह काम अब देश के प्रबुद्ध नागरिकों का है कि वे गलत प्राथमिकताओं और गलत सोच वाली राजनीति के खिलाफ आवाज उठाएं. जनतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक का जागरूक होना सर्वोपरि आवश्यकता है. यह हमें देखना है कि हम कितने जागरूक हैं-यही जागरूकता नया इतिहास रचेगी.

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