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एसआईआर को लेकर पश्चिम बंगाल बंगाल में बढ़ती राजनीतिक तकरार

By शशिधर खान | Updated: January 10, 2026 06:06 IST

कोर्ट में एसआईआर को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुनवाई और मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया मतदान शुरू होने के समय तक टलती रही.

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ठळक मुद्देमुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और सहयोगी कांग्रेस, वाम दलों के विरोध के बीच गत वर्ष एसआईआर कराया. चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर प. बंगाल में मतदाताओं का नाम हटाने का आरोप लगा रहे हैं. जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है, लगभग सीधे टकराव की नौबत आती जा रही है.

चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस सरकार और चुनाव आयोग के बीच तकरार बढ़ती जा रही है. जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है, लगभग सीधे टकराव की नौबत आती जा रही है. इसमें भाजपा भी निशाने पर है, क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) समेत उनकी पार्टी के सभी नेता चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर प. बंगाल में मतदाताओं का नाम हटाने का आरोप लगा रहे हैं. बिहार में भी चुनाव आयोग ने वहां की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और सहयोगी कांग्रेस, वाम दलों के विरोध के बीच गत वर्ष एसआईआर कराया. कोर्ट में एसआईआर को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुनवाई और मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया मतदान शुरू होने के समय तक टलती रही.

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) और भाजपा गठजोड़ को भारी ऐतिहासिक जीत मिलने के बाद राजद-कांग्रेस का चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप वहीं सीमित रह गया.  अभी वही स्थिति प. बंगाल और केरल में पैदा हो गई है. इस वर्ष अप्रैल-मई में पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, जिनमें इन दोनों विधानसभाओं के अलावा असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी भी हैं.

लेकिन एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग और भाजपा से तनातनी में पहले नंबर पर प. बंगाल है. दूसरे नंबर पर केरल है.  इन दोनों राज्यों में भी एसआईआर बिहार की तरह जून, 2025 में शुरू होने के समय से ही विवादित है. पश्चिम बंगाल में नए साल की शुरुआत में राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच नई खींचातानी मतदाताओं की मसौदा सूची में से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के कारण बढ़ी है.

इसमें मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के काम में लगे कर्मचारियों और अधिकारियों को सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. खासकर बीएलओ (बूथ स्तरीय अधिकारी) दोहरी मार झेल रहे हैं. प. बंगाल में यह राजनीतिक विवाद अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है कि आए दिन राज्य सरकार, तृणमूल कांग्रेस नेता और चुनाव आयोग एक-दूसरे को चुनौती देनेवाला बयान जारी कर रहे हैं.

प. बंगाल में विवाद ज्यादा तूल पकड़ने का असली कारण दो है. पहला, 16 दिसंबर को प्रकाशित एसआईआर मसौदा सूची से कटे 58 लाख नामों में से सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर विधानसभा सीट प्रभावित हुई. दूसरा, काटे गए नाम में से पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या ज्यादा है, जो दीदी की पार्टी को अन्य की अपेक्षा ज्यादा पसंद करती हैं.

तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि मुसलमान महिला वोटरों को चुनाव आयोग ने बांग्लादेशी घुसपैठिया करार दिया. ऐसी एक महिला सुनाली खातून को केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार गर्भवती की हालत में परिवार के छह सदस्यों समेत बांग्लादेश भेज दिया गया. वह 5 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वापस कोलकाता लौटी और बच्चे को जन्म दिया. उसके पति और तीन अन्य परिजन बांग्लादेश में ही हैं.

टॅग्स :चुनाव आयोगपश्चिम बंगालWest Bengal Assemblyममता बनर्जीअमित शाह
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