Coordination between Jainism and Science | Blog: जैन धर्म और विज्ञान के बीच समन्वय
Blog: जैन धर्म और विज्ञान के बीच समन्वय

(लेखक-डॉ. महेन्द्रकुमार बैद)

जैन विज्ञान सृष्टि के अनादि-अनंत काल के होने का विज्ञान है.

 जैन गणित न निरपेक्ष  शून्य से प्रारंभ होती है और न निरपेक्ष 

उत्कृष्ट अनंत में समाप्त होती है, इसलिए समस्त सृष्टि के द्रव्य आपेक्षिक हैं.

 जैन नीति अहिंसा से अनुप्राणित है, जो प्रथम र्तीथकर ऋषभदेव से प्रभावित है.

जैन संस्कृति समता, सहिष्णुता और मैत्री भाव की प्रतीक है. असंग्रह, संयम और परस्पर सहयोग की भावना इसमें प्रचलित है.

 कला, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य कला, शिलालेखों, लिपि, गणित एवं लोक कल्याणकारी प्रवृत्तियों के निर्माण में योगदान दिया है.

 जैन विद्या वर्तमान में भगवान महावीर की वाणी है जो जैन आगमों में सुरक्षित है.

 भगवान महावीर ने इंद्रिय-वासना, क्रोध और अहम् को जीता अत: वे जिन कहलाए. ‘जिन’ के अनुयायी जैन कहलाए.

प्राय: सभी धर्मो ने यह सार्थक प्रयत्न किया है कि उनके सिद्धांतों के पालन से व्यक्ति को सुख और शांति मिले, जिसकी सबको आवश्यकता है. जैन धर्म भी उनमें से एक है. जैन धर्म की विशेषता है कि उसने धर्म, दर्शन के साथ विज्ञान को भी महत्वपूर्ण माना; बाह्य जगत को जानना उतना ही आवश्यक माना जितना कि अंतर जगत को. पदार्थ के संबंध में जैन साहित्य में पुद्गल द्रव्य के अंतर्गत विस्तार से विचार हुआ है. जैन साहित्य में जैन धर्म और विज्ञान की अधिक पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं. जैन दृष्टि से सृष्टि का काल अनादि और अनंत है. वैज्ञानिक हॉकिंग भी काल के संबंध में सृष्टि की यही स्थिति स्वीकार करते हैं. बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भौतिक विज्ञान की शोध दिशाओं में स्पष्ट स्थानांतरण दृष्टि गोचर हो रहा है.

जीवन और जगत के अस्तित्व संबंधी जो गूढ़ रहस्य रहे हैं, उनके लिए दार्शनिक क्षेत्र के प्रश्न ‘क्यों’ से प्रारंभ होते हैं. लेकिन विज्ञान के क्षेत्र में यही प्रश्न ‘क्या’ से प्रारंभ होते हैं, जैसे जगत के पदार्थो के क्या गुण हैं, क्या समानता-असमानता है, विश्व रचना के सार्वभौम सिद्धांत क्या हैं. विज्ञान और दर्शन की निकटता के कारण अब विज्ञान भी ‘क्यों’ से प्रश्न प्रारंभ करने लगा है. आज नेतृत्व विज्ञान के हाथ में  है. दार्शनिक विट्जेन्स्टीन का कहना है कि ‘दार्शनिकों के पास अब केवल विज्ञान को ही समझने का कार्य रह गया है.’ विज्ञान नित नए तथ्यों को उद्घाटित करता आ रहा है जो प्रयोग सिद्ध हैं. जैन साहित्य में भी अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का वर्णन हुआ है. आज जैन सिद्धांतों और अवधारणाओं का आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में चिंतन का सही अवसर है. वे सूक्ष्म सत्य जो केवल श्रद्धा से स्वीकार किए जाते थे, उन्हें विज्ञान के नियमों द्वारा समझा जा सके. तमस्काय, लोकाकाश, सूक्ष्म पुद्गल, अनहारक अवस्था और पुनजर्न्म, कर्म का भौतिक स्वरूप ये सभी जैन विज्ञान के विषय हैं.

जैन धर्म आशावादी है, कर्मवादी भी है. आत्मा और कर्म के संयोग को स्वीकार करता है. इस संयोग में कर्म, आत्मा के गुणों को आवृत करता है. अत: कर्म हेय है, उनसे मुक्त होना आत्मा का पुरुषार्थ है. जैन दर्शन ने सूक्ष्म पुद्गल को- पदार्थ को भारहीन कहा है जैसे मन, वाणी, श्वास के पुद्गल सूक्ष्म हैं. गति की तीव्रता का विषय भी भारहीनता से संबंधित है. इन सूक्ष्म पदार्थ में अगुरुलघुत्व का गुण होता है. विज्ञान के क्षेत्र में अभी भारहीन पदार्थ का अध्ययन विकसित नहीं हुआ है. जैन साहित्य में सूक्ष्म कणों की गति को प्रकाश की गति से अधिक माना गया है क्योंकि भारहीन कण किन्हीं अन्य कणों से गति में बाधित नहीं होते. पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में वैज्ञानिकों ने दूरतम आकाश में विचरण करती नीहारिकाओं के पीछे ‘ब्लैक होल्स’ का पता लगाया है. विश्व संरचना को समझने के लिए यह खोज एक आवश्यक कड़ी का कार्य कर रही है. जैन आगम भगवती सूत्र में ‘तमस्काय’ का वर्णन हुआ है. ‘तमस्काय’ के वर्णन को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो जैन आगम में ब्लैक होल्स के बारे में पढ़ रहे हों.

जैन आगमों में इस सृष्टि के आठ मध्य बिंदु कहे गए हैं. आठ मध्य बिंदुओं का होना अपने आप में आश्चर्य है. इसका अभिप्राय यह है कि वह एक घन है जिसके आठ बिंदु हैं. घन है तो वह त्रि आयामी है. जैन आगमों में लिखा है कि इन मध्य बिंदुओं से मृदंगाकार छह दिशाओं का स्वरूप प्रकट होता है. यह वर्णन संकेत देता है कि जैन ‘ज्योमेट्री’ भी अपनी विकसित अवस्था में थी जिसे हम रेखागणित कहते हैं. 

इस प्रकार जैन आगमों में विज्ञान जगत से जुड़े अनेक विषय हैं जिसके अध्ययन की आवश्यकता है. विज्ञान का अपना दर्शन है, चिंतन है जो प्रयोगों से पुष्ट है. जैन विज्ञान और भौतिक विज्ञान की साम्यता यह है कि दोनों की तकनीक, तर्कशक्ति और कार्य करने की विधा समान है. जैन विद्या का महत्वपूर्ण सत्य है कि प्रत्येक पदार्थ का ज्ञान अनेक दृष्टियों से करना चाहिए जो कि जैन जगत में अनेकांत/स्यादवाद सिद्धांत के रूप में जाना जाता है. आइंस्टीन का सापेक्षवाद का सिद्धांत जैनों के अनेकांत दर्शन के समान प्रतीत होता है. स्यादवाद के अनुसार वस्तु के सभी गुण एक साथ नहीं कहे जा सकते लेकिन एक गुण के कथन के समय अन्य गुणों की संभावना बनी रहती है. विज्ञान के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने अपने मस्तिष्क की उपज व प्रयोग से इस जगत को जानने में अनेक सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं. उसके फलस्वरूप तकनीक के स्तर पर विज्ञान ने अनेक यंत्रों का निर्माण किया है. सिद्धांत और तकनीक ये दो धाराएं जगत में प्रमुख रही हैं और इसने समाज को सुख प्रदान किया है.

अंत में यह बताना चाहता हूं कि जैन ही एक ऐसा धर्म है जिसने पृथ्वी, पानी, अग्नि, हवा और वनस्पति में मनुष्य की भांति संवेदना को माना है. आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन धर्म के सिद्धांत भी वैज्ञानिक दृष्टि से प्रेषित हों. धर्म, समाज और विज्ञान इन तीनों के समन्वय से एक नई संस्कृति का उदय होने की आवश्यकता है. 


Web Title: Coordination between Jainism and Science
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