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छत्तीसगढ़ नक्सली समर्पणः सरकार चाहे तो कुछ भी असंभव नहीं!

By विकास मिश्रा | Updated: March 31, 2026 05:10 IST

Chhattisgarh Naxalite surrender: यह व्यूह रचना ऐसी थी कि सरकारें खुद को असहाय महसूस करने लगी थीं. इच्छाशक्ति के अभाव ने समस्या को और गंभीर बना दिया.

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ठळक मुद्दे Chhattisgarh Naxalite surrender: बस संघर्ष का रास्ता बदल रहे हैं. Chhattisgarh Naxalite surrender: साबित हो गया है कि यदि सरकार चाहे तो कुछ भी असंभव नहीं है. Chhattisgarh Naxalite surrender: सरकार को इस तरह घेर लिया गया कि वह सख्त कार्रवाई करने के पहले कई बार सोचे.

Chhattisgarh Naxalite surrender: छत्तीसगढ़ में समर्पण करने वाले खूंखार नक्सली नेता गुप्पिदी उर्फ विकास से एक पत्रकार ने पूछा कि अंतिम लक्ष्य क्या था? उसने काफी सारी बातें कीं लेकिन उस बीच में उसने यह भी कहा कि लाल किले पर लाल झंडा फहरा कर सरकार बनाना भी नक्सलवादियों का लक्ष्य था. समर्पण करने वाले नक्सलियों के और भी साक्षात्कार आप देखें तो यह स्पष्ट है कि कोई रास्ता नहीं बचा तो आत्मसमर्पण कर रहे हैं. उनका हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है! वे अब भी अपने नजरिये की ही बात कर रहे हैं. वे कह रहे हैं कि बस संघर्ष का रास्ता बदल रहे हैं.

जो भी हो, यह फिर साबित हो गया है कि यदि सरकार चाहे तो कुछ भी असंभव नहीं है. कोई तीन साल पहले देश के गृह मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ की चुनावी सभा में जब यह कहा कि उनकी सरकार को मौका मिला तो वे छत्तीसगढ़ से नक्सल समस्या खत्म कर देंगे तो स्वाभाविक तौर पर लोगों ने यही समझा कि ये चुनावी घोषणा है.

मगर अमित शाह ने राज्य सरकार के सहयोग से आज वह कर दिखाया. स्वाभाविक रूप से छुटपुट नक्सली कहीं जंगलों में बचे होंगे लेकिन जंगल का करीब-करीब पूरा हिस्सा नक्सलियों से मुक्त हो चुका है, इसमें अब कोई संदेह नहीं है. पापा राव वो अंतिम बड़ा नक्सली था जिसने हथियार डाल दिए हैं.

केवल तीन साल पहले छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, झारखंड और ओडिशा में छह हजार से ज्यादा सशस्त्र नक्सली सक्रिय थे. उनमें से ज्यादातर या तो मारे गए या फिर सशस्त्र बलों के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हुए. निश्चय ही जंगलों में अब शांति लौटेगी. मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि नक्सलवाद इस कदर फैला कैसे?

क्या राज्य सरकारों या केंद्र की सरकार को नक्सलियों का फैलाव समझ में नहीं आ रहा था. क्या उनका मकसद किसी को समझ में नहीं आ रहा था? नक्सलियों ने 7 राज्यों में 1200 किलोमीटर रेड कॉरिडोर को फैला लिया और सरकारें देखती रहीं? कहते हैं कि करीब 94 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में नक्सलियों का जंगल राज था. उनकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं खड़कता था.

भारतीय संविधान का नहीं बल्कि नक्सलियों का कानून वहां चलता था. हमारे सशस्त्र बल के हजारों जवानों को नक्सलियों ने मार डाला. फिर भी सरकारें उस स्तर पर कार्रवाई करने से हिचकती रहीं, जिस स्तर पर सख्ती होनी चाहिए थी. मानवाधिकार के नाम पर ऐसा वर्ग खड़ा हो गया जो हर पुलिस कार्रवाई पर तो सवाल खड़ा करता रहा कि जुल्म हो रहा है,

लेकिन नक्सली किसी जवान की हत्या कर दें तो कोई भी मानवाधिकार की बात करता ही नहीं था! दरअसल नक्सलियों ने बड़ी चतुराई के साथ व्यूह रचना की थी. उन्होंने खुद को जंगल के भीतर आदिवासियों के संरक्षक के रूप में स्थापित किया. आदिवासियों को भ्रमित करके या फिर डरा-धमका कर खुद के साथ कर लिया तो दूसरी ओर शहरों में एक ऐसी कौम खड़ी की जो इन नक्सलियों को जल, जंगल और जमीन का रखवाला बताती रही. सरकार को इस तरह घेर लिया गया कि वह सख्त कार्रवाई करने के पहले कई बार सोचे.

यह व्यूह रचना ऐसी थी कि सरकारें खुद को असहाय महसूस करने लगी थीं. इच्छाशक्ति के अभाव ने समस्या को और गंभीर बना दिया. हालात ऐसे हो गए थे कि नक्सलियों के इलाके में शाम ढलने के बाद पुलिस फोर्स के जवान कैंप से बाहर निकलने के पहले न जाने कितनी बार सोचते थे. उनके हाथ बंधे हुए थे. वे गोली चलाएं तो मानवाधिकार वाले दिल्ली तक कोहराम मचा दें!

मगर अमित शाह ने जब कहा कि नक्सलवाद खत्म करेंगे तो उन्होंने राज्य सरकार के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि हमारी फोर्स खुल कर काम करेगी. जो हथियार डालना चाहे, उसका स्वागत है लेकिन जो लड़ना चाहे, उसके लिए मौत तय है. जरूरत थी सरकार की ओर से एक बड़ी कार्रवाई की ताकि नक्सलियों में खौफ पैदा हो सके.

21 मई को वह दिन भी आया जब रेड कॉरिडोर की राजधानी कहे जाने वाले अबूझमाड़ में घुसकर सुरक्षाबलों ने  नक्सलियों के सेंट्रल कमेटी मेंबर बसवराजू को मार गिराया. 10 अन्य सेंट्रल कमेटी मेंबर भी मौत के घाट उतारे गए. चुन-चुन कर उन सभी को मारा गया जिन्होंने रेड कॉरिडोर पर छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा,  आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में कमान संभाल रखी थी.

अब रेड कॉरिडोर पर सुरक्षा बलों के 400 से ज्यादा कैंप हैं. नक्सलियों की कमर तोड़ने के लिए और भी कई तरह के उपाय किए गए. सबसे पहला था आर्थिक प्रहार. शासन और प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया कि धन के सारे स्रोतों को रोक दिया जाए. जो लोग डर से पैसा देते थे, उनकी भी नकेल कसी गई. एक बार जब धन की कमी हुई तो स्वाभाविक रूप से अस्त्र-शस्त्र की भी समस्या होने लगी.

समर्पण करने  वाले नक्सलियों ने स्वीकार भी किया है कि उनके पास गोलियों का खासतौर पर अभाव होने लगा था. इस तरह नक्सलियों का रेड कॉरिडोर खत्म हुआ. जंगलों से नक्सलवाद के खात्मे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मैं बातचीत कर रहा था. उस अधिकारी ने कहा कि हमने जंगलों से उनका सफाया किया है लेकिन अभी शहरी नक्सली बचे हुए हैं.

मेरा सवाल था कि ये शहरी नक्सली कौन हैं और उनकी पहचान क्या है? पुलिस अधिकारी ने कहा कि समानांतर रूप से शहरी नक्सलियों पर भी नजर रखी जा रही है. पुलिस प्रशासन को सब पता है कि कौन क्या कर रहा है. सरकार अच्छी तरह जानती है कि जब तक शहरी नक्सलियों की नकेल नहीं कसी जाएगी तब तक नक्सलवाद का वजूद खत्म करना संभव नहीं है. इसलिए अब इंतजार कीजिए शहरी नक्सलियों के खात्मे का!

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