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ब्लॉग: गिरफ्तारी के बाद गेंद भाजपा के पाले में

By अभय कुमार दुबे | Updated: March 27, 2024 09:59 IST

अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को पहले से ही पूरा अंदाजा था कि उन्हें पीएमएलए के तहत जेल जाना पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने इसका मुकाबला करने के लिए पूरी योजना बना रखी थी।

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ठळक मुद्देअरविंद केजरीवाल को पूरा अंदाजा था कि उन्हें पीएमएलए के तहत जेल जाना पड़ सकता हैकेजरीवाल और उनके साथियों ने इसका मुकाबला करने के लिए पूरी योजना पहले से बना रखी थीकेजरीवाल जेल से दिल्ली सरकार चला रहे हैं और कानूनी रूप से उन्हें इससे रोका भी नहीं जा सकता

अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को पहले से ही पूरा अंदाजा था कि उन्हें पीएमएलए के तहत जेल जाना पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने इसका मुकाबला करने के लिए पूरी योजना बना रखी थी। इस समय आम आदमी पार्टी जो भी गतिविधियां चला रही है, वह उसी योजना के मुताबिक है। मसलन, केजरीवाल का इरादा जेल से सरकार चलाने का है। कानूनी रूप से उन्हें इससे नहीं रोका जा सकता।

इसमें जो दिक्कतें हैं वे व्यावहारिक हैं जिनका थोड़ी-बहुत मुश्किलों से हल निकाला जा सकता है। अब यह भाजपा को तय करना है कि वे केजरीवाल को जेल से सरकार चलाने देंगे या नहीं, गेंद भाजपा के पाले में है। वह उपराज्यपाल का इस्तेमाल करके दिल्ली विधानसभा भंग कर सकती है या विधानसभा को निलंबित किया जा सकता है।

उपराज्यपाल अपनी रपट में कह सकते हैं कि जेल से सरकार चलाने के कारण शासन-प्रशासन की संवैधानिक प्रक्रिया बाधित हो गई है। इन दोनों स्थितियों में दिल्ली पर भाजपा का राज्य हो जाएगा, लेकिन उसकी बागडोर नौकरशाहों के हाथों में रहेगी। 2015 के चुनाव से पहले भी यही स्थिति थी और इसके कारण भाजपा के खिलाफ खासी एंटी-इनकंबेंसी जमा हो गई थी जिसका नतीजा चुनाव में भाजपा की केवल तीन सीटों में निकला था।

किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री की इससे पहले कभी गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसमें जिस कानून का इस्तेमाल किया गया उसे पीएमएलए या प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट कहा जाता है। यह कानून बनाया तो कांग्रेस सरकार ने था ताकि काले धन का इस्तेमाल रोका जा सके और आतंकवादी गतिविधियों में उसके प्रयोग की रोकथाम हो सके।

इस कानून में एक अनुच्छेद 45 था जिसके तहत आरोपी पर जिम्मेदारी बनती थी कि वह स्वयं को निर्दोष साबित करे यानी इस कानून में गिरफ्तार व्यक्ति ‘दोषी साबित न हो जाए तब तक निर्दोष’ रहने के प्रचलित सिद्धांत के विपरीत ‘निर्दोष साबित होने तक  दोषी’ रहने के लिए मजबूर था।

जाहिर था कि ऐसे अभियुक्त को अदालतें जमानत पर रिहा नहीं कर सकती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा करके इस अनुच्छेद को संविधान विरोधी घोषित कर दिया था। मोदी सरकार ने इस पहलू को भांपा और एक विधायी तिकड़म के जरिये इसे संशोधित करके सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरोपित बंदिश से बाहर निकाल दिया।

उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि इसके जरिये सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय को जो अधिकार दिये हैं उनका राजनीतिक इस्तेमाल भी हो सकता है लेकिन धीरे-धीरे जो तस्वीर साफ हुई, उससे तय हो गया कि पीएमएलए के अनुच्छेद 45 के तहत प्राप्त शक्तियों के जरिये प्रवर्तन निदेशालय द्वारा विपक्षी नेताओं को जेल में डाला जा सकता है।

एक बार एफआईआर लिख जाने के बाद ईडी उन्हें गिरफ्तार कर सकती है, और उसके बाद इसी अनुच्छेद के प्रभाव के कारण अदालतें उन्हें जमानत देने से लगातार इंकार करती रह सकती हैं। ईडी द्वारा तरह-तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करके (जैसे तफ्तीश  के नाम पर बीच-बीच में सप्लीमेंटरी या पूरक चार्जशीट दाखिल करना) मुकदमे को ही शुरू नहीं किए जाने के कारण बहुत लंबे अरसे तक विपक्षी नेताओं को जेल में डाले रखा जा सकता है। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी से यह प्रक्रिया अपने चरम पर पहुंच गई है।

हम जानते हैं कि राजनीति में एक प्रभावी नेता के कदम जमने की परिघटना बड़ी मुश्किल से और कभी-कभी ही घटित होती है। मसलन पिछले दस-पंद्रह साल में केवल दो ऐसे नेता हैं जिनका उभार हुआ है। एक हैं नरेंद्र मोदी और दूसरे अरविंद केजरीवाल।

भाजपा जानती है कि अगर नेता को सार्वजनिक जीवन में सक्रियता से रोक दिया जाए तो उसके लिए रास्ता साफ हो सकता है। इसलिए अपनी योजना के मुताबिक वह जहां चाहे, वहां पीएमएलए का इस्तेमाल करके नेताओं को रास्ते से हटाने में लगी है। इससे उसे एक तीर से दो शिकार करने का मौका मिलता है। वह अपने खिलाफ खड़े नेताओं को भ्रष्ट करार दे पाती है, और उन्हें जेल में डाल कर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चलाने का दावा करते हुए अपनी पीठ स्वयं ठोंकती है।

केजरीवाल की गिरफ्तारी के तुरंत बाद किए गए एक त्वरित सर्वेक्षण को अगर एक संकेत माना जाए तो यह कदम भाजपा के लिए राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदेह भी साबित हो सकता है। सी वोटर-एबीपी सर्वेक्षण से पता चलता है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी से दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी को हमदर्दी के वोट मिल सकते हैं। विपक्ष की एकता और मजबूत हो सकती है।

भाजपा के वोटों में कमी आ सकती है. कहना न होगा कि यह सर्वे केवल एक शुरुआती इशारा ही है। लोकसभा चुनावों में दिल्ली में भाजपा काफी शक्तिशाली है। पंजाब में जरूर वह मुख्य चुनावी दौड़ से गैरहाजिर है। जो भी हो, केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद की आम आदमी पार्टी अगर पांव टिका कर अपने प्रभाव को बचा सकती है, भाजपा को टक्कर दे सकती है, मोदी की राह को कठिन बना सकती है तो यह भारतीय लोकतंत्र की जिजीविषा के लिए बहुत बड़ी बात होगी।

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