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अवधेश कुमार का ब्लॉग: उम्मीदवार बढ़ने से बढ़ती दिक्कतें

By अवधेश कुमार | Updated: December 2, 2018 21:55 IST

इस समय पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हम यही स्थिति देख रहे हैं। हर राज्य में उम्मीदवारांे की तादाद देखकर दिमाग चकरा जाता है।

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जब हम भारतीय चुनावों पर विचार करते हैं तो एक पहलू की ओर हमारा ध्यान भले न जाए लेकिन विदेशी विश्लेषकों के लिए यह कौतूहल का विषय रहता है। यह पहलू है, हर चुनाव में उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या। इस मायने में भारत अकेला देश होगा जहां हर चुनाव में भारी संख्या में ऐसे उम्मीदवार खड़े होते हैं जिनका जीतना या लड़ाई में रहना तो दूर, अपने अलावा शायद परिवार का वोट मिलने की भी संभावना नहीं रहती।

इस समय पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हम यही स्थिति देख रहे हैं। हर राज्य में उम्मीदवारांे की तादाद देखकर दिमाग चकरा जाता है। केवल राजस्थान में ही 200 विधानसभा क्षेत्नों के लिए कुल 3293 उम्मीदवार मैदान में हैं। इसके पूर्व 2013 में 2296 उम्मीदवार मैदान में थे। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य की 90 विधानसभा सीटों के लिए 1269 उम्मीदवार मैदान में हैं। 2013 में 986 उम्मीदवार थे। मध्य प्रदेश में 2883 उम्मीदवार हैं जिनमें 1094 स्वतंत्न उम्मीदवार हैं। 2013 में 2583 उम्मीदवार मैदान में थे।

इन उम्मीदवारों की हालत क्या होती है? 2013 के चुनाव में मध्य प्रदेश में 2080 लोगों की तो जमानत जब्त हो गई। छत्तीसगढ़ में 796 अपनी जमानत बचाने में सफल नहीं रहे तो राजस्थान में 1641। यह केवल विधानसभाओं की स्थिति नहीं है। लोकसभा चुनाव में भी यही हो रहा है। 2014 के आम चुनाव में 8251 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें से 7000 की जमानत जब्त हो गई। आजादी के बाद पहले आम चुनाव में केवल 1864 उम्मीदवार मैदान में थे। हालांकि दूसरे चुनाव में उम्मीदवारों की संख्या कम होकर 1591 रह गई। लेकिन उसके बाद उम्मीदवारों की संख्या बढ़ती गई। 1996 में तो रिकॉर्ड 13 हजार 952 उम्मीदवार मैदान में आ गए। इसमें 10 हजार 635 उम्मीदवार निर्दलीय थे जिनमें से केवल आठ जीत पाए। 

चुनाव दर चुनाव हम यही प्रवृत्ति देख रहे हैं। इसका परिणाम होता है कि जीतने वाले उम्मीदवारों में 50 प्रतिशत से ज्यादा मत पाने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक होती है। आप चुनाव भले न जीतें लेकिन अगर कुछ मुद्दे उठाए, प्रखरता से उसका प्रचार किया, जनता उससे प्रभावित हुई और मुख्य उम्मीदवारों को उस पर अपना मत प्रकट करने को मजबूर होना पड़ा तो आपकी उम्मीदवारी सार्थक हो जाती है। आपका चुनाव में योगदान माना जा सकता है। ऐसा प्राय: नहीं होता। ऐसे उम्मीदवार खड़े हों तो उनका स्वागत होगा, पर ये अपवाद ही होते हैं।  

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