ब्लॉग: उपचुनावों के संकेत और महंगाई की सांसत

By अभय कुमार दुबे | Published: November 10, 2021 11:21 AM2021-11-10T11:21:06+5:302021-11-10T11:24:35+5:30

चाहे किसी तरह का सर्वेक्षण क्यों न हो, हर जगह आंकड़े निकल कर आते हैं कि साठ से सत्तर फीसदी जनता महंगाई और बेरोजगारी से परेशान है. यह परेशानी कोई छोटी-मोटी दिक्कत न होकर बहुत बड़ी होने के साथ-साथ लंबे अरसे से चली आ रही है. भाजपा की सरकारें हों या विपक्षी दलों की सरकारें- किसी के पास इस परेशानी का हल नहीं है. 

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ब्लॉग: उपचुनावों के संकेत और महंगाई की सांसत

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Highlightsउपचुनावों के नतीजे आते ही केंद्र सरकार ने पेट्रो-डीजल सस्ता कर दिया.साठ से सत्तर फीसदी जनता महंगाई और बेरोजगारी से परेशान है.उपचुनावों के नतीजे संकेत कि जनता अपना आक्रोश सरकार विरोधी वोट के जरिये व्यक्त कर सकती है. 

एक टीवी चैनल पर बहस करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने बेहद साफगोई दिखाते हुए कहा है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाकर राजस्व-आमदनी बढ़ाना उनकी सरकार की ‘इन्फाम्र्ड च्वाइस’ है. 

अंग्रेजी के इस शब्द का मतलब होता है सोच-समझ कर और फायदे-नुकसान का आकलन करके किया गया चुनाव. लेकिन उपचुनावों के नतीजे आते ही केंद्र सरकार ने पेट्रोल पांच रुपए प्रति लीटर और डीजल 10 रुपए प्रति लीटर सस्ता कर दिया.

भाजपा प्रवक्ता द्वारा यह बेहिचक स्वीकार करना कि सरकार महंगाई बढ़ाने को एक आर्थिक रणनीति के तौर पर अपना रही है, अचरज में डालने वाला था. वे कह सकते थे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए सरकार के पास और कोई चारा नहीं है. 

वे यह भी कह सकते थे कि तेल के दाम बढ़ाने में केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारें भी शामिल हैं. वे राज्य सरकारें भी जो भाजपा की न होकर विपक्षी दलों की हैं. 

लेकिन इन तर्को का इस्तेमाल करने के बजाय साफ तौर जो तर्क-योजना उन्होंने इस्तेमाल की, वह इस प्रकार थी- लोकोपकारी काम करने के लिए सरकार को धन की आवश्यकता है. 

जीएसटी की वसूली घटने, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर कम मिलने और राज्यों को जीएसटी की भरपाई का भुगतान करने के बोझ के कारण सरकार आर्थिक दिक्कत में है. 

जनता इस बात को समझती है. वह विपक्ष द्वारा इस मुद्दे पर की जाने वाली राजनीति के फेर में नहीं आएगी. वह जानती है कि सरकार उसके हित में ही ये सभी कदम उठा रही है.

उपचुनावों के नतीजे आए तो हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और प. बंगाल में भाजपा को करारी हार नसीब हुई. वहां के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने माना कि कांग्रेस ने चुनाव-प्रचार में महंगाई को हथियार बनाकर उनकी पार्टी को हरा दिया. 

ऐसी बात नहीं कि उपचुनावों में भाजपा सभी जगहों पर हारी ही हो. उसने असम, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में जीत दर्ज की. लेकिन उसके लिए ज्यादा चिंता की बात यह रही कि वह जहां जीती भी थी, वहां भी उसे पिछले बार के मुकाबले बड़े पैमाने पर वोट कम मिले. 

मसलन, तीन लोकसभा उपचुनावों (मंडी, खंडवा और दादरा नगर हवेली) में मंडी और दादरा नगर हवेली में तो वह हार ही गई, लेकिन खंडवा में जीतने के बावजूद उसके सात फीसदी वोट कम हो गए. कहना न होगा कि भाजपा के प्रवक्ता बिना पार्टी की नीतिगत स्वीकृति के यह बात नहीं कह सकते थे. लेकिन जिस फुर्ती से तेल के दाम कम किए गए, वह ताज्जुब में डालने वाली बात लगती है. 

क्या यह एक पैटर्न साबित होगा? यानी सरकार धीरे-धीरे तेल के दामों में कर रियायतों के जरिये और कमी करेगी, और इस प्रक्रिया में राज्य सरकारों को भी इसी तरह की रियायतें करने के लिए मजबूर कर देगी? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है.

असलियत यह है कि चाहे किसी तरह का सर्वेक्षण क्यों न हो, हर जगह आंकड़े निकल कर आते हैं कि साठ से सत्तर फीसदी जनता महंगाई और बेरोजगारी से परेशान है. यह परेशानी कोई छोटी-मोटी दिक्कत न होकर बहुत बड़ी होने के साथ-साथ लंबे अरसे से चली आ रही है. भाजपा की सरकारें हों या विपक्षी दलों की सरकारें- किसी के पास इस परेशानी का हल नहीं है. 

दरअसल, हर सरकार ने महंगाई बढ़ाने में अपने-अपने स्तर पर योगदान किया है. ‘एम्प्लायमेंट इलास्टिसिटी’ बढ़ाने की कोई युक्ति किसी सरकार के पास नहीं है. इसका मतलब है अर्थव्यवस्था में रोजगार देने की गुंजाइश और क्षमता. 

इसमें कांग्रेस सरकार के जमाने से ही गिरावट जारी है. इस समय तो यह नकारात्मक है. अर्थव्यवस्था में अगर निवेश बढ़ेगा तो नई आर्थिक गतिविधियां होंगी, उद्यमी उत्पादन की नई क्षमता खड़ी करेंगे. तब जाकर रोजगार बढ़ेंगे. लेकिन इसकी कोई संभावना ही नहीं दिख रही है.

आर्थिक स्थिति बहुत पेचीदा है. संगठित क्षेत्र नए निवेश को तरस रहा है. असंगठित क्षेत्र (जो रोजगार देने का मुख्य स्नेत है) का ग्राफ ऊपर उठने के लिए तैयार नहीं है. सरकार अर्थव्यवस्था के डिजिटलाइजेशन और औपचारिकीकरण के सपने देख रही है. 

वस्तुस्थिति यह है कि अनौपचारिक क्षेत्र का डिजिटलाइजेशन तकरीबन नामुमकिन है. इस क्षेत्र में गरीब रिक्शेवाले और रेहड़ीवाले से लेकर नियम-कानूनों के दायरे से बाहर चलने वाले बेहद छोटे-छोटे उद्योग शामिल हैं. ये लोग न जीएसटी देते हैं और न ही कोई और टैक्स. 

सरकार चाहती है कि डिजिटलाइजेशन के जरिये अनौपचारिक क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा टैक्स देता नजर आए. अनौपचारिक का औपचारिकीकरण करने की यह सरकारी जिद भी इस क्षेत्र का कबाड़ा कर रही है. गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी बढ़ने का यह भी एक बड़ा कारण है.

यह ठीक है कि इस समय देश में महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ कोई राजनीतिक गोलबंदी या आंदोलन नहीं है, लेकिन उपचुनावों के नतीजे संकेत कर रहे हैं कि जनता अपनी राय, क्षोभ और आक्रोश सरकार विरोधी वोट के जरिये व्यक्त कर सकती है. 

खास बात यह भी है कि उसका यह गुस्सा केंद्र सरकार के खिलाफ भी निकलने का संकेत यहां से मिल रहा है. यही बात सरकार को सांसत में डाल रही है.

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