अभय कुमार दुबे का ब्लॉगः यूपी में भाजपा को लेकर ब्राह्मणों की दुविधा

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Published: October 13, 2021 10:28 AM2021-10-13T10:28:51+5:302021-10-13T10:28:59+5:30

मंत्री महोदय न केवल जाति से ब्राह्मण हैं बल्कि लखीमपुर खीरी जैसे क्षेत्र में उनका ब्राह्मण होना याब्राह्मणों का नेता होना विशेष अर्थ रखता है। ध्यान रहे कि लखीमपुर खीरी को ‘मिनी पंजाब’ की संज्ञा दी जाती है।

Abhay Kumar Dubey's blog The dilemma of Brahmins regarding BJP in UP | अभय कुमार दुबे का ब्लॉगः यूपी में भाजपा को लेकर ब्राह्मणों की दुविधा

अभय कुमार दुबे का ब्लॉगः यूपी में भाजपा को लेकर ब्राह्मणों की दुविधा

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दिल्ली में काम करने वाले किसी भी पत्रकार से पूछिए, वह यही कहेगा कि भाजपा ने लखीमपुर खीरी कांड के जरिये अपना बहुत ज्यादा नुकसान कर लिया है। बात सही है। लेकिन, यह ‘बहुत ज्यादा क्या है और कितना है?’ यह एक कठिन सवाल है और इसका जवाब किसी भाजपा वाले के पास भी नहीं है। मीडिया मंचों पर तो पार्टी अपने केंद्रीय राज्यमंत्री और उनके बेटे का बचाव करने में लगी हुई है। लेकिन भीतर ही भीतर उसमें दो तरह की राय बन चुकी है। एक पक्ष की सोच है कि अगर फटाफट गिरफ्तारियां हो जातीं, तो सरकार को अपना चेहरा बचाने का बेहतर मौका मिल सकता था। ये वे लोग लगते हैं जो मुख्य तौर पर मुखयमंत्री योगी के समर्थक हैं। दूसरे पक्ष की सोच है कि अगर राज्यमंत्री और उनके बेटे के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की गई तो योगी सरकार के खिलाफ पहले से सुलग रही ब्राह्मण-विरोध की आग में घी पड़ जाएगा।

मंत्री महोदय न केवल जाति से ब्राह्मण हैं बल्कि लखीमपुर खीरी जैसे क्षेत्र में उनका ब्राह्मण होना याब्राह्मणों का नेता होना विशेष अर्थ रखता है। ध्यान रहे कि लखीमपुर खीरी को ‘मिनी पंजाब’ की संज्ञा दी जाती है। विभाजन के बाद यहां आकर बसे सिखों ने आदिवासी बाशिंदों से जमीनें खरीदी थीं और अपनी मेहनत से उन्हें नकदी फसल उगाने वाली लाभदायक खेतियों में बदल दिया था। सिखों की बढ़ती समृद्धि और राजनीतिक दावेदारियों का परिणाम यह निकला कि इलाके में पहले से अपना वर्चस्व रखने वालेब्राह्मणों के साथ उनकी अदावत बढ़ती चली गई। किसान आंदोलन में भी यहां के सिख किसानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। यही था वह पहलू जिसके कारण राज्यमंत्री महोदय ने पहले अशिष्ट भाषा में एक आक्रामक चुनौती फेंकी थी। इसके कारण ही आंदोलनकारी किसानों की तरफ से उन्हें काले झंडेदिखाए जाने का कार्यक्रम बनाया गया था।

भाजपा की चुनावी रणनीति की कमान संभालने वाले रणनीतिकारों ने आखिरी दम तक कोशिश की कि आशीष मिश्र उर्फ मोनू की गिरफ्तारी न होने पाए। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का दबाव है जो शायद सरकार को इस संकट से बच निकलने का अवसर दे सकता है। भाजपा दलील दे सकती है कि वह तो आशीष मिश्र को जेल नहीं भेजना चाहती थी लेकिन सर्वोच्च अदालत के दबाव में उसे ऐसा करना पड़ा। भाजपा की यह दुविधा ब्राह्मण वोटों को लेकर है। या इस बात को इस तरह से भी कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा और ब्राह्मण दोनों ही एक दुविधा के दौर से गुजर रहे हैं। भाजपा देख रही है कि किसान आंदोलन के कारण उसके जमे हुए वोटरों में से जाटों और गूजरों का बड़ा हिस्सा उससे फिरंट होने जा रहा है। दूसरी तरफ योगी ने जिस तरह से सरकार चलाई, उससे ब्राह्मण वोट भी नाराज हैं।

अगर ब्राह्मणों को यकीन हो गया कि योगी ही दोबारा मुख्यमंत्री बनने वाले हैं तो उनका एक बड़ा हिस्सा भाजपा को वोट देने पर फिर से विचार कर सकता है। वैसे उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण एक पार्टी के तौर पर भाजपा को पसंद करते हैं, लेकिन वे योगी को सत्ता में नहीं देखना चाहते। इस लिहाज से उनकी रणनीति यह होगी कि भाजपा सत्ता में भी बनी रहे और योगी को मुख्यमंत्री बनने का मौका न मिले। लेकिन, इन दोनों बातों को अंजाम तक पहुंचाना एक टेढ़ी खीर है। योगी को रोकने के चक्कर में भाजपा की सीटें कुछ ज्यादा भी कम हो सकती हैं। उधर भाजपा के रणनीतिकार न तो योगी को नाराज करने का जोखिम लेना चाहते हैं, और न ही ब्राह्मण वोटरों को। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि लखीमपुर खीरी कांड भाजपा की इसी दुविधा में फंसा हुआ है। शायद यह कांड पार्टी के राजनीतिक हितों के लिहाज से सबसे ज्यादा बुरे समय पर घटित हुआ है।

भाजपा विरोधियों को उम्मीद है कि मौजूदा परिस्थितियों में ‘मोदी डिविडेंड’ उत्तर प्रदेश में पहले की तरह नहीं चलेगा। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा की साठ से सौ के बीच सीटें कम हो सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो पश्चिम बंगाल में पार्टी की पराजय के बाद उत्तर प्रदेश में खराब प्रदर्शन से मोदी के लोकसभा संबंधी मौकों पर असर पड़ सकता है। आखिरकार अब पहले जैसी बात नहीं रह गई है। कोविड समेत विभिन्न कारणों से मोदी की लोकप्रियता में लगातार गिरावट आई है। भले ही यह गिरावट बहुत ज्यादा न हो, लेकिन इससे भाजपा के भीतर बेचैनी होना स्वाभाविक है। बंगाल में मोदी डिविडेंड नहीं चला, अगर उत्तर प्रदेश में भी नहीं चला तो गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता कि 2024 के लोकसभा चुनाव में चलेगा ही चलेगा। उत्तर प्रदेश में खराब प्रदर्शन भाजपा के अंत की शुरुआत साबित हो सकता है।

Web Title: Abhay Kumar Dubey's blog The dilemma of Brahmins regarding BJP in UP

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