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ब्लॉग: उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ भाजपा की मजबूरी तो नहीं बन गए?

By अभय कुमार दुबे | Updated: June 9, 2021 10:31 IST

उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव है. इस बीच भाजपा के अंदर से कई तरह की खबरें आ रही हैं. दो मई को पश्चिम बंगाल के चुनाव में जबरदस्त हार ने भाजपा के लिए थोड़ा संकट और बढ़ा दिया है.

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भाजपा 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है. वह एक रणनीतिक ऊहापोह में फंसी हुई है. भले ही उसके नेता न मानें, लेकिन वह घबराई हुई है. दो मई को पश्चिम बंगाल के चुनाव में जबरदस्त हार ने राजनीतिक संकटों का प्रबंधन करने की उसकी क्षमता का काफी क्षय कर दिया है. अगर वह उत्तर प्रदेश का चुनाव नहीं जीत पाई तो उसके राजनीतिक ग्राफ को गिरने से कोई नहीं रोक पाएगा. 

भाजपा की इस अनिश्चितता के केंद्र में योगी आदित्यनाथ की शख्सियत है. हमें पता है कि योगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कतारों से नहीं आते. वे हिंदुत्ववादी हैं, और कहीं ज्यादा आक्रामक किस्म की अल्पसंख्यक विरोधी भाषा बोलते रहे हैं. मौखिक हिंसा में उन्हें महारत हासिल रही है. 

साल 2017 में योगी को मुख्यमंत्री चुनते समय भाजपा को पता था कि उन्हें नियंत्रित करके थमाए गए रास्ते पर चलाना आसान नहीं होगा. फिर भी उसने चुनाव प्रचार में उन्हें स्टार-प्रचारक बनाया, योगी ने सबसे ज्यादा सभाएं कीं, और जीत हासिल करने के बाद भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य, मनोज सिन्हा और राजनाथ सिंह के ऊपर उन्हें प्राथमिकता दी. 

शायद भाजपा को लगा था कि उसने विभिन्न जातियों की जो हिंदू एकता बनाई है उसके प्रशासनिक चेहरे के रूप में वे एक लीक से हट कर की गई पसंद साबित हो सकते हैं, बशर्ते वे वाणी-संयम बरतें. योगी ने भाजपा आलाकमान की इतनी बात जरूर मानी. मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी आक्रामक बयानबाजी पहले के मुकाबले न के बराबर रह गई.

यह देखकर भाजपा ने उन्हें अपने अन्य मुख्यमंत्रियों की कतार से अलग करते हुए उनका राष्ट्रीय इस्तेमाल करने का फैसला किया. उन्हें असम और बंगाल से लेकर कर्नाटक तक हर विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक के तौर पर उतारा गया. इसके पीछे एक रणनीति थी. 

गोरखपीठ के मठाधीश होने के नाते योगी की प्रतिष्ठा सारे देश के नाथपंथियों में है. नाथपंथी कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के सभी कोनों में पाये जाते हैं. दूसरे, नाथपंथियों में कमजोर जातियों के लोग काफी संख्या में होते हैं. तीसरे, एक भगवा वस्त्रधारी और अपेक्षाकृत युवा संन्यासी जब मंच पर देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्य प्रशासक के तौर पर हिंदुत्ववादी भाषा बोलता है, तो भाजपा के जनाधार और उसकी तरफ आकृष्ट होने वाली जनता को एक सांप्रदायिक स्पर्श मिलता है. भाजपा को लगा कि एक योगी दूसरे कई चुनाव-प्रचारकों पर भारी बैठ सकता है.

भाजपा योगी के जरिये उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन को दिल्ली के प्रधानमंत्री दफ्तर में बैठ कर नियंत्रित करना चाहती थी. योगी ने उसे यह भी करने दिया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक से आए संगठन मंत्री के रूप में योगी का हाथ पकड़कर मनचाहे काम करवाते रहे. अफसरों की बैठकों में योगी और वे साथ-साथ बैठते. दिल्ली में पीएमओ और लखनऊ में सीएमओ—इन दोनों की जुगलबंदी होती रही. 

इससे सरकार पर अफसरशाही की जकड़ बढ़ती चली गई. प्रशासन का अनुभव योगी के पास था नहीं. वे तो भाषण देते थे, भाषण में उग्रता और धमकी होती थी. इस तरह कुल मिलाकर उनकी छवि एक बाहुबली मुख्यमंत्री की होती चली गई. कानून और व्यवस्था दुरुस्त करने के नाम पर फर्जी मुठभेड़ों को प्रोत्साहन दिया गया. 

प्रदेश के औद्योगीकरण को बढ़ावा देने लायक कल्पनाशीलता और कौशल उनके पास था ही नहीं. योगी सरकार एनकाउंटर करने, एफआईआर दर्ज करने, गिरफ्तार करने, जुर्माना वसूलने, मीडिया का दमन करने और किसी की परवाह न करने वाली सरकार के रूप में उभरी.

योगी के पक्ष में केवल एक बात जाती है. वे निजी स्तर पर भ्रष्ट नहीं हैं. ऐसा कोई इल्जाम उनके ऊपर नहीं है. इसके अलावा उनके खाते में ऐसी एक दर्जन उपलब्धियां भी नहीं हैं जिनके आधार पर भाजपा दोबारा सत्ता में आने का दावा कर सके. मुख्यमंत्री चुनिंदा अफसरों और सलाहकारों से घिरे रहे. धीरे-धीरे उन्होंने भाजपा के साठ प्रतिशत से ज्यादा विधायकों का समर्थन खो दिया. जब केंद्र द्वारा भेजे गए पूर्व कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने विधायकों से बातचीत की तो 64 फीसदी विधायकों ने कहा कि योगी के चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ा जाना चाहिए. लेकिन 36 फीसदी विधायकों ने कहा कि अगर योगी को हटाया गया तो भाजपा की पराजय निश्चित है. 

देखा जाए तो आलाकमान को 64 फीसदी की बात माननी चाहिए थी. लेकिन इस बातचीत से भाजपा आलाकमान को लग गया कि योगी को न तो उगला जा सकता है, न ही निगला.

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता जा रहा है, योगी अपना वह चेहरा भी दिखाने लगे हैं जो आलाकमान को अवज्ञाकारी भी लग सकता है. मसलन, प्रधानमंत्री के खासुलखास पूर्व नौकरशाह और मौजूदा एमएलसी को योगी ने मिलने का समय देने से भी इंकार कर दिया. उन्हें तीसरा उपमुख्यमंत्री बनाने के लिए तो वे राजी ही नहीं हैं. 

भाजपा ने मजबूरन यह तो तय कर ही लिया है कि योगी को फिलहाल नहीं हटाया जाएगा और पार्टी उनके मुख्यमंत्रित्व के नाम पर ही चुनाव लड़ेगी. परिस्थिति की विडंबना यह है कि जिन योगी को भाजपा अपनी ताकत बनाना चाहती थी, वे उसकी मजबूरी बनकर रह गए हैं.

टॅग्स :योगी आदित्यनाथभारतीय जनता पार्टीउत्तर प्रदेशआरएसएस
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