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क्या सचमुच समोसा-जलेबी ही हैं स्वास्थ्य के असली दुश्मन?, 2050 तक आंकड़ा बढ़कर 44.9 करोड़

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: July 25, 2025 05:17 IST

सभी मंत्रालयों और विभागों से अनुरोध किया गया कि वे कैफेटेरिया और सार्वजनिक गलियारों में ‘ऑयल और शुगर बोर्ड’ लगाएं, जिनमें समोसे, जलेबी, वड़ा पाव, कचौरी, यहां तक कि पिज्जा और बर्गर में भी छिपी हुई वसा और चीनी की मात्रा के बारे में बताया गया हो.

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ठळक मुद्देमंत्रालय ने सफाई दी कि उसका इरादा किसी खाद्य उत्पाद को निशाना बनाने का नहीं थामोटापे और गैरसंचारी बीमारियों के कारण यह दिशानिर्देश जारी किया गया.सांस्कृतिक विरासत पर नौकरशाही के दखल की बहस शुरू हो गई.

प्रभु चावला

जिस देश में कुरकुरे, समोसे और चाशनी में डूबी जलेबी मानसून की बारिश और क्रिकेट के जुनून की तरह हमारे जीवन का हिस्सा हों, वहां केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश की स्ट्रीट फूड संस्कृति पर जैसे ग्रेनेड से हमला किया है. स्वास्थ्य सजगता के नाम पर मंत्रालय के एक दिशानिर्देश ने, जिसमें हमारे पसंदीदा नाश्ते की परंपरा को खत्म कर देने की धमकी है, देश को गुस्से, व्यंग्य और प्रतिरोध से भर दिया है. पिछले महीने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने एक चिट्ठी के जरिये तूफान खड़ा कर दिया, जिसमें सभी मंत्रालयों और विभागों से अनुरोध किया गया कि वे कैफेटेरिया और सार्वजनिक गलियारों में ‘ऑयल और शुगर बोर्ड’ लगाएं, जिनमें समोसे, जलेबी, वड़ा पाव, कचौरी, यहां तक कि पिज्जा और बर्गर में भी छिपी हुई वसा और चीनी की मात्रा के बारे में बताया गया हो.

बाद में हालांकि मंत्रालय ने सफाई दी कि उसका इरादा किसी खाद्य उत्पाद को निशाना बनाने का नहीं था, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो चुका था. बताया गया कि देश में बढ़ रहे मोटापे और गैरसंचारी बीमारियों के कारण यह दिशानिर्देश जारी किया गया.

‘द लांसेट’ जैसी प्रतिष्ठित चिकित्सा विज्ञान पत्रिका का आकलन है कि 2050 तक भारत में ज्यादा वजन वाले लोगों का आंकड़ा बढ़कर 44.9 करोड़ हो जाएगा, पर अस्पष्ट तथा स्वास्थ्य के पश्चिमी नजरिये पर आधारित इस दिशानिर्देश का उल्टा असर हुआ और सांस्कृतिक विरासत पर नौकरशाही के दखल की बहस शुरू हो गई.

जब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड यानी औद्योगिक प्रक्रियाओं से गुजरे चिप्स, कोला और कुकीज जैसे स्वास्थ्य के असली दुश्मन हर सुपरमार्केट में मौजूद हैं, तब समोसे और जलेबी को निशाना बनाने की कोशिश क्यों? दिशानिर्देश में तेल और चीनी के अत्यधिक इस्तेमाल वाले और भी खाद्य पदार्थों का जिक्र है, जैसे- पकौड़े, गुलाब जामुन, केले के चिप्स आदि.

इन सबको इनके पश्चिमी समकक्षों की तरह खलनायक बताया गया है, लेकिन भारतीय खाद्य पदार्थों को सिर्फ कैलोरी के आईने में नहीं आंका जा सकता. दाल और घी में सेंकी गई बाटियों वाले मशहूर राजस्थानी व्यंजन दाल-बाटी चूरमा, लूची (पूड़ी)-आलूर दम (दम आलू), रसगुल्ले और संदेश जैसे बंगाली व्यंजन या मुगलई बिरयानी और कोरमा हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं.

ये भारत की पहचान के प्रतीक हैं और इनमें से हर व्यंजन में हमारे स्वास्थ्य की बेहतरी के गुण पाये जाते हैं- हल्दी और जीरा जैसे मसाले हमारी पाचन क्षमता बढ़ाते हैं, तो समूह भोज के आयोजन हमें मानसिक रूप से स्वस्थ और समृद्ध करते हैं. इन व्यंजनों पर चेतावनी जारी करना सदियों पुरानी ज्ञान परंपरा पर आघात और भारतीय भोजन की समृद्ध विरासत को मिटाने जैसा है.

एम्स, नागपुर से निर्देशित सरकारी दिशानिर्देश में कैलोरी को महत्व देने के पश्चिमी विमर्श की बू आती है, जबकि इसमें तले हुए और मसालेदार भारतीय व्यंजनों के महत्व की अनदेखी की गई है. एक विशेषज्ञ ने इंस्टाग्राम पर इस दिशानिर्देश की धज्जियां उड़ाते हुए ठीक ही लिखा, ‘अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स हमारे स्वास्थ्य के असल दुश्मन हैं...समोसा और जलेबी ने आपका क्या बिगाड़ा है?’

सांस्कृतिक विरासत और कॉरपोरेट कंपनियों के जंक फूड्स में फर्क न कर पाने की स्वास्थ्य मंत्रालय की विफलता बताती है कि विदेश में पढ़े-लिखे हमारे सरकारी बाबुओं को सामान्य भारतीयों के जीवन की जानकारी नहीं है.  स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देश ने सजगता पैदा करने की जगह भ्रम ही ज्यादा फैलाया है. चेतावनी बोर्ड लगाने के बजाय अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स पर अंकुश लगाना तथा लोगों को शांति से अपने पारंपरिक खाद्य पदार्थों का आनंद लेने देना अधिक जरूरी है.  

टॅग्स :Health and Family Welfare DepartmentGovernment of India
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