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जयंतीलाल भंडारी का ब्लॉग: वैश्विक मंदी के बीच भारत में रिकॉर्ड विदेशी निवेश, आखिर क्या है इसके पीछे की वजह

By डॉ जयंती लाल भण्डारी | Updated: June 10, 2022 10:26 IST

भारत में मजबूत राजनीतिक नेतृत्व है. यहां निवेश पर बेहतर रिटर्न है. एफडीआई बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान और मेक इन इंडिया को सफल बनाना होगा.

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वैश्विक मंदी की चुनौतियों के बीच भारत में रिकॉर्ड विदेशी निवेश का सुकूनदेह परिदृश्य उभरकर दिखाई दे रहा है. हाल ही में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 में  भारत ने 83.57 अरब डॉलर का रिकॉर्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्राप्त किया है. अब चालू वित्त वर्ष 2022-23 में भारत की ओर अधिक एफडीआई प्रवाह की नई संभावनाएं बढ़ी हैं. देश में एफडीआई की विभिन्न अनुकूलताओं के कारण अब विदेशी निवेशक ‘भारत क्यों?’ की जगह ‘भारत ही क्यों नहीं?’ कहने लगे हैं.

यदि हम इस बात पर विचार करें कि जब पिछले वित्त वर्ष 2021-22 में विश्व की अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट रही है, इसके बावजूद विदेशी निवेशकों के द्वारा भारत को एफडीआई के लिए प्राथमिकता क्यों दी गई है, तो हमारे सामने कई चमकीले तथ्य उभरकर सामने आते हैं. 

पिछले वित्त वर्ष 2021-22 में भारत की 8.7 फीसदी की सर्वाधिक विकास दर, देश में छलांगें लगाकर बढ़ रहे यूनिकॉर्न, 31.45 करोड़ टन का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन, बढ़ता विदेश व्यापार, नए प्रभावी व्यापार समझौते, 600 अरब डॉलर से अधिक के विदेशी मुद्रा भंडार आदि के कारण एफडीआई तेजी से बढ़े हैं. 

इनके अलावा भारत में मजबूत राजनीतिक नेतृत्व है. यहां निवेश पर बेहतर रिटर्न है. भारतीय बाजार बढ़ती डिमांड वाला बाजार है. निश्चित रूप से देश में एफडीआई बढ़ने का एक बड़ा कारण सरकार के द्वारा पिछले कुछ वर्षों में उद्योग-कारोबार को आसान बनाने के लिए किए गए कई ऐतिहासिक सुधार भी हैं. देश में प्रतिभाशाली नई पीढ़ी की कौशल दक्षता, आउटसोर्सिंग और देश में बढ़ते हुए मध्यम वर्ग की चमकीली क्रयशक्ति के कारण विदेशी निवेश भारत की ओर तेजी से बढ़ने लगा है.

स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि कोरोना महामारी से लेकर अब तक ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटिंग, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन एजुकेशन तथा वर्क फ्रॉम होम की प्रवृत्ति, इंटरनेट के बढ़ते हुए उपयोगकर्ता, देशभर में डिजिटल इंडिया के तहत सरकारी सेवाओं के डिजिटल होने से अमेरिकी टेक कंपनियों सहित दुनिया की कई कंपनियां भारत में स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि तथा रिटेल सेक्टर के ई-कॉमर्स बाजार की चमकीली संभावनाओं को मुट्ठियों में करने के लिए निवेश के साथ आगे बढ़ी हैं. 

इसमें भी कोई दो मत नहीं है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जीरो कोविड पॉलिसी नीति के कारण मार्च से लेकर मई 2022 तक चीन के कई शहरों में आंशिक अथवा पूर्ण लॉकडाउन के कारण चीन में विकास दर घट गई है. ऐसे में चीन में कार्यरत कई कंपनियां वहां से अपना कारोबार और निवेश समेट कर जिन विभिन्न देशों का रुख कर रही हैं, उनमें भारत भी पहली पंक्ति में है. 

यूक्रेन संकट की चुनौतियों के बीच जब दुनिया में बड़े-बड़े शेयर बाजार ढहते हुए दिखाई दे रहे हैं, तब भी 7 जून को बाम्बे स्टाक एक्सचेंज (बीएसई) सेंसेक्स 55 हजार से अधिक अंकों के प्रभावी स्तर पर दिखाई दिया है.

अब चालू वित्त वर्ष 2022-23 में और अधिक प्रभावी कारणों से एफडीआई बढ़ने की संभावनाएं बढ़ गई हैं. उल्लेखनीय है कि 23 मई को टोक्यो में प्रधानमंत्री मोदी ने जापानी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों एवं सीईओ के साथ गोलमेज बैठक में कहा कि वैश्विक एफडीआई में मंदी के बावजूद भारत रिकॉर्ड विदेशी निवेश प्राप्त कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत निवेश अनुकूल अवसरों, आर्थिक सुधारों, नवाचार और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है.

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि 24 मई को अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के रणनीतिक मंच क्वाड के दूसरे शिखर सम्मेलन में चारों देशों ने जिस समन्वित शक्ति का शंखनाद किया है और बुनियादी ढांचे पर 50 अरब डॉलर से अधिक रकम लगाने का वादा किया है, उससे क्वाड भारत के उद्योग-कारोबार के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता है. साथ ही इससे भारत की ओर एफडीआई का प्रवाह बढ़ेगा. 

अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुई द्विपक्षीय बैठकों के साथ-साथ अमेरिका की अगुवाई में बनाए गए 13 देशों के संगठन हिंद-प्रशांत आर्थिक फ्रेमवर्क, (आईपीईएफ) में भारत को भी शामिल किया गया है, जिससे भारत आईपीईएफ देशों के लिए विनिर्माण, आर्थिक गतिविधि, वैश्विक व्यापार और नए निवेश का महत्वपूर्ण देश बन सकता है.  

यदि हम चालू वित्त वर्ष 2022-23 में पिछले वित्त वर्ष के तहत प्राप्त किए गए 83.57 अरब डॉलर के एफडीआई से अधिक की नई ऊंचाई चाहते हैं तो जरूरी होगा कि वर्तमान एफडीआई नीति को और अधिक उदार बनाया जाए. जरूरी होगा कि देश में लागू किए गए आर्थिक सुधारों को तेजी से क्रियान्वयन की डगर पर आगे बढ़ाया जाए. जरूरी होगा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की विभिन्न बाधाओं को दूर करके इसका विस्तार किया जाए. एफडीआई बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान और मेक इन इंडिया को सफल बनाना होगा. 

बदली हुई वैश्विक व्यापार व कारोबार की पृष्ठभूमि में भारत के द्वारा यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ एफटीए को मूर्तरूप देने के बाद अब यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कनाडा, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और इजराइल के साथ तेज गति से एफटीए वार्ताओं को पूरा करके एफटीए को शीघ्रतापूर्वक लाभप्रद आकार दिया जाना होगा.

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