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खाद्य सब्सिडी बढ़ी, नहीं घटी किसानों की चिंता

By ऋषभ मिश्रा | Updated: December 20, 2025 05:39 IST

क्या बढ़ती खाद्य सब्सिडी वास्तव में किसानों के हितों को मजबूत कर रही है या यह लाभ अधिकतर उपभोक्ताओं तक ही सीमित है?

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ठळक मुद्देप्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना ने सब्सिडी के भार को और बढ़ाया.किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदना होता है.फूड सब्सिडी को बहुत बड़ा आर्थिक बोझ बना देती है.

कृषि से जुड़ी नीतियां और समर्थन प्रणालियां देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं. हाल के वर्षों में दो चीजें समान रूप से बढ़ी हैं. एक ओर किसानों में खेती के लाभ को लेकर चिंताएं गहरी होती जा रही हैं तो दूसरी ओर सरकार का खाद्य सब्सिडी पर खर्च रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है. इन दोनों स्थितियों का एक साथ उभरना स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा करता है कि क्या बढ़ती खाद्य सब्सिडी वास्तव में किसानों के हितों को मजबूत कर रही है या यह लाभ अधिकतर उपभोक्ताओं तक ही सीमित है?

देश में खाद्य सब्सिडी का अर्थ केवल सस्ता अनाज उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि यह देश की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में से एक है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत करोड़ों परिवारों को अत्यंत रियायती दरों पर अनाज दिया जाता है. इसके अलावा कोविड-19 जैसी आपात स्थितियों के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना ने सब्सिडी के भार को और बढ़ाया.

इन योजनाओं को चलाने के लिए सरकार को पहले किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदना होता है, फिर उसका भंडारण करना, ढ़ुलाई कराना और अंत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से जरूरतमंदों तक पहुंचाना होता है. इन सभी चरणों की बढ़ती लागत मिलकर फूड सब्सिडी को बहुत बड़ा आर्थिक बोझ बना देती है.

पिछले एक दशक में यह बोझ कई गुना बढ़ चुका है और सरकार के कुल बजट में इसका हिस्सा अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया है. दूसरी ओर किसानों की स्थिति वेतनभोगी तबके की तरह स्थिर नहीं होती. खेती प्राकृतिक जोखिमों पर निर्भर करती है और उत्पादन लागत लगातार बढ़ती जा रही है. खाद, डीजल, श्रम, कीटनाशक और कृषि संबंधी मशीनरी- सब कुछ महंगा होता जा रहा है.

ऐसे में किसानों को मिलने वाला मूल्य कई बार उनकी लागत तक भी नहीं पहुंच पाता. यूं तो न्यूनतम समर्थन मूल्य एक सुरक्षा कवच की तरह दिखता है, पर वास्तविकता यह है कि देश के लगभग 6-8 फीसदी किसान ही अपनी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच पाते हैं. अधिकांश किसानों की फसल खुले बाजार में बिकती है, जहां मांग और आपूर्ति के आधार पर कीमतें काफी बदलती रहती हैं.

यह अस्थिरता किसानों की चिंता और बढ़ा देती है. यदि सरकार उपभोक्ताओं के लिए इतनी बड़ी सब्सिडी वहन कर सकती है, तो किसानों की आय बढ़ाने, लागत कम करने और कृषि से जुड़े जोखिम घटाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.

कृषि को लाभकारी बनाए बिना केवल उपभोक्ता सब्सिडी बढ़ाते रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता. किसान देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ हैं और यदि वही आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे तो उत्पादन पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है.  

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