वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीति विश्लेषक हैं। वे प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया से जुड़े रहे हैं और उसके हिन्दी सेवा 'भाषा' के संस्थापक संपादक रहे हैं।Read More
यह कानून भाजपा के लिए कहीं भस्मासुरी सिद्ध न हो जाए. इस कानून का मूल उद्देश्य तो बहुत अच्छा है कि पड़ोसी मुस्लिम देशों के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाए लेकिन उसका आधार सिर्फ धार्मिक उत्पीड़न हो, यह बात भारत के मिजाज से मेल नहीं खाती. ...
इस शुरुआती दौर में ही सोने और तेल की कीमतों में उछाल आया है, वह भारत के लिए गहरी चिंता का विषय है. यदि स्थिति बदतर हुई तो खाड़ी देशों में फंसे भारतीयों को निकालने और बचाने में भारत सरकार के पसीने छूट जाएंगे. यह संतोष का विषय है कि भारतीय विदेश मंत्नी ...
सरकार को यह डर हो सकता है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरु द्ध नौजवान पहले ही हर विश्वविद्यालय में प्रदर्शन कर रहे हैं तो कहीं कश्मीर की लपटें इस आग को और नहीं भड़का दें. ...
जेएनयू की फीस-वृद्धि का मुद्दा भी जुड़ गया. पांच साल का अंदर दबा हुआ सही या गलत गुस्सा अब एकदम बाहर फूट रहा है. नौजवान इसकी अगुवाई कर रहे हैं. उनमें सभी तबके के लोग शामिल हैं. जेएनयू में हुई गुंडागर्दी ने देश के सभी नौजवानों पर उल्टा असर डाला है. ...
आप जानते हैं कि ये गैर-जरूरी चीजें कितने की आती हैं? कम से कम 4 लाख करोड़ रुपए की. ऐसी चीजें हम अमेरिका और अन्य देशों से भी मंगाते हैं. हमारे देश की पसीने की कमाई के खरबों रुपए विदेशों में बह जाते हैं. यदि इनका आयात बंद हो जाए तो यह बचा हुआ रुपया देश ...
भारत-पाक संबंधों में इतना तनाव पैदा हो गया कि मोदी ने नए साल की शुभकामनाएं सभी पड़ोसी नेताओं को दीं लेकिन इमरान को नहीं दीं. उधर इमरान ने करतारपुर साहिब में सिखों के अलावा किसी के भी जाने पर पाबंदी लगा दी. यह हमारे उस नए नागरिकता कानून का जवाब मालूम ...
यहां असली सवाल यह है कि किसी राज्य का इस तरह केंद्र सरकार और संसद के विरुद्ध जाना क्या उचित है, क्या संवैधानिक है, क्या संघात्मक शासन प्रणाली के अनुकूल है? इन तीनों प्रश्नों का जवाब नकारात्मक हो सकता है और अदालत भी वैसा कह सकती है लेकिन यदि मान लें क ...