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बाइडन ने अफगानिस्तान में 1,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती को मंजूरी दी

By भाषा | Updated: August 15, 2021 15:14 IST

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(ललित के झा)

वाशिंगटन, 15 अगस्त अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी और सहयोगी बलों की व्यवस्थित एवं सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने के लिए युद्धग्रस्त देश में 1,000 और सैनिकों को भेजा है।

अमेरिका ने यह मंजूरी ऐसे समय में दी है जब तालिबान अफगानिस्तान का नियंत्रण पूरी तरह से अपने हाथ में फिर से लेने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

अमेरिका के एक रक्षा अधिकारी ने बताया कि बाइडन ने शनिवार को अपने बयान में कुल 5,000 जवानों की तैनाती को मंजूरी दी, जिसमें वे 1,000 सैनिक भी शामिल हैं, जो पहले से अफगानिस्तान में मौजूद हैं। अमेरिकी 82वीं एयरबोर्न डिवीजन से 1,000 सैनिकों की एक बटालियन को कुवैत में उनकी मूल तैनाती के बजाय काबुल भेज दिया गया था।

रक्षा अधिकारी ने बताया कि पेंटागन ने पहले घोषणा की थी कि 3,000 अतिरिक्त सैनिकों को भेजा जा रहा है।

बाइडन और अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने राष्ट्रीय सुरक्षा दल के साथ शनिवार को वीडियो कांफ्रेंस की थी, जिसके बाद राष्ट्रपति ने और बलों की तैनाती की घोषणा की। इस वीडियो कांफ्रेंस में अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी नागरिकों की वापसी, एसआईवी (विशेष आव्रजक वीजा) आवेदकों को वहां से निकालने और बदल रही सुरक्षा स्थिति की निगरानी के लिए चल रहे प्रयासों पर चर्चा की गई।

बाइडन ने एक बयान में कहा, ‘‘हमारे राजनयिक, सैन्य और खुफिया दलों की सिफारिशों के आधार पर, मैंने लगभग 5,000 अमेरिकी सैनिकों की तैनाती को मंजूरी दी है ताकि हम अफगानिस्तान से अमेरिकी कर्मियों और अन्य संबद्ध कर्मियों की व्यवस्थित और सुरक्षित तरीके से वापसी सुनिश्चित कर सकें। साथ ही हम अपने अभियान के दौरान अपने बलों की मदद करने वाले अफगान नागरिकों और तालिबान के आगे बढ़ने के कारण जिन लोगों को विशेष रूप से खतरा है, उनकी व्यवस्थित एवं सुरक्षित निकासी सुनिश्चित कर सकें।’’

बाइडन के इस बयान के कुछ ही घंटों बाद तालिबान ने जलालाबाद पर कब्जा कर लिया। अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो बलों की संपूर्ण वापसी से पहले तालिबान देश पर हर ओर से कब्जा करता जा रहा है, राजधानी काबुल तेजी से अलग-थलग पड़ती जा रही है और रविवार सुबह चरमपंथी संगठन ने जलालाबाद पर कब्जा कर लिया जिसके कारण काबुल देश के पूर्वी हिस्से से कट गया है। काबुल के अलावा जलालाबाद ही ऐसा इकलौता प्रमुख शहर था जो तालिबान के कब्जे से बचा हुआ था। अब अफगानिस्तान की केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में देश की 34 प्रांतीय राजधानियों में से काबुल और छह अन्य प्रांतीय राजधानी ही बची हैं।

बाइडन ने जुलाई में औपचारिक घोषणा की थी कि अमेरिकी सैनिक 31 अगस्त तक अफगानिस्तान से वापस आ जाएंगे। वह बलों की वापसी संबंधी अपने फैसले पर दृढ़ हैं। उन्होंने इस सप्ताह की शुरुआत में संवाददाताओं से कहा कि उन्हें इस पर खेद नहीं है और अब समय आ गया है कि अफगानिस्तान के लोग ‘‘अपने लिए लड़ें’’।

राष्ट्रपति ने 11 सितंबर से पहले अफगानिस्तान से अपने सभी बलों की वापसी संबंधी अपनी योजनाओं में किसी भी बदलाव से इनकार किया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों की मौजूदगी का नेतृत्व करने वाला चौथा राष्ट्रपति हूं।’’ उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि उनके बाद पांचवें राष्ट्रपति को भी युद्ध की कमान संभालनी पड़े।

उन्होंने अफगानिस्तान से अमेरिकी बलों की वापसी की प्रक्रिया तेज करने के अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि वह ‘‘दूसरे देश के असैन्य संघर्ष के बीच अमेरिका की कभी समाप्त न होने वाली उपस्थिति’’ को उचित नहीं ठहरा सकते।

बाइडन ने कहा, ‘‘अफगानिस्तान में हमारे देश के 20 वर्षों के युद्ध में, अमेरिका ने अपने बेहतरीन युवा पुरुषों और महिलाओं को वहां भेजा है, लगभग एक हजार अरब डॉलर का निवेश किया है, 3,00,000 से अधिक अफगान सैनिकों और पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षित किया है, उन्हें अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों से लैस किया है और अमेरिकी इतिहास के सबसे लंबे युद्ध के तहत उनकी वायु सेना का रखरखाव किया है।’’

बाइडन ने अपने बयान में कहा, ‘‘यदि अफगान सेना अपने देश पर नियंत्रण बनाए नहीं रख सकती या नहीं रखती है, तो भले ही एक और साल हो या पांच और साल, अमेरिकी सेना की उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता।’’

बाइडन ने कहा कि उन्होंने सशस्त्र बलों और खुफिया समुदाय को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया है कि अमेरिका अफगानिस्तान से भविष्य में होने वाले आतंकवादी खतरों से निपटने की क्षमता और सतर्कता बनाए रखे।

उन्होंने अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और अन्य अफगान नेताओं की मदद करने का भी निर्देश दिया है, जो और रक्तपात को रोकने और राजनीतिक समझौता करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके कुछ ही देर बाद ब्लिंकन ने गनी से बातचीत की।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा, ‘‘उन्होंने (ब्लिंकन और गनी ने) हिंसा को कम करने के लिए चल रहे राजनयिक और राजनीतिक प्रयासों की तात्कालिकता पर चर्चा की।’’ प्राइस ने कहा कि ब्लिंकन ने अफगानिस्तान सरकार के साथ मजबूत राजनयिक और सुरक्षा संबंधों को लेकर अमेरिका की प्रतिबद्धता और अफगानिस्तान के लोगों के प्रति अमेरिका के निरंतर समर्थन पर भी जोर दिया।

बाइडन ने कहा कि ब्लिंकन प्रमुख क्षेत्रीय हितधारकों के साथ भी वार्ता करेंगे। उन्होंने कहा, ‘‘हमने अपने कमांडर के माध्यम से दोहा में तालिबान के प्रतिनिधियों को अवगत करा दिया है कि अफगानिस्तान में यदि उसकी कोई कार्रवाई अमेरिकी कर्मियों या हमारे अभियान को खतरे में डालती है, तो अमेरिकी सेना इसके जवाब में त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई करेगी।’’

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने उत्तराधिकारी बाइडन की आलोचना की और उन पर असंगत फैसलों से अफगान नीति पर पूरी तरह से विफल होने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा, ‘‘तालिबान अब अमेरिका या अमेरिका की शक्ति से नहीं डरता है या उसका सम्मान नहीं करता। कितनी शर्म की बात होगी, जब तालिबान काबुल में अमेरिकी दूतावास पर झंडा फहराएगा। यह कमजोरी, अक्षमता और रणनीतिक रूप से असंगत फैसलों के कारण मिली एक पूर्ण विफलता है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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