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Basant Panchami: केवल हिंदू नहीं सूफी मुस्लिम भी मनाते हैं बसंत पंचमी, इसके पीछे है ये 700 साल पुरानी कहानी

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 30, 2020 10:29 IST

Basant Panchami: दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी का त्योहार मनाने की परंपरा करीब 700 साल पुरानी है। ये आयोजन अब भी जारी है।

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ठळक मुद्देBasant Panchami: दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर मनाई जाती है बसंत पंचमीगुरु-शिष्य की कहानी है इसके पीछे, इस दिन गाये जाते हैं बसंत के गीत, चढ़ाई जाती है पीली चादर

Basant Panchami: बसंत पंचमी का जिक्र आते ही इसके हिंदू त्योहार होने की बात अक्सर हमारे जेहन आती है। हालांकि, बसंत ऋतु आने की खुशी में मनाए जाने वाले इस खास दिन का सूफी इस्लाम से भी नाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली में मौजूद हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है।

यहां हर साल बसंत पंचमी खास तैयारियों के साथ मनाया जाता है। बंसत पंचमी के लिए दिन यहां हरे की जगह पीले रंग की चादर चढ़ाई जाती है और बसंत के गीत गाए जाते हैं। आखिर एक मुस्लिम दरगाह पर क्यों मनाई जाती है बसंत पंचमी, जानिए इससे जुड़ी कहानी...

Basant Panchami: निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर क्यों मनाते हैं बसंत पंचमी

हजरत निजामुद्दीन औलिया चिश्ती घराने के चौथे सूफी संत थे। इनके सबसे प्रसिद्ध शिष्य उर्दू शायर अमीर खुसरो थे। खुसरो को पहला उर्दू का शायर भी कहा जाता है। दरअसल, हजरत निजामु्द्दीन औलिया का एक भांजा था जिसका नाम तकीउद्दीन नूह था। निजामु्द्दी औलिया उससे बहुत प्यार करते थे। बीमारी के चलते उनके भांजे की अचानक मौत हो गई। 

इस बात से हजरत निजामुद्दीन को इतना गहर धक्का पहुंचा कि उन्होंने हर किसी से बात करना छोड़ दिया। वे न ही हंसते थे और न ही किसी से मिलते-जुलते थे। अमीर खुसरो ने जब उनकी ऐसी हालत देखी तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने हजरत निजामुद्दीन को वापस आम जिंदगी की ओर लौटाने के कई प्रयास किेये लेकिन सफल नहीं हो सके। 

कहते हैं कि एक दिन अमीर खुसरो ने कई औरतों को पीले रंग के कपड़े पहने, हाथ में गेंदे के पीले फूल लिए और गीत गाते देखा। ये बसंत का मौसम था। अमीर खुसरो ने सोचा कि क्यों न इस मौसम में ऐसा ही कुछ वे हजरत निजामुद्दीन के लिए भी करें, शायद कुछ फायदा हो।

इसके बाद अमीर खुसरो ने एक पीले रंग का दुपट्टा डाला, गले में ढोलक डाला और हाथों में पीले फूल लेकर बसंत के गीत गाने लगे। उन्हें औरतों के भेष में गाते बजाते देख हजरत निजामुद्दीन औलिया अपनी हंसी रोक नहीं सके। इसी दिन को याद कर पिछले 700 सालों से उनकी दरगाह पर हर साल बसंत पंचमी मनाई जाती है। 

समय के साथ निजामुद्दीन की दरगाह से शुरू हुई बसंत मनाने की ये परंपरा दूसरी दरगाहों में भी फैल गई। हालांकि दूसरे जगहों पर ऐसा करने की कोई बाध्यता नहीं है मगर ज्यादातर दरगाहों में बसंत पर कव्वाली और जलसे का आयोजन होता है।

टॅग्स :बसंत पंचमीइस्लाम
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