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शीतला सप्तमी 2019: 27 मार्च को शीतला सप्तमी व्रत, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और क्यों मनाएं ये त्योहार?

By गुलनीत कौर | Updated: March 25, 2019 11:38 IST

स्कन्द पुराण के अनुसार देवी शीतला मां दुर्गा और माता पार्वती का ही अवतार हैं। इनकी पूजा से दुर्गा और पार्वती दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां शीतला के प्रकट होने की पौराणिक कथा स्कन्द पुराण में वर्णित है।

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हिन्दू कैलंडर के अनुसार चैत्र महीने की सप्तमी तिथि को 'शीतला सप्तमी' मनाई जाती है। देवी शीतला आदि शक्ति दुर्गा का ही रूप मानी गई हैं। स्कन्द पुराण में देवी से जुड़ी कथा एवं उनके पूजन का महत्व दर्ज है। इस वर्ष 27 मार्च 2019, दिन बुधवार को शीतला सप्तमी है। इसदिन महिलाएं सुबह उठकर स्नान करके मां शीतला की पूजा करती हैं और दिनभर व्रत करती हैं। लेकिन शीतला सप्तमी क्यों मनाएं और इसके व्रत के क्या लाभ हैं, आइए आगे जानते हैं। 

शीतला सप्तमी क्या है? (When is Sheetala Saptami, importance, significance)

स्कन्द पुराण के अनुसार देवी शीतला मां दुर्गा और माता पार्वती का ही अवतार हैं। इनकी पूजा से दुर्गा और पार्वती दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां शीतला के प्रकट होने की पौराणिक कथा स्कन्द पुराण में ही वर्णित है। कथा के अनुसार चैत्र महीने की सप्तमी तिथि को ही पहली बार देवी सप्तमी ने दर्शन दिए थे। इसलिए इसदिन उनकी पूजा और व्रत किया जाता है।

शीतला सप्तमी व्रत महत्व, व्रत कथा (Sheetala Saptami vrat importance, vrat katha)

स्कन्द पुराण की कथा के अनुसार एक बार एक सास और उसकी दो बहुओं ने चैत्र महीने की सप्तमी तिथि को व्रत किया। यह व्रत परिवार की खुशियों एवं बहुओं को अभी अभी हुई संतानों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए किया गया था। व्रत के अनुसार सास और बहुओं दोनों को ही व्रत के पारण के लिए एक दिन पहले बनी बासी रोटी ग्रहण करनी थी। 

किन्तु बहुओं को बासी रोटी ग्रहण करना मंजूर ना था। उन्हें लगा कि अगर उन्होंने बासी रोटी खाई तो ये उनके और उनकी नवजात संतानों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होगा। इसलिए उन्होंने सास की नजर से बचकर ताजी रोटी बनाने का सोचा। जब सास ने बासी रोटी खाने को कहा तो दोनों ने बात बदलकर टाल दिया और गाय-घोड़ों के लिए रोटी बनाते समय बासी रोटी को दोबारा सेंक लिया ताकि वह खाने लायक हो जाए।

कथा के अनुसार ऐसा करने से व्रत खण्डित हो गया। बहुओं की नवजात संतानों के प्राण चले गए। यह देख रोते हुए दोनों ने अपनी सास को व्रत के भोजन की सच्चाई बताई। यह जान सास क्रोध से आग बबूला हो गई और उसने दोनों को घर से बाहर निकाल दिया। दोनों ही अपनी मृत संतानों के शव को लेकर जंगलों की ओर निकल पड़ीं। 

कुछ दूर चलने पर उन्हें बरगद के पेड़ के नीचे दो बहनें दिखीं। उनका नाम ओरी और शीतला था। बहुओं को दुखी देख बहनों ने उनके दुःख का कारण पूछा। सच पता चलने पर शीतला ने बहुओं को खूब लताड़ा। शीतला का क्रोधित रूप देख बाहें समझ गईं कि ये कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि दुर्गा का रूप है। दोनों शीतला के पांव पड़ गईं। क्षमा याचना की। बहुओं को यूं परेशान देख देवी शीतला ने भी उन्हें माफ़ किया और दोनों की संतानों को पुनः जीवित किया।

यह भी पढ़ें: चैत्र नवरात्रि 2019 घट स्थापना तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, अष्टमी, नवमी और नवरात्रि पारण तिथि

शीतला सप्तमी व्रत लाभ (Sheetala Saptami vrat benefits)

पौराणिक कथा को आधार मानते हुए हर स्त्री अपनी संतान के अच्छे स्वास्थ्य के लिए शीतला माता का व्रत करती है। उनका पूजन करती है। शास्त्रों के अनुसार देवी शीतला का व्रत करने से रोग नष्ट होते हैं। देवी अपने भक्तों से प्रसन्न होकर उनके रोग, शोक से दूर रखती है। लंबी आयु और खुशहाल जीवन प्रदान करती है। 

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