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Shani Rashi Parivartan: शनिदेव की क्या है जन्म कथा और उन्हें पत्नी से क्यों मिला था शाप?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 24, 2020 10:26 IST

Shani Dev Rashi Parivartan: शनि के बारे में कहा गया है कि वे क्रूर हैं। हालांकि, वह न्याय का देवता हैं। वह सभी को उसी के कर्मों के अनुसार फल देने का काम करते हैं।

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ठळक मुद्देशनिदेव अपनी मूल राशि मकर राशि में कर रहे हैं प्रवेशस्कंदपुराण में है शनिदेव के जन्म से जुड़ी कथा, पत्नी से भी मिला था शाप

आम मान्यताओं में शनिदेव का नाम आते ही पहला ख्याल 'डर' का आता है। शनि के प्रकोप से सभी बचना चाहते हैं। ऐसी मान्यता है कि शनिदेव जिस पर नाराज हो गये उसकी आने वाले जिंदगी मुश्किलों से भर जाती है। इसलिए हिंदू धर्म की मान्यताओं में शनिदेव की चाल को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसका हमारे जीवन पर काफी प्रभाव पड़ता है।

वैसे, शनि क्रूर नहीं बल्कि उन्हें न्याय का देवता कहा गया है। वह सभी को उसी के कर्मों के अनुसार फल देने का काम करते हैं। इसलिए उन्हें अगर जातक खुश रखने में कामयाब रहते हैं तो उनके प्रकोप से आसानी से बचा जा सकता है और साथ ही उनकी कृपा भी मिलती है। शनि इस बार 24 जनवरी (मौनी अमावस्या) को अपना राशि परिवर्तन कर रहे हैं। वह मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं।

हर ढाई साल में अपनी राशि बदलने वाले शनि करीब 29 साल बाद अपनी मूल राशि मकर में प्रवेश करेंगे। इसका असर सभी राशियों वाले जातकों पर पड़ेगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि शनिदेव का जन्म कैसे हुआ और क्यों उनकी दृष्टि टेढ़ी है? 

Shanidev Janm katha: शनिदेव की जन्मकथा

शनिदेव के जन्म को लेकर एक कथा प्रचलित हैं। स्कंदपुराण में इस कथा का जिक्र है। इसके अनुसार राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्य देव के साथ हुआ था। सूर्य देव का तेज हालांकि इतना अधिक था जिससे संज्ञा हमेशा परेशान रहती थीं। वह हमेशा यही सोचा करती थीं कि आखिर कैसे सूर्य देव की अग्नि को कम किया जाए। 

बहरहाल, इस बीच दिन व्यतीत होने लगे। संज्ञा के गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संतानों ने जन्म लिया। संज्ञा अब भी सूर्यदेव के तेज से घबराती थीं। उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को कम करेंगी। साथ ही वे ये भी चाहती थी कि बच्चों और सूर्य देव को इसकी भनक नहीं लगे। इसके लिये उन्होंने एक रास्ता निकाला।

संज्ञा ने अपने तप से अपनी छाया को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा। इसके बाद संज्ञा ने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी अपनी छाया संवर्णा को दी और ये भी हिदायत दी कि ये राज किसी के सामने नहीं खुलना चाहिए। इसके बाद संज्ञा अपने पिता के घर चली गईं और अपनी परेशानी बताई।

पिता ने हालांकि फटकार लगाते हुए संज्ञा को वापस भेज दिया। संज्ञा हालांकि वापस नहीं गईं और घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या करने लगीं।

दूसरी ओर सूर्य देव को भनक भी नहीं लग सकी कि उनके साथ जो रह रही है वह संज्ञा नहीं बल्कि संवर्णा है। संवर्णा अपने धर्म का पालन करती रही। संवर्णा के छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से भी कोई परेशानी नहीं हुई। दिन बीतने लगे और सूर्यदेव और संवर्णा के मिलन से भी मनु, शनिदेव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया।

क्यों है शनिदेव की दृष्टि टेढ़ी

ब्रह्मपुराण के अनुसार शनिदेव भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। शनिदेव की आठ पत्नियां बताई जाती हैं लेकिन ये कहानी उनकी एक पत्नी और चित्ररथ की कन्या धामिनी से जुड़ा है। कथा के अनुसार शनिदेव हमेशा भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में इतना लीन रहते कि अपनी पत्नी पर भी ध्यान नहीं देते थे।

एक बार धामिनी ऋतु स्नान कर संतान प्राप्ति की इच्छा लिये शनि के पास आयी लेकिन शनि देव हमेशा कि तरह भक्ति में लीन थे। आखिरकार धामिनी इंतजार कर थक गईं। इसके बाद आवेश में उन्होंने शनि देव को शाप दे दिया कि जिस पर भी उनकी अब नजर पड़ेगी उसे परेशानियां का सामना करना पड़ेगा।

गुस्सा कम होने पर पत्नी को अपनी गलती का अहसास हुआ लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। कहते हैं यही कारण है कि शनि देव अपने भक्तों के सामने भी सिर नीचा करके रहने लगे ताकि उन्हें वे किसी परेशानी में नहीं पड़े। हालांकि, जिस पर वे नाराज होते हैं उन पर उनकी दृष्टि जरूर टेढ़ी हो जाती है।

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