UGC के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, जाति आधारित भेदभाव का आरोप

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 27, 2026 14:22 IST2026-01-27T14:22:12+5:302026-01-27T14:22:27+5:30

UGC rules 2026: यूजीसी 2026 के नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि ये नियम गैर-अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को संस्थागत सुरक्षा से वंचित करते हैं। याचिका में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को जाति-निरपेक्ष तरीके से पुनर्परिभाषित करने की मांग की गई है।

UGC rules challenging the definition of caste-based discrimination in the Supreme Court | UGC के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, जाति आधारित भेदभाव का आरोप

UGC के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, जाति आधारित भेदभाव का आरोप

UGC rules 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हाल में जारी नियमों को चुनौती देने के लिए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है जिसमें आरोप लगाया गया है कि इसमें जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है और संस्थागत सुरक्षा से कुछ श्रेणियों को बाहर कर दिया गया है। याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के हाल में अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ का नियम 3 (सी) ‘‘गैर-समावेशी’’ है और जो छात्र एवं शिक्षक आरक्षित श्रेणियों के नहीं हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं करता है।

विनीत जिंदल द्वारा दाखिल याचिका में इन विनियमों की इन आधार पर आलोचना की गई है कि जाति आधारित भेदभाव को सख्ती से अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें कहा गया कि ‘जाति-आधारित भेदभाव’ का दायरा सिर्फ़ एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों तक सीमित करके, यूजीसी ने ‘सामान्य’ या गैर-आरक्षित श्रेणी के लोगों को संस्थागत सुरक्षा और उनकी शिकायत निवारण से असल में इनकार किया है, जिन्हें अपनी जाति की पहचान के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव का भी सामना करना पड़ सकता है।

इसमें कहा गया है कि यह नियम अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) और 15(1) (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर राज्य द्वारा भेदभाव पर रोक) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि यह विनियम संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है) का उल्लंघन करता है।

इसमें शीर्ष अदालत से अनुरोध किया गया है कि अधिकारियों को नियम 3(सी) को उसके मौजूदा स्वरूप में लागू करने से रोका जाए और जाति-आधारित भेदभाव को ‘जाति-तटस्थ और संविधान अनुरूप’ तरीके से फिर से परिभाषित किया जाए। इसमें कहा गया है, “जाति के आधार पर भेदभाव को इस तरह से परिभाषित किया जाना चाहिए कि जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार होने वाले सभी लोगों को सुरक्षा मिले, चाहे उनकी जाति की पहचान कुछ भी हो।”

याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी को अंतरिम निर्देश देने की मांग की गई है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन नियमों के तहत बनाए गए ‘समान अवसर केंद्र’ और ‘समानता हेल्पलाइन’ आदि को बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध कराया जाए।

Web Title: UGC rules challenging the definition of caste-based discrimination in the Supreme Court

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