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न्यायालय ने अर्नब की अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाई, कहा फौजदारी कानून मनमाने तरीके से उत्पीड़न का हथियार नहीं

By भाषा | Updated: November 27, 2020 20:05 IST

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नयी दिल्ली, 27 नवंबर शीर्ष अदालत ने 2018 के आत्महत्या के लिये उकसाने के मामले में शुक्रवार को बंबई उच्च न्यायालय के निर्णय के चार सप्ताह बाद तक के लिये टीवी ऐंकर अर्नब गोस्वामी और दो अन्य की अंतिरम जमानत की अवधि बढ़ा दी। न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फौजदारी कानून मनमाने तरीके से उत्पीड़न का हथियार नही बने।

न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी की पीठ ने अर्नब गोस्वामी और दो अन्य को अंतरिम जमानत देने के 11 नवंबर के आदेश के विस्तृत कारण बताते हुये शुक्रवार को अपना 55 पेज का फैसला सुनाया।

पीठ ने अनुच्छेद 226 के तहत जमानत देने के उच्च न्यायालय के अधिकार, प्राथमिकी रद्द करना और नागरिकों की स्वतंत्रता बरकरार रखने में अदालतों की भूमिका सहित अनेक पहलुओं पर अपने फैसले में विस्तार से टिप्पणी की और कहा , ‘‘स्वतंत्रता की हुकूमत संविधान के ताने बाने से होकर गुजरती है।’’

पीठ ने अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाते हुये कहा, ‘‘जिला न्यायपालिका से लेकर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय का यह सुनिश्चित करना कर्तव्य है कि फौजदारी कानून नागरिकों के मनमाने तरीके से उत्पीड़न का हथियार नहीं बने।’’

रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक गोस्वामी, नीतीश सारदा और फीरोज मोहम्मद शेख को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले की अलीबाग पुलिस ने आर्कीटेक्ट और इंटीरियर डिजायनर अन्वय नाइक और उनकी मां को 2018 में आत्महत्या के लिये कथित रूप से उकसाने के मामले में चार नवंबर को गिरफ्तार किया था। आरोप है कि इन लोगो की कंपनियों ने नाइक की कंपनी को देय शेष धनराशि का भुगतान नही किया था।

पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘‘आरोपियों को 11 नवंबर को प्रदान किया गया अंतरिम संरक्षण उच्च न्यायालय में लंबित कार्यवाही का निबटारा होने तक और इसके बाद उच्च न्यायालय के फैसले की तारीख से चार सप्ताह तक प्रभावी रहेगा ताकि अगर जरूरी हो तो वे सब या उनमें से कोई भी कानून के अनुसार राहत के लिये आगे कदम उठा सके।’’

पीठ ने कहा, ‘‘अपराध की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना निश्चित ही अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक स्तर पर पीड़ित के अधिकारों का संरक्षण करता है और इससे ज्यादा मूल स्तर पर कानून के अनुसार अपराध की जांच सुनिश्चित करके सामाजिक हित की रक्षा करता है। दूसरी ओर, फौजदारी कानूनों का दुरूपयोग ऐसा मामला है जिसके प्रति उच्च न्यायालय और निचली अदालतों को सजग रहना चाहिए।’’

पीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व और ‘जमानत नियम है तथा जेल अपवाद’ के सिद्धांत को रेखांकित करते हुये अनेक फैसलों को इस फैसले में उद्धृत किया।

न्यायालय ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय को ऐसी स्थिति में अपने अधिकार का इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करना चाहिए था जब किसी नागरिक को सरकार की ताकत का दुरूपयोग करके उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से मनमाने तरीके से वंचित किया जा रहा हो।’’

शीर्ष अदालत ने गोस्वामी के खिलाफ प्राथमिकी का पहली नजर में भी आकलन नही करने के लिये बंबई उच्च न्यायालय की आलोचना की और कहा कि इस मुद्दे पर बाद में गौर किया जा सकता था कि प्राथमिकी निरस्त करने के लिये आरोपी मामला बना पाया या नहीं लेकिन शिकायत के मद्देनजर जमानत के मसले पर तो विचार किया जाना चाहिए था।

हमारा यह स्पष्ट मत है कि प्राथमिकी का पहली नजर में भी आकलन करने में विफल रहकर उच्च न्यायालय ने स्तंत्रता के रक्षक के रूप में अपने सांविधानिक कर्तव्यों का परित्याग कर दिया। अदालतों के लिये यह सुनिश्चित करते समय कि फौजदारी कानून को लागू करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं आये, जनता के हित की रक्षा के प्रति भी सजग रहने की जरूरत है। अपराध की निष्पक्ष जांच उसकी मदद के लिये है।’’

पीठ ने कहा कि इन मामलों में प्राथमिकी के पहली नजर में आकलन से भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिये उकसाने के अपराध के लिये अनिवार्य पहलू साबित नहीं होते हैं।

न्यायालय ने कहा, ‘‘अपीलककर्ता भारत के निवासी हैं और जांच या मुकदमे के दौरान उनके फरार होने का खतरा नहीं है। साक्ष्यों या गवाहों से किसी प्रकार की छेड़छाड़ की आशंका नहीं है। इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुये ही 11 नवंबर 2020 के आदेश में अपीलकर्ताओं को जमानत पर रिहा किया गया।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय इस बुनियादी मुद्दे पर विचार करने में विफल रहा जिस पर प्राथमिकी रद्द करने के लिये दायर याचिका पर सुनवाई करते समय विचार करने की आवश्यकता होती है।

पीठ ने कहा, ‘‘अगर उच्च न्यायालय ने पहली नजर में आकलन किया होता तो निश्चित ही उसके लिये प्राथमिकी और धारा 306 के प्रावधानों के बीच तारतम्यता नहीं होने की बात नजर में नही आना असंभव होता। उच्च न्यायालय द्वारा ऐसा करने में विफल रहने की वजह ने ही अपीलकर्ता को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439 के तहत नियमित जमानत का रास्ता चुनने का अवसर प्रदान किया। उच्च न्यायालय साफ तौर पर धारा 482 के अंतर्गत एक यचिका का आकलन करने की ड्यूटी निभाने में विफल रहा। ’’

न्यायालय ने उन महत्वपूर्ण पहलुओं को सारांश में बताया जिनका उच्च न्यायालय को जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय संज्ञान लेने की आवश्यकता है और कहा कि कथित अपराध का स्वरूप, आरोप का स्वरूप और सजा होने की स्थिति में दंड की कठोरता इनमे से एक है।

आरोपी के न्याय की पहुंच से बच निकलने की संभावना के बारे में न्यायालय ने कहा कि आरोपी के साथ जुड़ी पृष्ठभूमि और परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए था।

प्राथमिकी में आरोप है कि गोस्वामी की एआरजी आउटलायर मीडिया एशियानेट न्यूज ने बाम्बे डाइंग स्टूडियो परियोजना के लिये 83 लाख रूपए का भुगतान नहीं किया और इसके अलावा फीरोज शेख पर चार करोड़ रूपए तथा सारदा पर 55 लाख रूपए का बकाया था।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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