बिहारी नेताओं ने भी दिखाया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कमाल, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन साबित हुए "लकी"

By एस पी सिन्हा | Updated: May 5, 2026 19:03 IST2026-05-05T19:03:50+5:302026-05-05T19:03:55+5:30

सबसे बड़ी चुनौती अगर कुछ थीं तो वह थी 'मिशन बंगाल'। तब यह तर्क भी दिया जा रहा था कि भाजपा के निशाने पर पश्चिम बंगाल है। नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रभाव पश्चिम बंगाल में रह रहे बिहारियों पर तो पडा ही है, ऐसा जानकारों का मानना है।

Bihari leaders, too, worked wonders in the West Bengal Assembly elections; the party's National President, Nitin Naveen, proved to be "lucky." | बिहारी नेताओं ने भी दिखाया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कमाल, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन साबित हुए "लकी"

बिहारी नेताओं ने भी दिखाया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कमाल, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन साबित हुए "लकी"

पटना:पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भाजपा की ऐतिहासिक जीत में बिहार के नेताओं की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। बंगाल भाजपा के प्रभारी मंगल पांडेय के साथ-साथ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की भूमिका को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता है। दरअसल, नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद कायस्थ मतदाताओं के रुझान पर चर्चा जोरों पर है। बता दें कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। सबसे बड़ी चुनौती अगर कुछ थीं तो वह थी 'मिशन बंगाल'। तब यह तर्क भी दिया जा रहा था कि भाजपा के निशाने पर पश्चिम बंगाल है। नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रभाव पश्चिम बंगाल में रह रहे बिहारियों पर तो पडा ही है, ऐसा जानकारों का मानना है।

उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2025 में भाजपा द्वारा नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बाद में पूर्ण अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करना एक मास्टरस्ट्रोक माना गया। वे बिहार के कायस्थ समुदाय से आते हैं और यह कदम पश्चिम बंगाल में कायस्थ और अन्य उच्च जातियों के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए एक सोची-समझी सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा था। बंगाल में कायस्थ समुदाय को एक शिक्षित और प्रभावशाली वर्ग माना जाता है। 

कायस्थ और पश्चिम बंगाल के राड़ी कायस्थ पर। यह आबादी करीब 5 प्रतिशत का दावा करती है। खासकर कोलकाता और हावड़ा की लगभग 40-50 विधानसभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव है। विधान चंद्र राय और ज्योति बसु भी इसी जाति से आते हैं। इसके साथ-साथ नितिन नबीन को एक भद्र पुरुष के रूप में भी भाजपा के रणनीतिकारों ने परोसा। तर्क यह था कि बंगाल में शिक्षित और सवर्ण उनके प्रभाव में आ जाएं। नितिन नबीन ने 2021 के बंगाल चुनाव में काम किया था। इस चुनाव में उन्होंने ममता बनर्जी के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का पूरा फायदा उठाया था। 

भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के राष्ट्रीय स्तर के पदों पर रहने के कारण नितिन नबीन के पास बंगाल के युवा कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का अनुभव भी था। नितिन नबीन की एक "गैर-विवादास्पद" और "युवा चेहरा" के रूप में छवि ने शहरी मध्यमवर्गीय मतदाताओं, विशेषकर बंगाली कायस्थों के बीच भाजपा की पकड़ मजबूत की। नितिन नबीन को एक शांत और कुशल रणनीतिकार माना जाता है। उनके नेतृत्व में भाजपा ने बूथ स्तर पर अपनी पकड़ बहुत मजबूत की, जिसके परिणामस्वरूप 2026 में पार्टी को अभूतपूर्व सफलता मिली।

नितिन नबीन ने खुद बंगाल का दौरा कर चुनावी रणनीति संभाली और टीएमसी के खिलाफ माहौल बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस तरह उनके अध्यक्ष बनने के पहले ही कार्यकाल में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के उस किले को भेद दिया, जिसे ममता बनर्जी की अपराजेय सियासी ताकत का प्रतीक समझा जाता था। यही वजह है कि पार्टी के भीतर नितिन नवीन को अब भाजपा के लिए “लकी” कहा जाने लगा है।

जानकार बताते हैं कि नितिन नबीन अध्यक्ष पद संभालते ही एक्शन में आ गए थे। पश्चिम बंगाल में चुनाव की तैयारियों के माइक्रो मैनेजमेंट का मैकेनिज्म उन्होंने तैयार किया। फिर टिकट बंटवारे में भी नितिन नबीन ने दिल्ली और कोलकाता के बीच पुल का काम किया। संघ से जुड़े दिलीप घोष और जन नेता के तौर पर आगे बढ़कर ममता बनर्जी को चुनौती देने वाले सुवेंदु अधिकारी के बीच संतुलन बनाकर उम्मीदवार तय किए। 

नितिन नबीन ने पश्चिम बंगाल से सटे अपने राज्य बिहार से भाजपा के हर स्तर के नेता को पश्चिम बंगाल में करीब 90 दिनों के लिए शिफ्ट कर दिया। इसमें पश्चिम बंगाल के मतदाताओं की जाति का ख्याल रखते हुए अनुसूचित जाति के नेताओं को तो भेजा ही गया, ब्राह्मण, कायस्थ और राजपूतों को भी ठीक ठाक संख्या में लगाया गया। वैसे, अनुसूचित जाति के बाद चूंकि पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रभाव है तो नितिन नबीन ने ओबीसी नेताओं की भी बड़ी खेप बंगाल में दूर-सुदूर तक भेज दी। 

खास बात यह भी रही कि इस बार भाजपा ने भारी संख्या में अपनी नेत्रियों को भी पश्चिम बंगाल में जमाए रखा। कई तो लगातार महीने भर वहीं रहीं। देश के अन्य राज्यों के मुकाबले बिहार की भाजपा नेत्रियां वहां ज्यादा घूमती नजर आईं। भाजपा नेताओं की मानें तो इनके अलावा बिहार से पूर्व मंत्री, विधायक और पूर्व विधायक समेत संगठन के अन्य पदाधिकारियों ने पश्चिम बंगाल में अपनी अहम भूमिका निभाई। इनमें पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा, अरुण शंकर, विधायक संजय गुप्ता, रत्नेश कुशवाहा, पूर्व विधायक प्रेम रंजन पटेल सहित कई नेताओं को खास-खास विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई थी। 

इसके साथ ही मंगल पांडेय को बंगाल का प्रभारी बनाया तो उनके जिम्मे सवर्ण मतों में सेंधमारी करना था। मंगल पांडेय सवर्ण को साधने में सफल हुए। यही वजह है कि भाजपा को 206 सीटों पर जीत मिली। सूत्र बताते हैं कि मंगल पांडेय ने गत चुनाव में हारी हुई सीटों को तीन कैटेगरी में बांटा था। वो सीटें जहां मार्जिन 10 हजार से कम था, वो सीटें जहां मार्जिन 5000 से कम और जहां मार्जिन 1000 से कम था। इसी के मुताबिक विशेष रणनीति बनाई गई। अंततः भाजपा 206 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही।    

Web Title: Bihari leaders, too, worked wonders in the West Bengal Assembly elections; the party's National President, Nitin Naveen, proved to be "lucky."

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