after dismiss article 370 by narendra modi government Journalists are being forced to do wages in Kashmir, know how not only jobs, dreams are also falling apart | कश्मीर में मजदूरी करने के लिए मजबूर हो रहे हैं पत्रकार, जानें किस तरह नौकरी ही नहीं सपने भी टूट रहे
कश्मीर में मजदूरी के लिए मजबूर पत्रकार

Highlightsमुनीब उल इस्लाम ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि किस तरह उसे नौकरी जाने के बाद मजदूरी के लिए मजबूर हो गए।यही हालत कश्मीर घाटी में मौजूद तक़रीबन 300 पत्रकारों की है।

29 साल के मुनीब उल इस्लाम ने कश्मीर में पांच साल तक एक फोटो जर्नलिस्ट के रूप में काम किया था, उनकी तस्वीरें भारत ही नहीं विदेशों में भी कई प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुकी हैं। 

लेकिन युवा फोटोग्राफर की नौकरी और उनका सपना दोनों पिछले साल अगस्त माह में रातोंरात गायब हो गया। इस सब के पीछे भारत की संघीय सरकार द्वारा कश्मीर में लैंडलाइन, मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं को निलंबित किया जाना है। अपनी नौकरी जाने के बाद से ही मुनीब उल इस्लाम मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। दरअसल, नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त करने के बाद से ही यहां के पत्रकारों की स्थिति अच्छी नहीं है। यहां पत्रकारों को मुनीब के तरह ही नौकरी से निकाला जा रहा है। यह सब कुछ इस रिपोर्ट में पढ़ें- 

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक सक्रिय पेशेवर फ़ोटो जर्नलिस्ट से दिहाड़ी मज़दूरी करने पर मजबूर हो जाने तक की अपनी यात्रा के बारे में बताते हुए मुनीब उदास हो जाते हैं। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने पेशे की शुरुआती दिनों को याद करके आज भी उनकी आंखों में चमक आ जाती है।

मुनीब ने कहते हैं, "मैं अपने लोगों के लिए कुछ करने से जज़्बे और इस पेशे के लिए अपने जुनून की वजह से पत्रकारिता में आया था। 2012 में मैंने अनंतनाग में बतौर फ़्रीलांसर अपनी शुरुआत की। फिर 2013 में डेली रौशनी और 'कश्मीर इमेजस' में काम किया और इसके बाद 'कश्मीर रीडर' के लिए भी तस्वीरें खींची।"

नरेंद्र मोदी सरकार के दावे से इतर यह है हकीकत 
"2015 से मैंने दोबारा फ़्रीलांस काम करना शुरू किया, इस बार क्विंट, टेलीग्राफ़, द गार्जियन, थोमसेन रॉयटर्स ट्रस्ट और वॉशिंगटन पोस्ट तक में मेरी तस्वीरें प्रकाशित हुईं। 2012 से लेकर अगस्त 2019 तक मैंने अनंतनाग और आसपास के दक्षिण कश्मीर के इलाक़े को ख़ूब कवर किया... तस्वीरें भी बहुत छपीं... लेकिन अनुछेद 370 के ख़त्म होने के बाद से सब बंद है।"बता दें कि 5 अगस्त को घाटी में इंटरनेट के प्रतिबंधित हो जाने के बाद से कमोबेश यही हालत कश्मीर घाटी में मौजूद तक़रीबन 300 पत्रकारों की है।

रिपोर्ट की मानें तो नरेंद्र मोदी सरकार के इस विवादास्पद निर्णय ने भले ही मुस्लिम-बहुसंख्यक घाटी को दुनिया भर के पत्रकारों के लिए इस जगह को वैश्विक समाचारों के केंद्र के रूप में बदल दिया हो, लेकिन मुनीब जैसे स्थानीय पत्रकारों के पास रिपोर्ट करने का कोई साधन व विकल्प नहीं था। इससे भी बुरा उनके लिए ये था कि उन्हें दूसरी नौकरी खोजना पड़ा क्योंकि प्रेस संस्थानों के पास काम नहीं हो पाने की वजह से पत्रकारों को देने के लिए पैसे नहीं थे।  

बीते जनवरी माह तक यहां इंटरनेट पर पाबंदी थी। भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक इस क्षेत्र में इंटरनेट बंद रहने का रिकॉर्ड बना। बता दें कि करीब 150 दिनों से अधिक समय तक यहां इंटरनेट पर पाबंदी रही।

कश्मीर में पत्रकारों के लिए इतना मुश्किल है रिपोर्टिंग

भारत सरकार का कहना है कि ऐसा करना कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है क्योंकि इस क्षेत्र ने अगस्त माह में यहां विरोध प्रदर्शन काफी उग्र हो गया था। भारतीय सरकार के खिलाफ लंबे समय से यहां विरोध प्रदर्शन भी हो रहा है। लेकिन, विपक्षी नेताओं और सरकार के इंटरनेट पर रोक लगाने के फैसले पर आलोचकों का कहना है कि सरकार इन प्रतिबंधों को अनिश्चित काल तक नहीं छोड़ सकती है। 

मुनीब कहते हैं, "मैंने दिल्ली की एक न्यूज़ वेबसाइट के लिए अखरोट उगाने वाले किसानों पर 370 के हटने के प्रभाव पर स्टोरी करने का प्रस्ताव भेजा। उन्हें पसंद आया और स्टोरी कमीशन भी हो गयी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मुझे उन्हें मेल करने के लिए दो बार श्रीनगर जाना पड़ा। अपनी गाड़ी में तेल डालना, श्रीनगर आना जाना.. सब मिलाकर 5-6 हज़ार का ख़र्च बैठ गया। इतना पैसा तो कहानी छपने के बाद मिलना ही नहीं था। इतना नुक़सान होने के बाद मैं चुप बैठ गया।"

मुनीब अकेले नहीं कई पत्रकार हो गए बेरोजगार
मुनीब की ही तरह, अनंतनाग में काम करने वाले पत्रकार रूबायत ख़ान ने पत्रकारिता छोड़ दी है। अब राज्य के 'उद्यमिता विकास संस्थान' में डेरी फ़ार्म शुरू करने का प्रशिक्षण ले रहे रूबायत घाटी में पत्रकारों की स्थिति से गहरे दुखी हैं।

शहर से कुछ दूरी पर मौजूद एक भवन निर्माण स्थल पर हुई बातचीत में वो कहते हैं, "यहां काम करने का मतलब सिर्फ़ खोना ही खोना है। पहले से भी मुसीबतें कुछ कम नहीं थीं जो अब इंटरनेट भी बंद हो गया। कश्मीर एक कॉन्फ़्लिक्ट ज़ोन है। यहां रिपोर्टिंग करते वक़्त हर पल मौत का ख़तरा रहता है। मैंने 4 साल तक कुलगम और अनंतनाग से जितनी भी रिपोर्टिंग की, उसके दौरान अपनी आँखों के सामने कितने ही लोगों को मरते देखा।
 

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