ब्लॉग: देश का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों की बदहाली

By विश्वनाथ सचदेव | Published: December 8, 2021 10:53 AM2021-12-08T10:53:54+5:302021-12-08T11:06:05+5:30

सरकारें भले ही कुछ भी दावे करती रहें पर देश की शिक्षा-व्यवस्था की एक सच्चाई यह भी है कि आज देश में मीरा रानी और मनीष शर्मा जैसे बारह लाख अध्यापक हैं जो सालों से कांट्रैक्ट टीचर की तरह दो सौ रुपए की दिहाड़ी पर देश का भविष्य संवारने का काम कर रहे हैं. 

contract teachers governments punjab delhi education | ब्लॉग: देश का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों की बदहाली

पंजाब में पानी की टंकी पर चढ़कर विरोध करते कांट्रैक्ट शिक्षक. (फोटो: ट्विटर)

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Highlightsदिल्ली का मुख्यमंत्री मोहाली में जाकर स्थिति सुधारने का आश्वासन दे रहा है.पंजाब की सरकारी पार्टी का अध्यक्ष दिल्ली में स्थिति सुधारने की मांग कर रहा है.बारह लाख अध्यापक कांट्रैक्ट टीचर की तरह दो सौ रुपए की दिहाड़ी पर देश का भविष्य संवार रहे हैं.

आपने भी देखी होगी शायद वह तस्वीर टीवी पर जिसमें मोहाली के कुछ अध्यापक पानी की टंकी पर चढ़े हुए हैं. यह उनके विरोध-प्रदर्शन का तरीका है. विरोध इस बात का कि पिछले 18-18 साल से काम करने के बावजूद उन्हें स्थाई नौकरी क्यों नहीं मिल रही? 

मीरा रानी इनमें से एक हैं- पिछले ग्यारह साल से कॉन्ट्रैक्ट टीचर के रूप में बच्चों को पढ़ा रही हैं. देश का भविष्य बना रही हैं मीरा रानी, पर उनके वर्तमान की हालत यह है कि ग्यारह साल से उनका वेतन छह हजार रु. प्रति माह ही है. यानी दिन के दो सौ रुपए!

कॉन्ट्रैक्ट टीचर अर्थात् नियोजित शिक्षक. यह पूछे जाने पर कि वे घर का नियोजन कैसे करती हैं, मीरा रानी की आंखों से आंसू बहने लगे थे. मनीष शर्मा ने भी अपनी हालत रोते हुए ही बयां की थी. 

मनीष शर्मा अंग्रेजी में एमए हैं. कम्प्यूटर का कोर्स भी कर चुके हैं. उन्हें भी प्रति माह छह हजार रुपए ही मिलते हैं. आय बढ़ाने के लिए वे मजदूरी करते हैं. जब उनसे बात की गई तो वे एक निर्माणाधीन मकान में ईंटें ढोने का काम कर रहे थे. इस काम में उन्हें 450 रुपए रोज मिलते हैं.

मोहाली में पानी की टंकी पर चढ़कर प्रदर्शन करने वाले इन बेचारे अध्यापकों को समझाने के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री तो नहीं पहुंचे, पर दिल्ली के मुख्यमंत्री पहुंचे हुए थे. वे अध्यापकों से खतरनाक टंकी से नीचे उतरने का आग्रह करते हुए यह आश्वासन दे रहे थे कि यदि पंजाब में उनकी सरकार बनी तो वे दिल्ली की तरह ही पंजाब में भी अध्यापकों की स्थिति बेहतर बना देंगे.

विडंबना यह है कि टीवी के जिस कार्यक्रम में मोहाली का यह दृश्य दिखाया जा रहा था, उसी में एक समाचार यह भी था कि पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष सिद्धू दिल्ली के मुख्यमंत्री के घर के सामने प्रदर्शन करने वाले अध्यापकों की भीड़ में शामिल थे. 

दिल्ली का मुख्यमंत्री मोहाली में जाकर स्थिति सुधारने का आश्वासन दे रहा है और पंजाब की सरकारी पार्टी का अध्यक्ष दिल्ली में स्थिति सुधारने की मांग कर रहा है.

बरसों पहले एक फिल्म आई थी ‘शोले’. शायद इसी फिल्म में पहली बार फिल्म के हीरो को पानी की ऊंची टंकी पर चढ़कर अपनी मांग मनवाते हुए देखा गया था. शायद उसी से प्रेरणा लेकर मोहाली के नियोजित अध्यापक पानी की टंकी पर चढ़ गए थे. पता नहीं उन्हें संबंधित अधिकारियों ने कोई ठोस आश्वासन दिया या नहीं, पर यह दृश्य देश की शिक्षा-व्यवस्था की दुर्दशा को अच्छी तरह दिखा रहा था.

सरकारें भले ही कुछ भी दावे करती रहें पर देश की शिक्षा-व्यवस्था की एक सच्चाई यह भी है कि आज देश में मीरा रानी और मनीष शर्मा जैसे बारह लाख अध्यापक हैं जो सालों से कांट्रैक्ट टीचर की तरह दो सौ रुपए की दिहाड़ी पर देश का भविष्य संवारने का काम कर रहे हैं. 

पंजाब की शिक्षा-व्यवस्था का सच देश के अनेक राज्यों की स्थिति का प्रतिनिधित्व करने वाला है. अरुणाचल, मेघालय, मिजोरम जैसे कुछ राज्यों में तो आधे से अधिक अध्यापक ठेके पर पढ़ा रहे हैं. 

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019-2020 में देश में कुल मिलाकर लगभग दस लाख दिहाड़ी अध्यापक हैं. कहीं इन्हें ‘कांट्रैक्ट टीचर’ कहा जाता है, कहीं ‘गेस्ट टीचर’ और कहीं ‘शिक्षा मित्र’. पंजाब, बंगाल और उत्तर प्रदेश उन राज्यों में से हैं, जहां कुल अध्यापकों की एक तिहाई संख्या इसी तरह के अस्थाई अध्यापकों की है.

मोहाली के प्रदर्शनकारी अध्यापकों ने यह भी बताया कि 2016 के चुनाव से पहले अमरिंदर सिंह ने ऐसे ही टीचरों के किसी प्रदर्शन-स्थल पर जाकर वादा किया था कि सत्ता में आते ही मैं इन अध्यापकों की नौकरी को नियमित करूंगा. वे सत्ता में आए भी, और सत्ता से चले भी गए, पर बेचारे अध्यापकों का जीवन अनियमित ही बना रहा.

सच तो यह है कि हमारे राजनेताओं के लिए ऐसी स्थितियां वोट कमाने का साधन बन कर आती हैं. हर चुनाव से पहले राजनीतिक दल और राजनेता वादों की झड़ी लगा देते हैं और फिर चुनाव के बाद ऐसे अधिकांश वादे ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं- अगले चुनावों में भुनाने के लिए. पंजाब समेत देश के पांच राज्यों में फिर चुनाव होने वाले हैं. दावों और वादों की बरसात शुरू हो गई है. शिलान्यासों और 
योजनाओं के उद्घाटन की झड़ी लगी हुई है. राज्यों के नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक, आए दिन अरबों-खरबों की योजनाओं की घोषणा कर रहे हैं. सवाल उठता है यह सब कुछ चुनावों से पहले ही क्यों शुरू होता है, और चुनावों के बाद अक्सर भुला क्यों दिया जाता है? 

सवाल यह भी उठता है कि क्या यह मात्र संयोग ही है कि शिक्षा जैसा महत्वपूर्ण मुद्दा चुनावी मुद्दा नहीं बनता? क्यों किसी नेता को यह अहसास नहीं होता कि कोई मीरा रानी छह हजार रुपए महीने में कैसे जीवन-यापन कर सकती है? 

क्यों एम.ए. पास मनीष शर्मा को बाध्य होना पड़ता है मुंह छिपा कर ईंटें ढोने के लिए? जी हां, दो सौ रुपए रोज की दर से बच्चों को पढ़ाने वाले मनीष शर्मा को शर्म आती है, कहीं कोई छात्र उसे ईंटें ढोते हुए देख न लें.

सच यह भी है कि शर्म उनको नहीं आती जिन्हें आनी चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में यह स्थिति उन सबके लिए शर्म की बात है जिनके हाथों में देश का वर्तमान संवारने और भविष्य बनाने का काम सौंपा गया है. शिक्षा के मंदिरों को प्राथमिकता कब मिलेगी? 

कब हमारे हुक्मरानों का ध्यान इस ओर जाएगा कि अकेले मध्य प्रदेश में 21 हजार स्कूलों में एक शिक्षक चार-चार कक्षाओं को पढ़ा रहा है. और इस बात की पूरी संभावना है कि वह दिहाड़ी शिक्षक हो- और उसे हमने शिक्षा-मित्र का नाम दे रखा हो.

Web Title: contract teachers governments punjab delhi education

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