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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: अमेरिका की अफगान नीति पर जो बाइडेन जल्दबाजी न करें

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: January 28, 2021 12:56 IST

अफगानिस्तान अमेरिका और पूरे दक्षिण एशिया के लिए ये जरूरी होगा कि जो बाइडेन प्रशासन अपने सैनिकों को वहां से निकालने की जल्दबाजी नहीं करे. बाइडेन प्रशासन को धैर्य रखने की जरूरत है।

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ठळक मुद्देतालिबान ने पिछले एक साल में बहुत कम अमेरिकी ठिकानों को अपना निशाना बनायाफरवरी में तालिबान के साथ डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन के समझौते की प्रशंसा सभी करते रहे हैं, लेकिन अमेरिका को धैर्य रखने की जरूरतपिछले एक साल में अमेरिकी फौजी नहीं के बराबर मारे गए लेकिन अफगानिस्तान में हिंसा जारी

अमेरिका का बाइडेन प्रशासन डोनाल्ड ट्रम्प की अफगान-नीति पर अब पुनर्विचार करने वाला है. वैसे तो ट्रम्प प्रशासन ने पिछले साल फरवरी में तालिबान के साथ जो समझौता किया था, उसकी प्रशंसा सर्वत्र हो रही थी लेकिन उस वक्त भी मेरे जैसे लोगों ने संदेह प्रकट किया था कि इस समझौते का सफल होना कठिन है.

ट्रम्प ने लेकिन यह रट लगा रखी थी कि राष्ट्रपति के चुनाव के पहले ही अमेरिकी फौजियों को अफगानिस्तान से वे वापस बुला लेंगे. उन्होंने इसे अपना चुनावी मुद्दा भी बना लिया था. अमेरिकी मतदाता के लिए यह खुशी की बात थी कि अमेरिकी फौजियों के ताबूत काबुल से न्यूयॉर्क आना बंद हो जाएं. 

यह भी सही है कि तालिबान ने पिछले एक साल में बहुत कम अमेरिकी ठिकानों को अपना निशाना बनाया और अमेरिकी फौजी नहीं के बराबर मारे गए लेकिन अफगानिस्तान का कौन सा हिस्सा है, जहां तालिबान ने पिछले एक साल में हिंसा नहीं फैलाई? 

अफगानिस्तान के 80 प्रतिशत से ज्यादा इलाकों पर उनका कब्जा है. वे सरकार की तरह लोगों से टैक्स वसूलते हैं, राज करते हैं और काबुल की गनी-सरकार को वे अमेरिका की कठपुतली कहते हैं.

गनी सरकार भी मजबूर है. उसे दोहा में हुए समझौते को स्वीकार करना पड़ा. उसे पता है कि अमेरिकी और नाटो फौज की वापसी के बाद उनकी सरकार का जिंदा रहना मुश्किल है. अफगान फौज में पठानों का वर्चस्व है और तालिबान शुद्ध पठान संगठन है. तालिबान के कई गुट सक्रिय हैं. 

इन गुटों में आपसी प्रतिस्पर्धा जोरों पर है. हर गुट दूसरे गुट को नकारता चलता है. इसीलिए काबुल और वॉशिंगटन के बीच कोई समझौता हो जाए तो उसे लागू करना कठिन है. 

इस समय मुझे तो एक ही विकल्प दिखता है. वह यह कि सभी अफगान कबीलों की एक वृहद संसद (लोया जिरगा) बुलाई जाए और वह कोई कामचलाऊ सरकार बना दे और फिर लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए काबुल में एक लोकतांत्रिक सरकार बने. 

इस बीच बाइडेन-प्रशासन थोड़ा धैर्य रखे और काबुल से पिंड छुड़ाने की जल्दबाजी न करे. ट्रम्प की तरह वह आनन-फानन घोषणाओं से बचे, यह उसके लिए भी हितकर है, अफगानिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया के लिए भी.

टॅग्स :जो बाइडनअफगानिस्तानअमेरिकाडोनाल्ड ट्रंपतालिबान
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